वैदिक सम्पत्ति तृतीय खण्ड : अध्याय-ईसाई और आर्यशास्त्र

Devendra singh arya


गतांक से आगे..

स्वामी विवेकानन्द की इस वक्तृता से स्पष्ट हो जाता है कि , थियोसोफिस्ट भारत का उत्कर्ष नहीं चाहते । उनका उद्देश्य तो संसार को ईसाई बनाना है । एनी बीसेंट सब धर्मावलम्बियों को थियोसोफी में केन्द्रित करके ईसा को संसार का धर्मगुरु मनवाने का यत्न करती हैं और कृष्णमूर्ति को ईसा का अवतार बनाकर वर्तमान विज्ञान के टूटे फूटे और झूठे चमत्कारों से भोलेभाले लोगों को उनके धर्म से पतित करना चाहती हैं । इस कृष्णमूर्ति के नवीन अवतार पर यद्यपि आजकल थियोसोफिस्टों में भी असन्तोष फैल रहा है,तथापि एनी बीसेंट ईसाईधर्मप्रचार की नहीं सुनतीं।ये कृष्णमूर्ति कौन हैं और इनके विषय में क्या चरचा है,यहाँ थोड़ासा इसका भी वर्णन करते हैं ।
कृष्णमूर्ति एक मद्रासी ब्राह्मण के पुत्र हैं। इनके पिता तहसीलदार थे । एनी बीसेंट ने कृष्णमूर्ति को उनके पिता से शिक्षा देने के लिये मांग लिया और लेडबिटर नामी अपने एक सहायक के सुपुर्द कर दिया। परन्तु लेडबिटर के पास रखना कृष्णमूर्ति के पिता को मंजूर न हुआ , इसलिए उन्होंने अपने पुत्र को वापस लेना चाहा । वापस न देने पर उन्होंने अदालत में दावा किया , पर अदालत ने उनको उनका पुत्र न दिलाया और कृष्णमूर्ति शिक्षा प्राप्त करने के लिए योरप भेज दिए गये अब वे वहाँ से शिक्षा प्राप्त करके यहाँ आ गये हैं । सन् 1926 ई० में मद्रास प्रांत के के अद्यार नामी कसबे में संसार की समस्त जातियों के दो हजार थियोसोफिस्ट प्रतिनिधियों की उपस्थिति में एक वटवृक्ष के नीचे कृष्णमूति का ‘ नवीन मसीहा ‘ के रूप में अभिषेक हुआ। इस नवीन मसीहा के विषय में एनी बीसेंट ने कहा कि नवीन मसीहा संसार के समस्त धर्मों की ऐक्यता करने के लिए अवतरित हुए हैं । इसी तरह पेरिस में स्वयं कृष्णमूर्ति ने भी कहा कि , मैं संसार में उदारता , प्रेम , तितिक्षा और सब धर्मों की एकता का प्रचार करता हूँ ।

परन्तु इस नवीन मसीहा के विरुद्ध आज समस्त थियोसोफीमंडल में आन्दोलन हो रहा है। सभी इस पाखण्ड का खण्डन कर रहे हैं । लण्डन थियोसोफी लॉज के प्रेसीडेंट लेफ्टिनेंट कर्नल सी ० एल ० पीकॉक ने लिखा है कि , बीसेंट का यह नया धर्म थियोसोफी के वास्तविक रूप के विरुद्ध है । इसी तरह केलीफोर्निया और न्यूयार्क के नेताओं ने भी इस नवीन मसीहा सम्बन्धी निश्चय का विरोध किया है । सब कहते हैं कि एनी बीसेंट कृष्णमूर्ति को क्राइस्ट का अवतार बनाना चाहती हैं और वे यह भी चाहती हैं कि सब थियोसोफिस्टों का धर्मचिह्न क्रॉस हो , परन्तु अनेकों ने इसे अस्वीकार कर दिया है । इस तरह कृष्णमूर्ति को ईसा का अवतार बनाने के प्रयत्न की सबने निन्दा की है । जेकोस्लाविया , फ्रांस और मद्रास आदि के लोगों ने उनके इस नये धर्म की निन्दा की है। इस सम्बन्ध में पेरिस के ‘ इवनिङ्ग वर्ल्ड ‘ नामी पत्र ने लिखा है कि, कृष्णमूर्ति कहता है कि , मेरे कमजोर कन्धों पर क्यों यह धर्म का बोझ लादा जा रहा है ।
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भारते विवेकानन्द , आभार समरनीति ।
अभी हाल में खबरें आई हैं कि कृष्णमूर्ति ने अब इस गुरुडम से अपने को पृथक कर लिया है और प्रार्डर आफ दि ईस्ट नामी पन्थ ( जो एनी बीसेंट ने कृष्णमूर्ति के लिये बनाया है ) से जुदा हो गये हैं । इस घटना से शर्मिन्दा होकर आाप कहती हैं कि कृष्णमूर्ति अवतार हैं और इससे ज्यादा बुद्धिमान् हैं , इसलिये जो कुछ करते हैं सब ठीक ही है ।
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मुझे तो टेनिस खेलने में जितना मानन्द जाता है , उतना और किसी बात में नहीं । इसी से अमेरिकावाले दिल्लगी से कृष्णमूर्ति को टेनिसप्रेमी मसीहा कहते हैं । नवीन मसीहा के इस समस्त वर्णन से स्पष्ट हो रहा है कि किस प्रकार ऐनी बीसेंट भारतवासियों को ईसाई बनाना चाहती है । बड़े मार्के की बात तो यह है कि एनी बीसेंट को ईसा का अवतार बनाने के लिए आदमी भी कहाँ मिला ? वहीं मद्वारा में – द्रविड़ों में । वहीं से तो आर्यो के वैदिक धर्म के नष्ट करने और आर्यो को पतित करने का सूत्रपात ही हुआ है । यह बात थियोसोफिस्ट जानते हैं । उन्होंने यह सब समझ बूझकर ही अपना अड्डा मद्रास प्रान्त में लगाया है ।

क्रमशः

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