Categories
महत्वपूर्ण लेख

जब चौदहवें समुल्लास ने की एक मुस्लिम की बोलती बंद

उगता भारत ब्यूरो

मोहन गुप्ता पौराणिक हिन्दू परिवार से थे। आप पेशे से कंप्यूटर इंजीनियर थे। आपका मूर्ति पूजा एवं पौराणिक देवी देवताओं की कथाओं में अटूट विश्वास था। आप बहुराष्ट्रीय कंपनी में कार्यरत थे। आपको अनेक बार कंपनी की ओर से विदेश में कई महीनों के लिए कार्य के लिए जाना पड़ता था। एक बार आपको अफ्रीका में केन्या कुछ महीनों के लिए जाना पड़ा। केन्या की राजधानी नैरोबी में आपको कंपनी की ओर से मकान मिला। आपकी कंपनी द्वारा हैदराबाद से एक अन्य इंजीनियर भी आया था जिसके साथ आपको मकान साँझा करना था।
हैदराबाद से आया हुआ इंजीनियर कट्टर मुसलमान, पाँच वक्त का नमाज़ी और बकरे जैसे दाढ़ी रखता था। उसने आते ही मोहन गुप्ता से धार्मिक चर्चा आरम्भ कर दी। मोहन गुप्ता से कभी वह पूछता आपके श्री कृष्ण जी ने नहाती हुई गोपियों के कपड़े चुराये थे। क्या आप उसे सही मानते है। कभी कहता आपके इंद्र ने वेश बदलकर अहिल्या के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाया था। क्या आप ऐसे इंद्र को देवता मानेंगे? मोहन गुप्ता के लिए यह अनुभव बिलकुल नवीन था। उन्होंने अपने जीवन में धर्म का अर्थ मंदिर जाना, मूर्ति पूजा करना, भोग लगाना, ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देना, तीर्थ यात्रा करना ही समझा था। धर्म ग्रंथों में क्या लिखा है। यह तो पंडित लोगों का विषय है। यह संस्कार उन्हें अपने घर में मिला था। उनका मज़हबी साथी आते-जाते इस्लाम का बखान और पुराणों पर आक्षेप करने में कोई कसर नहीं छोड़ता था। तंग आकर उन्होंने अपने ऑफिस में एक भारतीय जो हिन्दू था से अपनी समस्या बताई। उस भारतीय ने कहा यहाँ नैरोबी में हिन्दू मंदिर है। उसमें जाकर पंडितों से अपनी समस्या का समाधान पूछिए।
मोहन गुप्ता अत्यन्त श्रद्धा और विश्वास के साथ स्थानीय हिन्दू मंदिर गए। मंदिर के पुजारी को अपनी समस्या बताई। पुजारी पहले तो अचरज में आया फिर हरि ओम कह चुप हो गया। मोहन निराश होकर भारी क़दमों से वापिस लौट आये। हताशा और भारी क़दमों के साथ वह लौट रहे थे कि उन्हें नैरोबी का आर्यसमाज मंदिर दिखा। उन्होंने मंदिर में प्रवेश किया तो अग्निहोत्र चल रहा था। उन्होंने अग्निहोत्र के पश्चात प्रवचन सुना और उससे स्वामी दयानन्द, वेद और सत्यार्थ प्रकाश के विषय में उन्हें जानकारी मिली।
प्रवचन के पश्चात उन्होंने अपनी समस्या से समाज के अधिकारियों को अवगत करवाया। समाज के प्रधान ने उन्हें स्वामी दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश देते हुए कहा- आपकी समस्या का समाधान इस पुस्तक में है। 14 वें समुल्लास में आपको आपकी सभी शंकाओं का समाधान मिल जायेगा। मोहन गुप्ता धन्यवाद देते हुए लौट गए। अगले एक सप्ताह तक उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश का स्वाध्याय किया। 14 वें समुल्लास को पढ़ते ही उनके निराश चेहरे पर चमक आ गई। बकरी अब शेर बन चुकी थी। शाम को उनके साथ कार्य करने वाले मुस्लिम इंजीनियर वापिस आये।
मुस्लिम इंजीनियर ने आते ही मोहन गुप्ता से पूछा आपको मेरे प्रश्नों का उत्तर नहीं मिला तो इस्लाम स्वीकार कर लो। अब मोहन गुप्ता की बारी थी। उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश के 14 वें समुल्लास के आधार पर क़ुरान के विषय पर प्रश्न पूछने आरम्भ कर दिए। मजहबी मुसलमान के होश उड़ गए। उसने पूछा तुम्हें यह सब किसने बताया। मोहन ने उसे सत्यार्थ प्रकाश के दर्शन करवाए। देखते ही मजहबी मुसलमान के मुंह से निकला। इस किताब ने तो हमारे सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया। नहीं तो अभी तक हम सारे हिन्दुओं को मुसलमान बना चुके होते। मोहन ने अपने ह्रदय से स्वामी दयानन्द और आर्यसमाज का धन्यवाद किया। भारत वापिस आकर वह सदा के लिए आर्यसमाज से जुड़ गए एवं आर्यसमाज के समर्पित कार्यकर्ता बन गए।
वीर सावरकर के शब्दों में स्वामी दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश ने हिन्दू जाति की ठंडी पड़ी रगों में उष्णता का संचार कर दिया।
अगर समस्त हिन्दू समाज स्वामी दयानन्द कृत सत्यार्थ प्रकाश के उपदेश को मानने लग जाये तो हिन्दू (आर्य) जाति संसार में फिर से विश्व गुरु बन जाये।
(साभार)

Comment:Cancel reply

Exit mobile version