“सुधर जाओ नहीं तो मुश्किल होगी”

पुण्य प्रसून बाजपेयी 

गुजरात के सीएम मोदी बदले तो लोकसभा की जीत ने इतिहास रच दिया और प्रधानमंत्री मोदी बदले तो दिल्ली ने बीजेपी को अर्स से फर्श पर ला दिया । दिल्ली की हार से कही ज्यादा हार की वजहों ने संघ परिवार को अंदर सी हिला दिया है । संघ उग्र हिन्दुत्व पर नकेल ना कस पाने से भी परेशान है और प्रधानमंत्री के दस लाख के कोट के पहनने से भी हैरान है। संघ के भीतर चुनाव के दौर में बीजेपी कार्यकर्ता और कैडर को अनदेखा कर लीडरशीप के अहंकार को भी सवाल उठ रहे हैं और नकारात्मक प्रचार के जरीये केजरीवाल को निशाना बनाने के तौर तरीके भी संघ बीजेपी के अनुकुल नहीं मान रहा है । वैसे असल क्लास तो मार्च में नागपुर में होने वाली संघ की प्रतिनिधिसभा में लगेगी जब डेढ हजार स्वयंसेवक खुले सत्र में बीजेपी को निशाने पर लेंगे । लेकिन उससे पहले ही बीजेपी को पटरी पर लाने की संघ की कवायद का असर यह हो चला है कि पहली बार संघ अपनी राजनीतिक सक्रियता को भी बीजेपी और सरकार के नकारात्मक रवैये से कमजोर मान रहा है। आलम यह हो चला है कि संघ के भीतर गुरुगोलवरकर के दौर का “एकचालक अनुवर्तित्व ” को याद किया जा रहा है और मौजूदा बीजेपी लीडरशीप को कटघरे में यह कहकर खड़ा किया जा रहा है कि वह भी 1973 के दौर तक के “एकचालक अनुवर्तित्व ” के रास्ते आ खडी हुई । जबकि देवरस के दौर से ही सामूहिक नेतृत्व का रास्ता संघ परिवार ने अपना लिया। यानी एक व्यक्ती ही सबकुछ की धारणा जब संघ ने तोड़ दी तो फिर मौजूदा लीडरशीप को कौन सा गुमान हो चला है कि वह खुद को ही सबकुछ मान कर निर्णय ले लें। संघ के भीतर बीजेपी को लेकर जो सवाल अब तेजी से घुमड रही है उसमें सबसे बड़ा सवाल बीजेपी के उस कैनवास को सिमटते हुये देखना है जो 2014 के लोकसभा चुनाव के वक्त बीजेपी को विस्तार दे रहा था। संघ के भीतर यह सवाल बड़ा हो चुका है कि बीजेपी नेताओं की पहचान सादगी से हटी है। मिस्टर क्लीन के तौर पर अन्ना और केजरीवाल की पहचान अभी भी है तो इनसे दूरी का मतलब इन पर नकारात्मक चोट करने का मतलब क्या है।

संघ का मानना है कि दिल्ली में ही अन्ना और केजरीवाल का आंदोलन और आंदोलन के वक्त संघ के स्वयसेवक भी साथ खडे हुये थे लेकिन आज संघ इनसे दूर है लेकिन मौजूदा राजनीति में किसे किस तरह घेरना है क्या इसे भी बीजेपी समझ नहीं पा रही है । संघ विचारक दिलिप देवधर की मानें तो संघ के भीतर यह सवाल जरुर है कि उग्र हिन्दुत्व के नाम पर जो उंट-पटाग बोला जा रहा है उसपर लगाम कैसे लगे । और कैसे उन्हें बांधा जा सके। प्रधानमंत्री मोदी की मुश्किल यह है कि वह सीधे हिन्दुत्व के उग्र बोल बोलने वालो को खिलाफ सीधे कुछ बोल नहीं सकते क्योंकि संघ की ट्रेनिंग या कहे अनुशासन इसकी इजाजत नहीं देता है। अगर प्रधानमंत्री मोदी कुछ बोलेंगे तो विहिप के तोगडिया भी कल कुछ बोल सकते है । यानी नकेल सरसंघचालक को लगानी है और संघ उनपर नकेल कसने में इस दौर में असफल रहा है इससे इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन दिल्ली को लेकर संघ का यह आंकलन दिल्चस्प है कि दिल्ली चुनाव में संघ की सक्रियता ना होती तो बीजेपी के वोट और कम हो जाते। यानी 2013 के दिल्ली चुनाव हो या 2014 के लोकसबा चुनाव या फिर 2015 के दिल्ली चुनाव। संघ यह मानता है कि तीनो चुनाव के वक्त संघ के स्वयंसेवक राजनीतिक तौर पर सक्रिय थे । और दिल्ली में 32-33 फिसदी वोट जो बीजेपी को मिले है वह स्वयंसेवकों की सक्रियता की वजह से ही मिले हैं। और उसके उलट केजरीवाल के हक में वोट इसलिये ज्यादा पड़ते चले गये क्योकि हिन्दुत्व को लेकर बिखराव नजर आया। साथ ही बीजेपी लीडरशीप हर निर्णय थोपती नजर आयी । यानी सामूहिक निर्णय लेना तो दूर सामूहिकता का अहसास चुनाव प्रचार के वक्त भी नहीं था । जाहिर है संघ की निगाहो में अर्से बाद वाजपेयी, आडवाणी,कुशाभाउ ठाकरे, गोविन्दाचार्य की सामूहिकता का बोध है तो दूसरी तरफ बीजेपी अध्यक्ष की मौजूदा कार्यकर्तातओ पर थोपे जाने वाले निर्णय है। खास बात यह है कि केजरीवाल की जीत से संघ परिवार दुखी भी नहीं है । उल्टे वह खुश है कि कांग्रेस का सूपडा साफ हो गया और दिल्ली के जनादेश ने मौजूदा राजनीति में ममता,मुलायम , लालू सरीखे नेताओ से आगे की राजनीतिक लकीर खिंच दी ।

और चूंकि नरेन्द्र मोदी भी केजरीवाल की तर्ज पर सूचना क्रांति के युग से राजनीतिक तौर पर जोडे हुये है और केजरीवाल की पहुंच या पकड राष्ट्रीय तौर पर नही है तो बीजेपी के पास मौका है कि वह अपनी गलती सुधार ले । संघ की नजर दिल्ली चुनाव के बाद केजरीवाल को लेकर इतनी पैनी हो चली है कि वह बीजेपी को यह भी सीख देने को तैयार है कि मनीष सिसोदिया को उप-मुख्यमंत्री बनाकर अगर केजरीवाल आम आदमी पार्टी के विस्तार में लगते हो तो फिर दिल्ली को लेकर केजरीवाल को गेरा भी जा सकता है। यानी केजरीवाल को दिल्ली में बांध कर बीजेपी को राष्ट्रीय विस्तार में कैसे आना है और दिल्ली वाली गलती नहीं करनी है यह पाठ भी संघ पढाने को तैयार है । यानी बीजेपी को राजनीतिक पाठ पढाने का सिलसिला गुरुवार से जो झंडेवालान में शुरु हुआ है वह रविवार और सोमवार को सरसंघचालक मोहन भागवत और दूसरे नंबर के स्वयसेवक भैयाजी जोशी समेत उस पूरी टीम के साथ पढ़ाया जायेगा जो मार्च के बाद कमान हाथ में लेगा। यानी अभी तक यह माना जा रहा था कि मोदी सरकार के बाद संघ हिन्दु राष्ट्र को सामाजिक तौर पर विस्तार देने में लगेगी लेकिन दिल्ली की हार ने बीजेपी और सरकार को संभालने में ही अब संघ को अपनी उर्जा लगाने को मजबूर कर दिया है। और बीजेपी लीडरशीप को साफ बोलने को तैयार है कि सुधर जाओ नहीं तो मुश्किल होगी ।

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