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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

इस देश का यारों क्या कहना ?

संसार का सबसे उत्तम देश- भारत। संसार का सबसे पराक्रमी देश – भारत। संसार का सबसे शौर्य संपन्न देश – भारत। पर क्या कारण है कि इस सबके उपरांत भी भारत के लोग अपने शौर्य संपन्न पराक्रमी इतिहास को नहीं जानते ? कारण केवल एक है कि दीर्घकाल से इस देश के पराक्रमी, शौर्य संपन्न इतिहास के साथ गंभीर छेड़छाड़ की जाती रही है।
आइए, अपने गौरवशाली इतिहास के एक अमूल्य पृष्ठ पर दृष्टिपात करते हैं। जिसके एक – एक स्वर्णिम शब्द को पढ़कर आपका ह्रदय गर्व और गौरव से भर जाएगा । आपको लगेगा कि संसार में आर्य जाति सबसे उत्तम क्यों मानी जाती है? अनुपम शौर्य और साहस से भरी इस घटना के बारे में जानकार आपको यह भी स्पष्ट हो जाएगा कि भारत के शौर्य के समक्ष संसार के किसी भी देश का शौर्य टिकता नहीं है।
महाराणा प्रताप जैसे शौर्य संपन्न और हमारे देश के इतिहास के गौरव की मृत्यु के पश्चात देश के शौर्य और साहस की कमान उनके पुत्र अमर सिंह ने संभाली। कई लोगों की दृष्टि में महाराणा प्रताप के पिता उदय सिंह और उनके पुत्र अमर सिंह महाराणा प्रताप की अपेक्षा बहुत ही छोटे कद के हैं। परंतु इस बात को एकदम सत्य नहीं माना जा सकता। उन दोनों ने भी अपने-अपने काल में इतिहास को गौरवशाली ढंग से रचा और आगे बढ़ाया। भारत की की गौरवशाली क्षत्रिय परंपरा में उन्होंने भी अपने अपने समय में चार चांद लगाने का प्रयास किया।
मेवाड़ के महाराणा अमर सिंह की सेना ने एक बार नहीं कई बार मुगल सेना के छक्के छुड़ाए थे। उन्होंने अपने पिता की परंपरा का पूरा ध्यान रखा। उनकी सेना में उस समय दो राजपूत रेजीमेंट चूण्डावत और शक्तावत थीं। देशभक्ति ,अपूर्व साहस और शौर्य की भावना से ओतप्रोत यह दोनों रेजीमेंट अपने आपको श्रेष्ठतम और अधिक से अधिक देशभक्ति पूर्ण दिखाने के लिए सदैव प्रयासरत रहती थीं। इन दोनों में इस बात की प्रतिस्पर्धा रहती थी कि सेना के अग्रिम मोर्चे का नेतृत्व किसके हाथ में रहेगा? चुंडावत रेजीमेंट के पास यह गौरव अक्सर रहता था। उस गौरवशाली स्थान को प्राप्त करने के लिए शक्तावत सैन्य दल के वीर सैनिक भी अपने आपको प्रमाणित करने के लिए प्रयास करते रहते थे । ज्ञात रहे कि उस समय युद्ध में सबसे आगे रहने वाले सैन्य दल को ‘हरावल’ कहा जाता था।
चूण्डावत अपनी वीरता, शौर्य,साहस और पराक्रम के कारण हरावल का नेतृत्व करने की क्षमता को खोना नहीं चाहते थे। उन्हें इस बात पर बहुत अधिक गर्व और गौरव की अनुभूति होती थी कि हरावल का नेतृत्व उनके हाथ में रहता है। इस बात को शक्तावत सैन्य दल के लोग अपने लिए एक चुनौती मानते थे।
एक बार शक्तावत सैन्य दल के अधिकारियों ने जाकर महाराणा अमर सिंह से यह इच्छा व्यक्त की कि उन्हें हरावल का नेतृत्व दिया जाए। महाराणा अमर सिंह इस महत्वपूर्ण प्रश्न का उत्तर एकदम नहीं दे सकते थे।
निश्चित रूप से महाराणा अमर सिंह के इस प्रकार के निर्णय का चुंडावत सैन्य दल पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता था। यही कारण था कि महाराणा अमर सिंह ने दोनों सैन्य दलों को अपने आपको एक बार फिर प्रमाणित करने का अवसर देने का निर्णय लिया। जब इन दोनों सैन्य दलों के अधिकारियों / सरदारों को इस बात की जानकारी हुई तो उन्होंने सहर्ष इस प्रकार की चुनौती को स्वीकार किया और इस बात पर सहमति व्यक्त की कि वे अपने पराक्रम को सिद्ध करके ही हरावल का नेतृत्व करने के प्रश्न का उत्तर अपने आप देंगे।
महाराणा अमर सिंह ने इस नई स्थिति का सामना बड़े विवेक से किया। उन्होंने कहा कि तुम दोनों दलों को उंटाला नाम के दुर्ग पर अलग-अलग दिशा से एक साथ आक्रमण करना होगा। उस समय उंटाला दुर्ग जहांगीर के सरदारों के नियंत्रण में था। मुगल बादशाह के विशाल सैन्य दल की सबको जानकारी थी। सब को भली प्रकार यह ज्ञान था कि इस दुर्ग पर आक्रमण करने का अर्थ क्या है?
महाराणा अमर सिंह ने दोनों दलों के सरदारों को बताया कि आप विपरीत दिशा से इस किले पर हमला करोगे और जो इस किले को तोड़कर भीतर पहुंचने में पहले सफल होगा, वही आगे से मेवाड़ की सेना के हरावल दल का नेतृत्व करेगा। जहांगीर के नियंत्रण में रहे इस किले का किलेदार उस समय फतेहपुर का नवाब समस खान था। चुनौती बहुत बड़ी थी , परंतु जब हौसले चुनौतियों से कई गुना बड़े हों तो चुनौतियां कुछ भी नहीं रह जाती हैं। चुनौतियों का अपना कोई कद नहीं होता, उनका कोई अपना आकार नहीं होता। उनके आकार को सदा हौसले नापा करते हैं। जब भारत के क्षत्रिय शूरवीरों की बात आए तो उनके विषय में तो निश्चित रूप से बड़े गौरव के साथ यह कहा जा सकता है कि उनके हौंसले तो सदा ही प्रत्येक विषम परिस्थिति या चुनौती से ऊंचे रहे हैं। महाराणा अमर सिंह के दोनों सैन्य दलों के सरदारों ने अपने महाराणा के इस आदेश को सहर्ष स्वीकार किया। आदेश को स्वीकार करने के पश्चात दोनों सैन्य दल अपनी वीरता को प्रमाणित करने के लिए निर्धारित किए गए दुर्ग पर प्रथम विजय प्राप्त करने की भावना से दौड़ पड़े।
दौड़ती हुई सेना अंततः उंटाला दुर्ग के निकट जा पहुंची। युद्ध आरंभ हो गया। किले के मुख्य द्वार को तोड़ने के लिए शक्तावत सैन्य दल के वीर सैनिकों और सरदारों ने प्रयास करना आरंभ किया। उधर चुंडावत सरदारों ने रस्सी के सहारे किले की दीवार को लांघने का प्रयास करना आरंभ किया। दोनों ही सैन्य दलों ने अपने प्राणों की बाजी लगाकर शर्त को जीतने का निश्चय कर लिया था। यही कारण था कि उन क्षणों में दोनों और सैन्य दलों के सैनिकों और सरदारों के लिए प्रण की कीमत के सामने प्राणों की कीमत कुछ भी नहीं रही थी। प्राण जाए पर वचन न जाई- की भावना से प्रेरित होकर उस समय प्रण का सम्मान रखने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार थे।
उस किले के मुख्य द्वार पर नुकीले शूल अर्थात लोहे की कीलें लगी हुई थीं। जिसके कारण हाथी दरवाजों को तोड़ने में हिचक रहे थे। क्योंकि जब हाथी अपने मस्तक का बल दरवाजों पर लगाते थे तो उनके मस्तक में वह नुकीली कीलें चुभती थीं। जिससे वे पीछे हट जाते थे। यह बड़ी विषम स्थिति उत्पन्न हो गई थी। हाथी सैनिकों को निराश कर रहे थे और समय तेजी से हाथ से निकल रहा था । यदि चुंडावत सरदारों ने विजय प्राप्त कर ली तो हरावल दल के नेतृत्व करने की जिस इच्छा को शक्तावत सरदारों ने महाराणा के समक्ष प्रकट किया था, वह पूरी नहीं हो सकती थी। कहने का अभिप्राय है कि थोड़े समय में शीघ्र से शीघ्र महत्वपूर्ण निर्णय लेना था।
जब महत्वपूर्ण क्षण आते हैं तो महत्वपूर्ण बलिदान लेकर ही जाते हैं। और अब शक्तावत सरदारों के समक्ष भी कोई महत्वपूर्ण बलिदान देने के क्षण आ चुके थे। समय सोचने का नहीं था, कुछ कर दिखाने का था। फलस्वरूप सरदार बल्लू ने अपना सीना कीलों के सामने अड़ा दिया। बात स्पष्ट थी कि फाटक को पहले खोलने के लिए और किले में चुंडावतों से पहले प्रवेश करने की प्रतिस्पर्धा में प्राणों की बाजी लगाकर सरदार बल्लू ने पहले अपना बलिदान देने की तैयारी कर ली थी। कीलों के सामने छाती अड़ाकर खड़े होने का अर्थ था कि पीछे से हाथी आकर उनकी कमर में टक्कर मारेगा और शूल उनकी छाती में घुस जायेंगे, जिससे उनका बलिदान तो होगा पर दरवाजा टूट जाएगा। ऐसा ही हुआ भी। जब सरदार बल्लू इस प्रकार अपने आप को किलों के सामने खड़े कर रहे थे तब उन्होंने महावत को संकेत किया कि वह अपने हाथी को दौड़ता हुआ लेकर आए तो इस पर महावत ने ऐसा करने से इनकार किया, परंतु कठोर शब्दों में सरदार बल्लू ने महावत से फिर कहा कि जो कह रहा हूं ,वही करो। तब महावत ने अपने हाथी को संकेत किया और वह तेज गति से दौड़ता हुआ आया। आते ही उसने जोरदार टक्कर सरदार बल्लू की पीठ पर मारी, जिससे दरवाजा टूट गया, परंतु बल्लू का बलिदान भी हो गया। एक साथी के बिछुड़ जाने का गम किसी को नहीं था, प्रसन्नता इस बात की थी कि एक साथी के सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने के बाद हम किले में प्रवेश करने में सफल हो गए हैं। साहस और शौर्य की पराकाष्ठा थी यह। हर कोई अपने साथी के इस बलिदान पर न केवल गौरव की अनुभूति कर रहा था बल्कि हृदय से नतमस्तक होकर उसे नमन भी कर रहा था।
पर यह क्या? उधर चुंडावत सरदारों ने जब देखा कि शक्तावत उनकी उनके लिए एक बहुत बड़ी चुनौती खड़ी कर चुके हैं और वे उनके हरावल के नेतृत्व करने के गौरवपूर्ण सम्मान को उनसे अब छीनने ही वाले हैं तो उन्होंने भी पराक्रम का एक अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करने का संकल्प ले लिया। जिस प्रकार बल्लू ने अपने आप को सर्वोत्कृष्ट बलिदान के लिए प्रस्तुत किया था उसी प्रकार चूंडावत सरदार जैतसिंह ने भी अपने आपको बलिदान के लिए सहर्ष समर्पित कर दिया। जैतसिंह ने अपने साथियों को यह आदेश दिया कि वह उनका सिर काटकर किले के भीतर फेंक दें, जिससे कि किले में पहले प्रवेश का गौरव उनको प्राप्त हो जाए। जैत सिंह के इस प्रकार के आदेश को सुनकर किसी भी सैनिक का यह साहस नहीं हुआ कि वह अपने सरदार का गला काटकर किले के भीतर फेंक दें। तब अनुपम शौर्य का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए जैत सिंह ने स्वयं अपना सिर काट कर किले के भीतर फेंक दिया।
कहते हैं कि वीर और परमवीर में क्षणों का ही अंतर होता है और यह बात यहां पूर्णतया फलीभूत हो गई। शक्तावतों ने बल्लू के बलिदान के पश्चात यह मन बना लिया था कि अब वह किले में प्रवेश पाने के पश्चात मेवाड़ की सेना में हरावल का नेतृत्व करने के गौरवपूर्ण पद को प्राप्त कर लेंगे। परंतु भीतर जाकर जब उन्होंने देखा कि वहां पर चुंडावत सरदार जैतसिंह का कटा हुआ सिर पहले ही पड़ा हुआ था तो उसके शौर्य के समक्ष वह भी नतमस्तक हो गए। सरदार जैतसिंह के इस अनुपम बलिदान के पश्चात यह स्पष्ट हो गया कि हरावल का नेतृत्व करने का गौरवपूर्ण पद एक बार फिर चुंडावत सरदारों के पास ही रहेगा।

मित्रों !
यह देश है वीर जवानों का,
अलबेलों का मस्तानों का,
इस देश का यारों क्या कहना ?
यह देश है दुनिया का गहना।

इस देश की संस्कृति को मिटाने वाले कम पड़ गए, इसकी रक्षा करने वालों की कभी कमी नहीं रही। इन दोनों शूरपुत्रों के बलिदान हमें यही बताते हैं कि संस्कृति की रक्षा के लिए इस देश में एक से एक बढ़कर बलिदानी शूरपुत्र पैदा हुआ है। आज भी जिन षड़यंत्रों के अंतर्गत भारतीय संस्कृति का विनाश करने की तैयारियां चल रही हैं ,उनके विरुद्ध भी प्रत्येक देशभक्त भारतीय को इसी प्रकार के शौर्य और साहस का परिचय देने के लिए उठ खड़ा होना चाहिए। क्रांति कभी कह कर नहीं आती है, जिस प्रकार सूर्य के उदय होने से पहले आकाश में पौ फटती है उसी प्रकार क्रांति से पहले उसकी परिस्थितियां बन जाया करती हैं। आज की चुनौतियों को और देश की फिजाओं में फैल रही ललकार और पुकार को समझने की आवश्यकता है ।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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