कश्मीर में आतंकवाद , अध्याय 16 (ख)पुलवामा हमला और एयर स्ट्राइक

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पुलवामा हमला और एयर स्ट्राइक

14 फरवरी 2019 को जैश-ए-मोहम्मद के आतंकवादियों ने पुलबामा में सुरक्षाबलों पर हमला किया। इस हमला में विस्फोटकों से लदे वाहन से सीआरपीएफ जवानों की बस को आतंकवादियों ने टक्कर मारी। इस हमला में 40 जवान अपना बलिदान देकर अमर हो गए। घटना के कुछ समय बाद ही सारे देश में समाचार माध्यमों के द्वारा यह समाचार जंगल की आग की भांति फैल गया। अपने 40 जवानों के इस प्रकार बलिदान हो जाने की घटना ने सारे देशवासियों को आहत करके रख दिया। इस घटना के माध्यम से आतंकवादियों ने केंद्र की मोदी सरकार को एक नई चुनौती प्रस्तुत की। उन्होंने न केवल अपने अस्तित्व का आभास भारत की पूरी व्यवस्था के समक्ष प्रकट किया अपितु यह भी बताने का प्रयास किया कि वे कश्मीर की ‘मुकम्मल आजादी’ के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उन्होंने केंद्र सरकार को यह बताया कि वह रक्तपात व मारकाट सहित किसी भी विकल्प को चुनने और अपनाने के लिए स्वतंत्र हैं।
यद्यपि उनको यह ज्ञात नहीं था कि अब केंद्र में एक मजबूत सरकार बैठी हुई है जो उनके इस प्रकार के चुनौतीपूर्ण कार्य को चुनौती के रूप में लेने के लिए ही तैयार थी। जब इस प्रकार का कायरता पूर्ण हमला इन आतंकवादियों की ओर से किया गया तो भारत सरकार ने उसका मुंहतोड़ उत्तर देने का निर्णय लिया। पुलवामा हमले के ठीक 12 दिन पश्चात भारतीय वायुसेना ने बालाकोट स्थित जैश-ए-मोहम्मद के शिविर पर एयर स्ट्राइक की। कुल 12 मिराज विमान पाकिस्तानी सीमा में प्रविष्ट हुए और बालाकोट में बम बरसाए गए। कार्यवाही में सैकड़ों आतंकी मारे गए। भारत की शौर्य संपन्न सेना ने आतंकवादियों को भूनकर रख दिया। जब यह कार्यवाही हो रही थी तब पाकिस्तान को यह कर्त्तव्यबोध नहीं हुआ कि वह अपने द्वारा पाले गए आतंकवादियों को किसी प्रकार का संरक्षण दे सके। इसका कारण केवल एक था कि उस समय पाकिस्तान यह भली प्रकार समझ रहा था कि यदि उसने अपने द्वारा पाले गए आतंकवादियों को किसी प्रकार का सहयोग ,समर्थन व संरक्षण देने का प्रयास किया तो जैसे भारत की सेना इस समय आतंकवादियों को भून रही है वैसे ही वह पाकिस्तान को भी भूनेगी।

वीरता का इस प्रकार दिया था परिचय

इस घटना के 2 वर्ष पूर्ण होने के समय ‘अमर उजाला’ ने लिखा था – ‘पुलबामा में शहीद हुए भारत के 40 जवानों की शहादत का बदला 12 मिराज लड़ाकू विमानों ने लिया था। भारतीय वायुसेना के सूत्रों के हवाले से कहा गया था कि 26 फरवरी के तड़के भारतीय लड़ाकू विमान मिराज 2000 के एक समूह ने एलओसी पार कर पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में आतंकी कैंप पर बमबारी की और उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया। आतंकी कैंप पर 1000 किलो के बम गिराए गए थे। इस अभियान में 12 मिराज विमानों ने हिस्सा लिया था।
26 फरवरी को भारत की ओर से बालाकोट में की गई एयरस्ट्राइक से ठीक 12 दिन पहले 14 फरवरी को केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के काफिले पर आत्मघाती हमला हुआ था। इस हमले में 40 भारतीय जवान शहीद हो गए थे। हमले की जिम्मेदारी मसूद अजहर के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद ने ली थी। जिसके बाद से ही भारत में पाकिस्तान से बदला लेने की मांग तेज हो गई थी।”
भारत की पराक्रमी और शौर्य संपन्न सेना ने आतंकवादियों और उनके आकाओं को अपनी इस कार्यवाही के माध्यम से खुली चुनौती दे दी थी। उन्हें यह स्पष्ट कर दिया था कि भारत अब किसी भी कार्यवाही का मुंहतोड़ उत्तर देगा ।वे दिन लद गए हैं जब आतंकवादियों की घटनाओं को सहन कर लिया जाता था। अब भारतीय सेना के लिए ‘अच्छे दिन’ आ चुके हैं। जब वह खुले हाथों से आतंकियों का सफाया करने के लिए स्वतंत्र है।

जननायक मोदी और देश के आम चुनाव

उस समय तक प्रधानमंत्री मोदी अपने आपको एक जननायक के रूप में स्थापित कर चुके थे। देश के मतदाताओं ने 2019 के आम चुनावों में उनके इस जननायक स्वरूप को मान्यता प्रदान करते हुए उनकी पार्टी और पार्टी के सहयोगियों को 2014 के आम चुनाव की अपेक्षा और भी अधिक सीटें दीं। इस प्रकार देश के लोगों ने मोदी जी के दोबारा प्रधानमंत्री बनने का समर्थन करते हुए उनका मार्ग प्रशस्त कर दिया। लोकसभा में शानदार बहुमत लेकर प्रधानमंत्री श्री मोदी दोबारा देश के प्रधानमंत्री बने। इस बार उन्होंने देश का गृहमंत्री श्री अमित शाह को बनाया। प्रधानमंत्री श्री मोदी के हाथों में देश की बागडोर सौंपकर देश की जनता ने श्री मोदी के कार्यों पर अपनी सहमति की मोहर लगा दी।
कहा जाता है कि श्री मोदी ने अपनी पहली सरकार के गृहमंत्री श्री राजनाथ सिंह से भी कश्मीर समस्या के समाधान के लिए धारा 370 को हटाने हेतु कठोर निर्णय लेने के लिए कहा था । जिसे वह किन्हीं कारणों से टरकाते रहे। जब श्री अमितशाह को उन्होंने गृह मंत्रालय का दायित्व सौंपा तो जानकारों की दृष्टि में यह बात उसी समय साफ हो गई थी कि अब धारा 370 को हटाने का समय आ गया है।
गृह मंत्रालय का दायित्व संभालने के पश्चात मात्र दो माह में ही श्री अमित शाह कश्मीर समस्या के समाधान के लिए कुछ विशेष सक्रिय दिखाई देने लगे। उन्होंने एन0एस0ए0 श्री अजीत डोभाल के साथ मिलकर कश्मीर समस्या के समाधान हेतु धारा 370 को हटाने पर गंभीर मंथन आरंभ कर दिया। 2019 की 25 जुलाई को गृह मंत्रालय ने सी0आर0पी0एफ0 , बी0एस0एफ0 , एस0एस0बी0 और आई0टी0बी0पी0 जैसे केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों के अतिरिक्त 10000 जवानों की तैनाती जम्मू कश्मीर में की। इस निर्णय ने आगाज दिया कि कश्मीर में कुछ ‘बड़ा’ होने वाला है। पर अभी भी बहुत से लोगों को इस बात का ज्ञान नहीं था कि ऐसा कौन सा काम कश्मीर में होने जा रहा है, जिसे ‘बड़ा’ कहा जा सकता है ?
लेखक को उस समय ‘मिशन न्यू इंडिया’ के राष्ट्रीय संयोजक श्री रवि चाणक्य जी ने यह स्पष्ट संकेत दिया था कि धारा 370 के निरसन का समय अब आ चुका है। वह स्वयं उस समय कश्मीर पहुंच चुके थे। 2 अगस्त को 28000 अतिरिक्त सैनिक जम्मू कश्मीर और भेज दिए गए। इसके अतिरिक्त अमरनाथ की यात्रा को भी बीच में ही रोक दिया गया। लोगों को कानोंकान भी धारा 370 के निरसन की जानकारी ना हो, इसका पूरा ध्यान रखा गया। उस समय अमरनाथ जी की यात्रा भी चल रही थी। पूरी सावधानी बरते हुए अमरनाथ यात्रियों को बताया जा रहा था कि किसी बड़ी आतंकी घटना की संभावना है, इसलिए वे अपनी यात्रा को बीच में ही छोड़कर यथाशीघ्र अपने -अपने घरों को लौट जाएं। इन यात्रियों की सुरक्षा को लेकर सरकार पूरी गंभीरता दिखा रही थी। प्रशासन किसी भी प्रकार का जोखिम लेना उचित नहीं मान रहा था।

बड़बोले नेताओं को कर दिया नजरबंद

जो महबूबा मुफ्ती यह कहा करती थीं कि यदि कश्मीर के लिए विशेष दर्जा देने वाली भारतीय संविधान की धारा 370 को हटाया तो कश्मीर में तिरंगा उठाने वाला कोई नहीं मिलेगा, इसी प्रकार नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्लाह व उनके बेटे उमर अब्दुल्लाह धारा 370 के हटाने पर कश्मीर में खून की नदियां बहने की धमकी दिया करते थे, उन्हें भी 4-5 अगस्त की रात्रि तक नजरबंद कर दिया गया।
पूरा देश गृहमंत्री श्री अमित शाह की इस तैयारी से अनभिज्ञ था। यद्यपि कुछ लोगों को यह अनुमान होने लगा था कि धारा 370 के दिन अब समाप्त होने वाले हैं। अचानक 5 अगस्त 2019 की प्रातः काल में लोगों को टी0वी0 चैनलों के माध्यम से जानकारी मिली कि आज गृहमंत्री अमित शाह संविधान की आपत्तिजनक धारा 370 को हटाने की घोषणा संसद में करेंगे। सभी राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग टी0वी0 चैनलों और समाचार माध्यमों से चिपक कर बैठ गए। उस दिन टी0वी0 चैनलों और समाचार माध्यमों के साथ जुड़कर बैठने का उत्साह लोगों में कुछ उसी प्रकार का था, जैसा कभी महाभारत और रामायण को देखने के लिए हुआ करता था। लोग बल्लियों उछल रहे थे। जिन लोगों ने धारा 370 की आड़ में देश का और कश्मीर के हिंदुओं का शोषण होते हुए देखा था या सुना था या उसको किसी भी दृष्टिकोण से गंभीरता से अनुभव किया था उनकी प्रसन्नता का आज कोई ठिकाना नहीं था।
लोगों को लग रहा था कि 1947 से लेकर अब तक कश्मीर में आतंकवादियों के द्वारा जितने हिंदुओं को उत्पीड़ित किया गया है या उनकी हत्याएं की गई हैं या उनकी बहन बेटियों के साथ बलात्कार किए गए हैं, अब धारा 370 के हटने के उपरांत नई परिस्थितियां बनेंगी और कश्मीर फिर से केसर की सुगंध बिखेरने लगेगा।

धरा 370 को हटाने की घोषणा

  देश के गृहमंत्री श्री शाह ने निर्धारित समय पर 5 अगस्त को राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की ऐतिहासिक घोषणा की। जिस समय उनकी इस ऐतिहासिक घोषणा पर उनकी पार्टी के लोग राज्यसभा में मेजें थपथपाकर उनका उत्साहवर्धन कर रहे थे, उस समय उनके साथ देश के करोड़ों लोग भी तालियां बजाकर उनका अभिनंदन कर रहे थे।
क्योंकि यह वह ऐतिहासिक क्षण थे जिनके लिए देश के राष्ट्रवादी लोग पिछले 70 वर्ष से प्रतीक्षा कर रहे थे। कश्मीर में लोग आज नया सूर्य उगता हुआ देख रहे थे ।
जिन लोगों ने नेहरू की भूलों के स्थायी स्मारक बनाकर उन पर फूल चढ़ाने के लिए देश को बाध्य करने की मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति अपनाते हुए धारा 370 को एक स्थायी धारा के रूप में मान्यता देने का मूर्खतापूर्ण कृत्य किया था वे आज कम्युनिस्ट और कांग्रेसियों के रूप में संसद के भीतर और उसके बाहर अवश्य हल्का-फुल्का विरोध कर रहे थे। यद्यपि उनका यह विरोध केवल औपचारिकता के लिए किया गया विरोध था, जिसमें ठोसपन तनिक भी नहीं था। वह दिखाने के लिए झूठी गोलियां दाग रहे थे। झूठे गोले फेंक रहे थे, जिससे कि उनका वोट बैंक गड़बड़ाये नहीं। वस्तुस्थिति की उन्हें भी जानकारी हो चुकी थी कि प्रबंध इतने मजबूत हो चुके हैं कि अब यदि वह चाहेंगे भी तो भी कुछ नहीं होने वाला।
व्यक्ति के पाप बढ़ते – बढ़ते एक समय उस पर बोझ बन जाते हैं। जिसके बोझ तले वह स्वयं ही मर जाता है। यही स्थिति उस समय उन पापी धर्मनिरपेक्ष दलों की हो चुकी थी जो पिछले 70 वर्ष से कश्मीर में पाप को बढ़ावा देते आ रहे थे या किसी भी प्रकार से उसका समर्थन करते रहे थे। अपने पाप बोझ को उठाते हुए आज उन्हें राज्यसभा में लज्जा आ रही थी। उनकी आत्मा स्वयं उन्हें धिक्कार रही थी और कह रही थी कि पाप बोझ के तले दबकर पापबोध करो। यही कारण था कि आज उनके अस्त्र ढीले हो चुके थे। तेजहीन और आभाहीन विपक्ष सरकार के कठोर निर्णय के समक्ष मुरझा चुका था।
गृहमंत्री श्री अमित शाह ने अपनी इस घोषणा के माध्यम से जम्मू कश्मीर को दो भागों में बांटने का भी निर्णय लिया। इन दोनों भागों को जम्मू-कश्मीर और लद्दाख राज्य का नाम दिया गया। इन दोनों को ही केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया।

जम्मू कश्मीर में आये नए परिवर्तन

केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह की इस घोषणा से यह स्पष्ट हो गया कि अब जम्मू कश्मीर में कुछ स्थायी परिवर्तन देखने को मिलेंगे । नई विधान से अब यह स्पष्ट हो गया कि जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी, लेकिन लद्दाख में विधानसभा नहीं होगी। अर्थात् जम्मू-कश्मीर में राज्य सरकार बनेगी, लेकिन लद्दाख की कोई स्थानीय सरकार नहीं होगी।
जम्मू-कश्मीर को नेहरू की उदारता और देश विरोधी नीतियों के चलते जिस प्रकार एक अलग संविधान दिया गया था, धारा 370 के धराशायी हो जाने के पश्चात वह संविधान स्वयं ही निरस्त हो गया। इस प्रकार डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने देश में दोहरे विधान की जिस व्यवस्था के विरुद्ध अपना बलिदान दिया था, इस धारा के हटने के उपरांत और दो विधान की राष्ट्र विरोधी अवधारणा के निरस्त होते ही समग्र राष्ट्र ने अपने बलिदानी सपूत डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी मौन श्रद्धांजलि दे डाली।
नई व्यवस्था से यह स्पष्ट हो गया कि अब जम्मू कश्मीर में भारत का संविधान लागू होगा और जम्मू कश्मीर का अपना झंडा भी आज के बाद नहीं फहराया जाएगा।
जम्मू-कश्मीर में धारा 370 की आड में जिस दोहरी नागरिकता की व्यवस्था की गई थी उसने हिंदुओं का बहुत अधिक शोषण किया था। उनके साथ शासन प्रशासन को इस आधार पर पक्षपात करने का अवसर उपलब्ध होता था। उन्हें नौकरियों में तो किसी प्रकार के अवसर उपलब्ध थे ही नहीं, इसके अतिरिक्त सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्राप्त करने में भी उन्हें पक्षपात भागी बनना पड़ता था। इस आधार पर कश्मीरी हिंदू कभी यह समझ नहीं पाए कि देश 1947 में आजाद हो गया था, क्योंकि वह तो आजादी से पहले की व्यवस्था से भी कहीं अधिक क्रूर व्यवस्था में नेहरु के द्वारा धकेल दिए गए थे । तब से कश्मीरी हिंदू एक अंधेरी काल कोठरी में अपना जीवन यापन कर रहे थे और हम हर बार 15 अगस्त को लालकिले पर झंडा फहराकर देश की स्वाधीनता की वर्षगांठ मनाते जा रहे थे।नई व्यवस्था से जम्मू कश्मीर की दोहरी नागरिकता की मूर्खतापूर्ण धारणा भी धूलि धूसरित हो गई।
अब से पहले जहां देश के अन्य राज्यों की विधानसभाओं का कार्यकाल देश की लोकसभा की भांति 5 वर्ष का था वही जम्मू कश्मीर की विधानसभा का कार्यकाल 6 वर्ष का था। नई व्यवस्था ने स्पष्ट कर दिया कि अब जम्मू-कश्मीर सरकार का कार्यकाल अब छह वर्ष का नहीं, बल्कि पाँच वर्ष का होगा।
धारा 370 के हट जाने के पश्चात यह भी स्पष्ट हो गया कि जम्मू-कश्मीर में देश के अन्य राज्यों के लोग भी ज़मीन लेकर बस सकेंगे। अब तक देश के अन्य क्षेत्रों के लोगों को वहाँ ज़मीन खरीदने का अधिकार नहीं था। भारत का कोई भी नागरिक अब जम्मू-कश्मीर में नौकरी भी कर सकेगा। अब तक जम्मू-कश्मीर में केवल स्थानीय लोगों को ही नौकरी करने का अधिकार था।
जम्मू कश्मीर की लड़कियों के साथ पक्षपात करते हुए अभी तक जो व्यवस्था चल रही थी अब उसे समाप्त करते हुए जम्मू-कश्मीर की लड़कियों को अब दूसरे राज्य के लोगों से भी विवाह करने की स्वतंत्रता होगी। किसी अन्य राज्य के पुरुष से विवाह करने पर उनकी नागरिकता खत्म नहीं होगी, जैसा कि अब तक होता रहा है।
अब भारत का कोई भी नागरिक जम्मू-कश्मीर का मतदाता बन सकेगा और चुनावों में भाग ले सकेगा। रणबीर दंड संहिता के स्थान पर भारतीय दंड संहिता प्रभावी होगी तथा नए कानून या कानूनों में होने वाले बदलाव स्वतः जम्मू-कश्मीर में भी लागू हो जाएंगे।
अब अनुच्छेद-370 का केवल खंड-1 लागू रहेगा, शेष खंड समाप्त कर दिये गए हैं। खंड-1 भी राष्ट्रपति द्वारा लागू किया गया था। राष्ट्रपति द्वारा इसे भी हटाया जा सकता है। अनुच्छेद 370 के खंड-1 के अनुसार जम्मू-कश्मीर की सरकार से परामर्श कर राष्ट्रपति, संविधान के विभिन्न अनुच्छेदों को जम्मू-कश्मीर पर लागू कर सकते हैं।

पहले की स्थिति क्या थी ?

हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारतीय संविधान की आपत्तिजनक धारा 370 के रहते हुए संसद को राज्य में कानून लागू करने के लिए रक्षा विदेशी मामलों वित्त और संचार के मामलों को छोड़कर जम्मू और कश्मीर सरकार की स्वीकृति की आवश्यकता थी ।
इसके अतिरिक्त जम्मू और कश्मीर के निवासियों की नागरिकता, संपत्ति के स्वामित्व और मौलिक अधिकारों का कानून शेष भारत में रहने वाले निवासियों से अलग था। अनुच्छेद 370 के अंतर्गत, अन्य राज्यों के नागरिक जम्मू-कश्मीर में संपत्ति नहीं खरीद सकते थे। अनुच्छेद 370 के अंतर्गत, केंद्र को राज्य में वित्तीय आपातकाल घोषित करने की कोई शक्ति नहीं थी।

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक ,: उगता भारत

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