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ढाई हजार वर्ष पहले था भारत के इतिहास का अंधकार काल ?

भारत के इतिहास के बारे में जब हम पढ़ना आरंभ करते हैं तो भारत से द्वेष रखने वाले इतिहासकारों के द्वारा ऐसा आभास कराया जाता है कि जैसे पिछले 2000 वर्ष से पूर्व का भारत का सारा अतीत अंधकार का है। पढ़ने से कुछ ऐसा लगता है कि जैसे
भारत के पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जिस पर वह गर्व और गौरव की अभिव्यक्ति कर सके। भारत के लोगों को हीन भावना से ग्रसित करने के उद्देश्य से प्रेरित होकर लिखा गया ऐसा इतिहास भारत के इतिहास के स्रोतों में वेदों को कोई स्थान नहीं देता। जबकि सच यही है कि वेदों के आलोक में यदि इतिहास को लिखा, पढ़ा व समझा जाए तो भारत के इतिहास पर लगा यह आक्षेप स्वत: निरस्त हो जाएगा कि भारत के इतिहास में कोई अंधकार का काल भी है। वेदालोक को देखकर हम स्वयं अनुमान लगा लेंगे कि जहां वेदों की ऋचाओं के माध्यम से हमारे ऋषि मुनि उत्कृष्ट ज्ञान चर्चा किया करते थे वहां प्रकाश के अतिरिक्त कुछ और हो ही नहीं सकता।
वेदों की जानकारी होने पर अपने आप पता चल जाता है कि भारत के इतिहास का शुभारंभ दिव्य प्रकाश के साथ होता है।
सृष्टि के प्रारंभ में ही परमपिता परमेश्वर ने जिस प्रकार वेदों को अग्नि, वायु, आदित्य, अंगिरा नामक चार ऋषियों को अर्पित किया , उससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जब तक यह सृष्टि है तब तक के लिए परमपिता परमेश्वर ने सृष्टि के प्रारंभ में ही हमारे ऋषियों को वेद के रूप में एक ‘संविधान’ प्रदान किया था। ।
वैदिक ग्रंथ हमारे इतिहास के ऐसे स्रोत हैं जिनको समझकर हमें अपने ऋषियों के ज्ञान विज्ञान की विशद जानकारी होती है।
जिन ब्राह्मण ग्रंथों में देवासुर संग्राम की अनेक घटनाओं को वर्णित किया गया है, उन्हें या तो इतिहासकारों ने समझा नहीं है या अपनी अपनी कल्पनाओं के आधार पर उनकी गलत गलत व्याख्याएं स्थापित कर हमारे इतिहास को विद्रूपित करने का प्रयास किया है। हमें अपनी संस्कृत से काटकर संस्कृति से दूर करने का गंभीर षड़यंत्र रचा गया।
हमने संसार में संपूर्ण ज्ञान – विज्ञान के आधार रहे वेद के आलोक में आगे बढ़ना आरंभ किया। यदि इतिहास को इस दृष्टिकोण से देखा जाएगा तो अपने आप स्पष्ट हो जाएगा कि भारत के लोग जंगली जानवरों की भांति व्यवहार करने वाले कभी नहीं थे। उन्होंने ऋषियों के आश्रमों में रहकर गहन ज्ञान विज्ञान को प्राप्त किया। उस ज्ञान विज्ञान से अनेक प्रकार के आविष्कार किये। ऋषि कणाद जहां प्राचीन काल में परमाणु का ज्ञान रखते थे, वहीं ऋषि भारद्वाज विमान बनाने की कला में पारंगत थे। अनेक ऋषि इसी प्रकार के ज्ञान – विज्ञान के आविष्कार कर मानवता की सेवा कर रहे थे। वे जंगली जानवरों की भांति लड़ने झगड़ने वाले और कबीलों में रहकर एक दूसरे के कबीलों का नाश करने की योजनाओं को बनाने वाले लोग नहीं थे। अंधकार काल उसे कहते हैं जहां तमस छाया हुआ हो। तामसिक वृत्तियां जहां पर हावी हों, वहां अंधकार होता है। जबकि भारत के अतीत के इन पन्नों का अवलोकन करने से स्पष्ट होता है कि यहां पर तमस नहीं बल्कि सात्विकता का पवित्र भाव सर्वत्र छाया हुआ था। सात्विकता के इसी पवित्र भाव में ज्ञान विज्ञान फलता फूलता है। क्योंकि सात्विकता शांति का प्रतीक है और शांति उन्नति कराती है।
यदि भारत ऋषियों का देश है । ऋषियों के माध्यम से ही यहां ज्ञान विज्ञान फला फूला है । ऋषियों की सात्विकता ने भारत को भारत बनाने में अर्थात ज्ञान की दीप्ति में रत रहने वाला एक पवित्र देश या राष्ट्र बनाने में सहायता की है तो हमें इस आक्षेप से यथाशीघ्र मुक्ति पानी होगी और यह स्थापित करना होगा कि भारत संसार का सबसे पवित्र देश है जो वेदों के आलोक में पला बढ़ा है। भारत के इतिहास में कोई अंधकार का काल इसलिए भी नहीं हो सकता कि संसार में केवल भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो तमसो मा ज्योतिर्गमय अर्थात अंधकार से प्रकाश की ओर चलने की उपासना करता आया है।
अब प्रश्न यह है कि ऐसा आक्षेप क्यों लगाया जाता है कि भारत पिछले 2000 साल से पहले घुप्प अंधेरे में खोया हुआ था? इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए ऐसा आरोप लगाने वाले लोगों की मानसिकता को पढ़ने समझने की आवश्यकता है। जिन लोगों ने भारत पर ऐसा आरोप लगाया है उनकी मानसिकता भारत को कम करके आंकने की रही है। ये वही लोग हैं जो अपने मत पंथ संप्रदाय और अपने धर्म गुरुओं को भारत के ऋषि महर्षियों के चिंतन से भी ऊंचा सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। यदि भारत को ऋषि महर्षियों का देश माना जाएगा तो भारत को कम करके आंकने वाले इन इतिहास लेखकों की मान्यताओं को भूमिसात होने में देर नहीं लगेगी। इसलिए वह यही शोर मचाते रहेंगे कि भारत अब से लगभग 2000 वर्ष पहले जंगली लोगों का देश था।
जिन लोगों ने भारत के ऋषि पूर्वजों को जाहिल समझा है , उन्होंने देश के साथ पाप किया है।
आज समय अपने तथाकथित अंधकार के काल को तमसो मा ज्योतिर्गमय की पवित्र विचारधारा के साथ समन्वित करके देखने का है। जितनी शीघ्रता से हम इस पवित्र भावना के साथ अपने राष्ट्रीय संकल्प को समर्पित कर देंगे, उतनी ही से शीघ्रता से हम देखेंगे कि भारत विश्व गुरु के पद पर विराजमान हो जाएगा।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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