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निजी अस्पताल या कत्लखाने?

मराठी भाषा में इधर डाॅक्टरों के बारे में एक रपट छपी है। उसके कारण तहलका मचा हुआ है। उसका नाम है- ‘कैफियतः प्रामाणिक डाॅक्टराची’ याने प्रामाणिक डाॅक्टरों के बयान! इस रपट में 78 डाॅक्टरों ने बताया है कि उन्हें मरीज़ों को ठगने के लिए कैसे बाध्य किया जाता है। उन डाॅक्टरों के वरिष्ठ डाॅक्टर और अस्पतालों के मालिक, डाॅक्टरों को मजबूर करते हैं कि वे रोगियों का गलत विश्लेषण करें ताकि साधारण रोग को गंभीर या अति गंभीर बताकर रोगी को मंहगी से मंहगी दवाई दी जाए या फिर उसे शल्य चिकित्सा की भट्ठी में झोंक दिया जाए।

निजी डाॅक्टरों ने भी बड़ी-बड़ी दवा-कंपनियों के साथ सांठ-गांठ कर रखी है। वे डाॅक्टरों को नियमित कमीशन देती हैं। डाॅक्टरों से कहा जाता है कि वे रोगियों को जो भी दवा खरीदने के लिए कहेंगे, उसकी कीमत का 10 या 20 प्रतिशत पैसा डाॅक्टर को मिलेगा। इसी लालच में फंसकर डाॅक्टर लोग रोगियों को मंहगी से मंहगी दवा लिख देते हैं। दवा-कंपनियों में डाॅक्टरों को रिश्वत खिलाने की होड़ लगी रहती है।

निजी अस्पतालों के खर्चे पांच-सितारा होटलों से कहीं ज्यादा होते हैं। जो मरीज लाख-दो लाख रु. का खर्च नहीं उठा सकते हैं, उन्हें अधबीच में ही इन अस्पतालों से धकिया दिया जाता है। फिर भी अनेक मध्यमवर्गीय और नौकरीपेशा लोग भी अपने प्रियजन की जान बचाने की खातिर इन कत्लखानों के दरवाजों पर सिर पटकते रहते हैं। मरीज़ की जान तो बच जाती है लेकिन कर्ज के बोझ से पूरे परिवार का जीवन खतरे में पड़ जाता है।

क्या वजह है कि मध्यमवर्ग और निम्न वर्ग से उठे हुए डाॅक्टर भी निजी अस्पतालों की इस लूट-पाट में शामिल हो जाते हैं? इसका मुख्य कारण है- मेडिकल की पढ़ाई। मेडिकल काॅलेजों में भर्ती होने के लिए छात्रों को लाखों रुपए रिश्वत देनी पड़ती है और पढ़ाई की फीस भी अनाप-शनाप होती है। इसीलिए डाॅक्टर बनने के बाद ये छात्र उस खर्चे को ब्याज समेत वसूलते हैं। इसी कारण उन्हें न तो कोई झिझक होती है और न ही शर्म आती है। तो लूट-पाट की इस बीमारी का इलाज क्या है? जैसा कि मैंने पहले भी सुझाया है, प्रधानमंत्री से लेकर सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि उनका इलाज आम तौर पर सरकारी अस्पतालों में ही हो। इससे उन अस्पतालों की दशा सुधरेगी। लोग वहां ज्यादा जाना पसंद करेंगे। दूसरा, मेडिकल की प्राइवेट पढ़ाई पर प्रतिबंध लगे। सभी मेडिकल कालेजों का राष्ट्रीयकरण कर दिया जाए। तीसरा, निजी अस्पतालों पर कठोर नियमावलि लागू की जाए ताकि वे रोगियों से अंधाधुंध वसूली न कर सकें। दवा-कंपनियों पर कड़ी निगरानी रखी जाए ताकि किसी भी दवा की कीमत लागत से ज्यादा से ज्यादा दुगुनी रखी जाए उससे ज्यादा नहीं।

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