स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ।। 26 ।।

स एष पूर्वेषामपि गुरु: कालेनानवच्छेदात् ।। 26 ।।

 आज गुरु पूर्णिमा है। इस अवसर पर सत्य सनातन संस्कृति सेवा समिति के सौजन्य से आज का पाक्षिक पौर्णमासिक यज्ञ भी संपन्न किया । इसके साथ ही गुरुओं के भी गुरु परमपिता परमेश्वर का इस बात के धन्यवाद ज्ञापित किया कि उनकी बनाई सृष्टि में हमको मानव का चोला मिला हुआ है जिसमें शुभ कर्म करने के लिए समय प्राप्त हुआ है।

शब्दार्थ :- स एष, ( वह ईश्वर ) पूर्वेषाम्, ( पहले उत्पन्न हुए सभी गुरुओं का ) अपि, ( भी ) गुरु, ( ज्ञान देने वाला / विद्या देने वाला है । ) कालेन, ( काल अर्थात समय की ) अनवच्छेदात्, ( सीमा / बाध्यता से रहित होने के कारण । )

  सूत्रार्थ :- वह ईश्वर  काल या समय की सीमा के बन्धन से परे होने के कारण पूर्व में उत्पन्न हुए सभी गुरुओं  का गुरु  है ।

वेद की इस सूक्ति में यह स्पष्ट किया गया है कि गुरु कौन है ? मंत्र का अर्थ करते हुए विद्वानों ने स्पष्ट किया है कि अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले हितकारी पुरुष  को गुरु  कहतें हैं । परमपिता परमेश्वर इस विषय में सबसे अधिक हमारे लिए हितकारी हैं। जिन्होंने सृष्टि ही हमारे कल्याण के लिए बनाई है। उसकी बनाई हुई इस सृष्टि में और इसकी किसी भी कृति में सृजना में किसी प्रकार का कोई दोष नहीं है। यही कारण है कि परमपिता परमेश्वर हम सबका परम गुरु है। संसार के अन्य गुरुओं में कोई दोष हो सकता है, क्योंकि वे मानव के चोले को प्राप्त कर ईश्वर की अपेक्षा कहीं छोटे हो गए हैं ।
हमें यह भी धम्म रखना चाहिए कि संसार में मानव के रूप में जन्म लेने वाले गुरु पूर्व, वर्तमान या भविष्य में काल की सीमा से बंधे हुए हैं । यदि वे संसार में आए हैं तो यहां से जाएंगे भी। सदा रहने वाला तो केवल एक परमपिता परमेश्वर ही है। इसी प्रकार हमारे इस शरीर में विराजमान आत्मा भी सत्य सनातन है। सत्य सनातन का सनातन के साथ ही मेल हो सकता है, इसलिए हमारा परम गुरु परमपिता परमेश्वर ही है।
परमपिता परमेश्वर ने वेदो का ज्ञान अग्नि, वायु ,आदित्य और अंगिरा जैसे ऋषियों को प्रदान किया। उसके पश्चात गुरुओं की एक परम्परा प्रारंभ हो गई जो गुरु पहले दिन हुआ था , वह एक समय विशेष तक रहकर संसार से चला गया। इसी प्रकार आज तक संसार से अनेक गुरु चले गए हैं। इसलिए विद्वानों का मानना है कि जो गुरु पूर्व में उत्पन्न हुए थे वो वर्तमान में नही हैं और जो वर्तमान में हैं वह भविष्य में नहीं होंगे । साथ ही जो भविष्य में उत्पन्न होने हैं उनकी भी समय सीमा निश्चित है ।
एक समय के बाद सभी को इस सृष्टि से चले जाना है । लेकिन ईश्वर  इस समय की सीमा से ऊपर अर्थात परे  है । ईश्वर को काल या समय प्रभावित  नही कर सकते । इसी कारण से वह ईश्वर पूर्व में उत्पन्न सभी गुरुओं का गुरु है ।
वह ईश्वर जैसा सृष्टि के आरम्भ में अपने ज्ञान व ऐश्वर्य  से युक्त  था ठीक उसी प्रकार वह उससे भी पूर्व की सृष्टियों / काल में ज्ञान व ऐश्वर्य युक्त  रहा है । इस प्रकार ईश्वर के स्वरूप को समझना चाहिए ।
आज गुरु पूर्णिमा पर इन्हीं भावों के साथ अपने परम गुरु परमपिता परमेश्वर का ह्रदय से स्मरण किया।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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