आम आदमी पार्टी से देश क्या आशा करे?

दिल्ली में ‘आम आदमी पार्टी’ की विजय अरविंद केजरीवाल का दिमाग वैसे ही फुला सकती है, जैसा कि 1984 में राजीव गांधी का फूल गया था और आठ माह पहले नरेंद्र मोदी का। राजीव गांधी, नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल को हम नेता न कहें, यह तो शुद्ध ज्यादती ही होगी, लेकिन आज के दिन यह सोचना जरूरी है कि तीनों में क्या समानताएं हैं और कहीं अरविंद भी उसी तरह नीचे नहीं लुढ़कने लगें, जैसे कि राजीव लुढ़के थे और मोदी का लुढ़कना शुरू हो गया है। राजीव को ढाई साल लगे। गली-गली में शोर मचने लगा। मोदी को नौ महीने भी नहीं लगे। दिल्ली ने स्वच्छता अभियान शुरू कर दिया। कहीं ऐसा न हो कि केजरीवाल को दो माह भी नहीं लगें और फिसलन शुरू हो जाए? आशा करें कि ऐसा न हो। ऐसा क्यों हो सकता है? ऐसा कैसे हो सकता है? इस प्रश्न का सही जवाब जानने के लिए हमें थोड़ा पीछे जाना होगा।

1984 में राजीव गांधी प्रधानमंत्री कैसे बने? उन्हें अपनी मां और नाना से भी ज्यादा सीटें कैसे मिलीं? क्या इसलिए मिलीं कि वे महान नेता थे? नहीं, वे 410 सीटें राजीव को नहीं, भारत की जनता ने शहीद इंदिरा गांधी को दी थीं, लेकिन हमारे कांग्रेसी नेताओं ने बेचारे, भोले-भाले, सीधे-साधे पायलट-पुत्र पर महानता थोप दी। उन्हें वे आधुनिक विवेकानंद बताने लगे, भावी भारत के निर्माता और युवा हृदय-सम्राट कहने लगे और उनके पिता की उम्र के नेता उनके जूतों के बंद बांधने लगे। नतीजा क्या हुआ? जब उन्होंने खुद के दम पर चुनाव लड़ा तो कांग्रेस की सीटें आधी रह गईं। सबसे स्वच्छ प्रधानमंत्री को बोफोर्स की तोपें ले बैठीं।

इसी प्रकार गुजरात में भेजे जाने के पहले नरेंद्र मोदी को कौन जानता था? सांसद होना तो दूर की बात है, वे कभी विधायक या पार्षद भी नहीं रहे। गुजरात के मुख्यमंत्री केशूभाई को अचानक हटाना पड़ा। उनकी जगह नरेंद्र मोदी को अटलजी और आडवाणीजी ने हेलिकाॅप्टर से गांधी नगर ले जाकर बिठा दिया। 2002 के गोधरा कांड ने उन्हें अचानक हिंदू हृदय-सम्राट बना दिया। वरना क्या पता, अपने पहले चुनाव में ही मोदी ढेर हो जाते और फिर लौटकर पार्टी के दिल्ली दफ्तर में पहले की तरह मौन सेवा करने लगते। जैसे राजीव गांधी संयोगवश प्रधानमंत्री बन गए थे, वैसे ही संयोगवश नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बन गए।

यह संयोग बढ़ता गया और वे 2014 में प्रधानमंत्री बन गए। लालकृष्ण आडवाणी के मुंह का ग्रास छीनकर मोदी के मुंह में रख दिया गया। देश की जनता ने मोदी को इसलिए प्रधानमंत्री नहीं बनाया कि वे उग्र हिंदुत्व के प्रतीक बन गए थे, इसीलिए भी नहीं बनाया कि उन्होंने गुजरात में कोई विश्व-विश्रुत चमत्कार कर दिखाया था और इसलिए भी नहीं बनाया कि उनके पास विकास का कोई अद्‌भुत माॅडल था। इसके अलावा वे कभी अपने राजनीतिक या आर्थिक चिंतन के लिए भी नहीं जाने गए। उन्हें तो जनता ने बहुत बाद में चुना।

उन्हें चुनाव के पहले ही प्रधानमंत्री बना दिया गया था, सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने! मनमोहन सिंह भारत के ऐसे पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्हें अपने उत्तराधिकारी का पता कई माह पहले ही लग गया था। भारत की जनता अकर्मण्य और भ्रष्टाचारी शासकों से अपना पिंड छुड़ाने के लिए बावली हो गई थी। संयोग था कि इस बावलेपन की खाली जगह मोदी ने भर दी। मोदी ने नेता होने का शानदार और सफल अभिनय किया। कुर्सी खाली हुई और वे उसमें बैठ गए। नेता बन गए! अब उन्हें कौन हटा सकता है? संघ भी उनके आगे दंडवत करता है। अब नेता होने का अभिनय करने की क्या जरूरत है? अब अभिनेता होना ही काफी है। रंगमंच पर एक से एक डायलाॅग बोलकर और रंग-बिरंगे कीमती कपड़े पहनकर हमारे चाय वाले भाई ने अभिनय में मुंबइया सितारा अभिनेताओं को भी मात कर दिया है।

अब फिर नया संयोग बन गया। हमारे प्रिय अभिनेता को उससे भी बड़ा अभिनेता मिल गया। अरविंद केजरीवाल! केजरीवाल कोई नेता नहीं हैं। आंदोलनकारी होने का भी उनका अनुभव कोई लंबा नहीं है। जिस आंदोलन के वे उपनेता थे, वह भी क्या आंदोलन था? न उसका कोई सिर था न पैर! आज तक लोकपाल खूंटी पर ही टंगा हुआ है। वह लोकपाल का आंदोलन नहीं था। वह था, भ्रष्टाचार के विरुद्ध स्वतःस्फूर्त जनोत्थान। आंदोलन के गुरु गुड़ रह गए और चेला बन गया शकर! चेले ने पिछले साल दिल्ली में 28 सीटें जीत लीं लेकिन विपक्ष में बैठकर आंदोलन चलाने की बजाय वह मुख्यमंत्री की फिसलपट्‌टी पर दौड़ने लगा। 49 दिन में उसने सिद्ध कर दिया कि न तो उसमें परिपक्वता है, न दृष्टि है और न ही अनुकरणीय आचरण है, जो नेता बनने के लिए जरूरी है। इस चुनाव में केजरीवाल के कारण केजरीवाल को 10-15 सीटों से ज्यादा नहीं मिल सकती थीं, लेकिन फिर संयोग काम आया। अचानक मोदी के छक्के छूट गए। जेटली की केटली में मोदी और अमित शाह बंद हो गए।

केटली में जबर्दस्त भाप भर गई। उसका ढक्कन खोलने के लिए किरण बेदी नामक संडासी बाहर से मंगाई गई। ढक्कन तो खुला नहीं, केटली फट गई। दिल्ली की भाजपा लहूलुहान हो गई! मोदी की चाय बिखर गई। और अरविंद की लाॅटरी खुल गई! केजरीवाल ने इस तथ्य को मंजूर किया है। वे खुद चकित थे कि 70 में से 67 सीटें कैसे मिल गईं? पिछले साल खूब रगड़े खाए तो वे अब मंज गए हैं। नम्रता को अपना कंठहार बनाने की सलाह देकर वे सारे कार्यकर्ताओं को मात दे रहे हैं। मोदी ने ऐसी दब्बू सलाह न खुद मानी और न अपनी पार्टी को दी। अब दिल्ली में रगड़ा खाया तो उनकी बोलती बंद है। कितनी जल्दी कोई नेता मोदी से मनमोहन सिंह बन जाता है। वे भूल गए कि जिस जनाक्रोश के चलते उन्हें प्रधानमंत्री पद मिल गया, उसी की कृपा से अब केजरीवाल मुख्यमंत्री बन गए। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जनाक्रोश की यह धारावाहिकता अब भी ज्यों की त्यों बनी हुई है।

मोदी ने अभिनय में नौ माह बिता दिए। यदि केजरीवाल ने मोदी की तरह सिर्फ दो माह भी बिता दिए तो इस देश को निराशा की गर्त में गिरने से कोई रोक नहीं सकता। जनांदोलन से निकली इस पार्टी पर दोहरी जिम्मेदारी है। उसे दिल्ली में सुशासन का नया मॉडल तो पेश करना ही है, देश की राजनीति को नई दिशा भी देनी है। नई दिशा देनी है तो राजनीति के परंपरागत ढर्रे से अपने को बचा के रखना होगा। ताजगी बनाए रखनी होगी, नयापन कायम रखना होगा।

राजनीति के नवोन्मेश की चुनौती इसके सामने हमेशा रहेगी। हाशिये पर पहुंच चुके परंपरागत दलों के आकर्षण से बचना होगा। तेजी से देशव्यापी बनने के लोभ ने पिछली बार इसका ध्यान दिल्ली से भटका दिया था। अब दिल्ली को सर्वोपरि रखना होगा। पूरे देश की निगाह उसकी ओर है। आम आदमी पार्टी को दिल्ली में सत्तापक्ष और देश में विपक्ष की दोहरी भूमिका भी निभानी होगी। वह दिल्ली को देश का दर्पण बना दे और देश को सोते से जगा दे। अगले पांच साल में यदि वह अन्य प्रदेशों में सत्ता से दूर रहे और जनता में घुल-मिल जाए तो वह 68 साल से चली आ रही राजनीतिक जड़ता को भंग कर सकती है। देश में नई राजनीति का सूत्रपात हो सकता है।

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