वैदिक सम्पत्ति : चतुर्थ खण्ड अध्याय – वेदों की शिक्षा

Devendra singh arya

गतांक से आगे….

इसके पूर्व तीन खण्डों में हमने वेदों की प्राचीनता , वेदों की अपौरुषेयता और वेदों की उपेक्षा पर प्रकाश डाला है । हमने यथाशक्ति यह दिखलाने का यत्न किया है कि , वेद अपौरुषेय और ईश्वरप्रदत्त हैं , अतः जब तक आर्यों ने उनके अनुकूल अपनी रहन – सहन , शिक्षा – सभ्यता , धर्म – कर्म और नीति – आचार कायम रक्खा तब तक उनकी हर प्रकार से उन्नति रही , परन्तु जब से उनमें आलस आया , जब से उनमें विदेशियों का मिश्रण हुआ और जबसे उन्होंने मिश्रित सिद्धान्तों पर विश्वास करके अपनी रहन – सहन शिक्षा – सभ्यता , धर्म – कर्म और नीति – आचार को आसुरी बना लिया और वेदों की उपेक्षा कर दी , तब से उनमें अनैक्य , अनाचार और अविद्या ने घर कर लिया और उनका हर प्रकार से पतन हो गया । इसलिए यह निर्विवाद और निस्संशय है कि जब तक हम समस्त आर्य हिन्दू संपूर्ण दूषित साहित्य को छोड़कर केवल वेदोंपर ही विश्वास करनेवाले न हो जायें , वेदों की शिक्षा के अनुसार अपना आचरण न बना लें और वेदों के ही अनुकूल न हो जायँ , तब तक हमारी अनैक्यता , हमारी कुरीतियाँ और हमारा प्रज्ञान दूर नहीं हो सकता । परन्तु वेदों के विषय में बड़े-बड़े पण्डितों में भी अनेक प्रकार के असमञ्जस फैले हुए हैं । कुछ लोग समझते हैं कि वेद और ब्राह्मण एक ही वस्तु हैं । कुछ लोगों का ख्याल है कि पहिले तीन ही वेद थे , अथर्ववेद बहुत दिन के बाद बना लिया गया है । कुछ लोग कहते हैं कि वेदों की बहुत सी शाखाएँ लुप्त हो गई हैं , इसलिए अब वेद पूरे-पूरे प्राप्त नहीं होते । कई लोग विचार करते हैं कि इन वेदों में बहुत सा ब्राह्मणों का भाग मिल गया है । अनेकों का विश्वास है कि वेदों में बहुत सी पुनक्ति है । कुछ का ख्याल है कि वेदों में लिखे हुए ऋषि , देवता और छन्दों का मतलब समझ में नहीं आता । अनेकों का कहना है कि वेदों में पशुहिंसा और अश्लीलता भरी हुई है और बहुत से लोग समझते हैं कि केवल वेदों के ही पठनपाठन से अथवा केवल वेदानुकूल ही अपनी रहन सहन , शिक्षा – सभ्यता धर्म – कर्म और नीति – आचार बना लेने से काम नहीं चल सकता । इसलिए जब तक इन आक्षेपों का समुचित उत्तर न दिया जाय , वैदिक शिक्षा की एक पर्याप्त मन्त्रसूची सप्रमाण न उपस्थित की जाय और जब तक प्राचीन आर्यसभ्यता का विस्तृत वर्णन न किया जाय तब तक वेदों के अपौरुषेय सिद्ध हो जाने पर और यह सिद्ध हो जाने पर भी कि हमारा पतन वेदों की उपेक्षा से ही हुआ है , वेदों का जैसा चाहिये वैसा महत्व समझ में नहीं आ सकता । इसलिए हम यहां इन प्राक्षेपों का यथामति उत्तर देते हुए , वेदमन्त्रों से ही वेदों की शिक्षा की एक विस्तृत सूची देते हैं और आर्य सभ्यता का विस्तृत वर्णन करते हैं , जिससे ज्ञात हो जायगा कि वेद कुत्सित आक्षेपों से पाक हैं और उनकी शिक्षा पूर्ण , विशाल और उपयोगी है ।
हमारे इस वर्णन के तीन विभाग होगे। पहिले विभाग में वेदों की आभ्यन्तरीय परीक्षा होगी , दूसरे में वैदिक मन्त्रों से वेदों की शिक्षा दिखलाई जायगी और तीसरे में आर्यर्यसभ्यता का विस्तृत वर्णन किया जायगा ।

वेदों की आभ्यन्तरीय परीक्षा

ऊपर जितने प्राक्षेप लिखे गये हैं , वे दो भागों में विभक्त हैं एक विभाग वेदों की इयत्ता से सम्बन्ध रखता है और दूसरा उनकी अन्तरङ्ग परीक्षा से । पहिले विभाग में वेद और ब्राह्मणों की एकता , अथर्व का वेदत्व , शाखाओं की गड़बड़ , वेदों में प्रक्षेप और पुनरुक्ति आदि विषय हैं । इन विवादों के कारण यह नहीं सूचित होता है कि , वेदों का परिमाण कितना है । दूसरे विभाग में ऋषि , देवता , छन्द और स्वरों का तात्पर्य तथा इतिहास , पशुहिंसा और अश्लीलता आदि विषय सम्मिलित हैं । ये विषय वेदों की अन्तरङ्ग परीक्षा से सम्बन्ध रखते हैं । इस तरह से ये दोनों विभाग विचारणीय हैं । हम यहां क्रम से इनकी आलोचना आरम्भ करते हैं और दिखलाते हैं कि वेदों की इयत्ता और अन्तरङ्गपरीक्षा से क्या तथ्य उपलब्ध होता है ।
क्रमशः

मूल लेखक: रघुनंदन लाल शर्मा

प्रस्तुति देवेंद्र सिंह आर्य

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