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सरकार के इकबाल पर सवाल

सरकार के गुप्त दस्तावेजों की चोरी इतने बड़े पैमाने पर हो सकती है, इसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता। जब यह खबर शुरु-शुरु में रिसकर बाहर आई तो मैंने सोचा कि ऐसा दुस्साहस तो मनमोहनसिंह की लचर-पचर सरकार में ही हो सकता है। मोदी सरकार के दौरान तो यह हो ही नहीं सकता। मोदी से भाजपा के बड़े-बड़े नेता इतने डरे रहते हैं। भला, सरकारी अफसरों, कर्मचारियों और दलालों की क्या हिम्मत है? उनकी हिम्मत कैसे पड़ सकती है कि वे पेट्रोलियम, वित्त और विदेश मंत्रालय के गोपनीय दस्तावेज़ चुरा लें और उन्हें हमारे देश के धन्ना-सेठों को बेच दें।

कई विदेशी कंपनियां भी इन दस्तावेजों को खरीदती रही हैं। इन दस्तावेज़ में कुछ ऐसे भी हैं, जिनका सीधा संबंध अगले बजट से भी है। सरकार को बधाई कि उसने अपने कई कर्मचारियों, बाहरी दलालों और कई नामी-गिरामी कंपनियों के अधिकारियों को पकड़ लिया है। पुलिस उनसे सारा सच उगलवा रही है। कोई आश्चर्य नहीं कि हमारे रक्षा मंत्रालय और फौज से संबंधित दस्तावेज़ इन अपराधियों के पास से पकड़े जाएं।

ये दस्तावेज़ पिछले कुछ माह में ही चुराए गए हैं। इसका पहला अर्थ क्या हुआ? यही कि ये अपराधी मोदी सरकार और मनमोहन सरकार में कोई फर्क नहीं करते याने मोदी का भय कागज़ी सिद्ध हो रहा है। इसके अलावा देश की नामी-गिरामी कंपनियां भी यह मानती हैं कि जैसे उन्होंने कांग्रेस सरकार को पटा रखा था, वैसे ही वे भाजपा सरकार को भी पटा लेंगी। उन कंपनियों के बड़े अफसरों का पकड़ा जाना यह सिद्ध करता है कि देश के नेताओं और इन कंपनियों में ऊंचे स्तर की सांठ-गांठ जारी है। इस सांठ-गांठ का नुकसान किसे भुगतना पड़ता है? क्या नेताओं को? क्या मंत्रियों को? क्या सरकार को?

 नहीं, बिल्कुल नहीं। इस भ्रष्टाचार का सबसे ज्यादा नुकसान भारत की गरीब जनता को होता है। उससे वसूला गया टैक्स ये कंपनियां डकार जाती हैं। गुप्त दस्तावेज़ों से प्राप्त सूचनाओं के आधार पर वे सरकार को निचोड़ डालती हैं। यही काम विदेशी कंपनियां और अधिक निर्ममता से करती हैं। यह शुद्ध देशद्रोह है। शुद्ध जन-द्रोह है।

 इस अपराध की सजा मामूली नहीं होनी चाहिए। इन लोगों को ऐसी सजा दी जानी चाहिए कि इस तरह का कुकर्म करने वालों की हड्डियों में कंपकंपी दौड़ जाए। मोदी सरकार को चाहिए कि वह देश में अपना इकबाल कायम करे।

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