मुसलमान एक सच्चा लीडर चाहता है

रऊफ अहमद सिद्दीकी

इसमें शक नहीं कि आज़ादी के बाद से लेकर आज तक मुसलमानों को ऐसा कोई नेता नहीं  मिला जिसे वो अपना सच्चा हमदर्द या लीडर मान सकें मौलाना आज़ाद एकमात्र ऐसे नेता थे जो मुसलमानों के अलावा हिन्दू भी जिन्हें अपना लीडर मानते थे मगर क्या वजह है कि उनके बाद मुसलमानों को कोई रहनुमा नहीं मिला कांग्रेस में कई मुस्लिम लीडर आये मगर उन्होंने अपने निजी फायदे के लिए इस कौम को बेच दिया. कांग्रेस ने देखा मुसलमान अपने धार्मिक नेता (उलेमा) के पीछे आंख बंद करके चलते हैं, तो मदनी साहब को बिना चुनाव लड़े ही एम. पी. का दर्जा इस शर्त पर दे दिया कि वो अपने आँख और कान बंद करके कांग्रेस की हाँ में हाँ मिलते रहें.

वो सोचते रहे हमेशा हम मंत्री ही रहेंगे मगर उसके बाद उन्हें उतार फैंक दिया गया. मगर अब कहाँ है वो कोम को बेचने वाले. भारत में दलित समाज फर्श से अर्श पर पहुँच गया सिर्फ ईमानदार नेताओं के बल पर जिन्होंने उन्हें नारा दिया कि शिक्षित बनो, संघर्ष करो और  संगठित रहो. मगर मुसलमान नेताओं और उलेमाओं के शिकार होते रहे. जिसका नतीजा है कि आज शाही इमाम किसी पार्टी को समर्थक देने की बात करता है तो पार्टी समर्थन लेने से इंकार कर देती है क्योंकि इमाम साहब कभी कांग्रेस को तो कभी बी. जे. पी. और कभी समाजवादी या बसपा को समर्थन देने के नाम पर इस कौम को नीलाम करते आ रहे हैं. इमाम साहब ने अपने परिवार का तो फायदा किया मगर मुसलमानों की तरक्की के लिए कुछ नहीं किया या यूँ कहें कि कौम के लिए कुछ करने का कभी उनका मन ही नहीं हुआ. अब बात करें आज के मुस्लिम लीडरों की. नकवी साहब जो बी. जे. पी. के बड़े लीडर हैं.

वो ये बात अच्छी तरह से समझ लें कि वो किसी काबिलियत की वजह से नहीं बल्कि मुसलमान होने की वजह से मंत्री बनते आये हैं. शाहनवाज़ हुसैन भी इसी वजह से पार्टी में हैं. लग्ज़री ज़िन्दगी गुजारो और खामोश रहो. सलमान खुर्शीद, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, आज़म खान जैसे अनेक मुसलमान लीडर हैं जिन्हें अपने और परिवार के सिवा किसी की तरक्की से कोई मतलब नहीं है. इन्हें मुसलमानों की दुर्गति से कुछ लेना-देना नहीं है. हर मुसलमान अपने आप को तुर्रमखां  समझता है. सात सौ सालों तक हुकूमत करने का नशा अभी तक ये कोम उतार नहीं पाई है. अगर मुसलमान उलेमाओं को ही अपना लीडर मानता है तो उन्हें राजनीति में आ जाना चाहिए, ताकि पूरी कोम एक प्लेटफार्म पर आ सके क्योंकि उलेमाओं की एक आवाज़ पर लाखों लोग रामलीला मैदान में आ सकते हैं और जमात-ए-उलेमा हिन्द देवबंद में बेशुमार लोगो को एक जगह बुला सकती है तो समझ लेना चाहिए ये कोम उलेमाओं को अपना लीडर मानती है. उलेमाओं को अपने अन्दर बेहतरीन तरीके की लीडरशिप विकसित करनी होगी तभी इस दबी और कुचली कौम का कुछ भला होगा. इस कौम को एक प्लेटफार्म पर आना होगा. पार्टी चाहे कोई भी हो सभी एक को चुनें तब कहीं  जाकर इज्ज़त मिलेगी. शिक्षा पर ध्यान दें. पढ़े लिखे लोग राजनीति में आयें. देश और समाज को सही दिशा दे सकें. सीधे-सादे लफ्जों में कहें तो आज का मुसलमान एक सच्चा लीडर चाहता है

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