देश में आपातकाल लगाकर कांग्रेस ने किए थे बड़े अन्याय, कर दिया था लोकतंत्र को लहूलुहान

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अजय कुमार 

आपातकाल की घोषणा के साथ ही नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं छोड़ा गया था। सच तो यह भी है कि 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था।

कांग्रेस हमेशा लोकतंत्र की दुहाई देती है लेकिन आज के दिन को कभी याद नहीं रखना चाहती है। क्योंकि आज ही के दिन सुप्रीम कोर्ट के कुछ सख्त फैसले से नाराज होकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा देश को इमरजेंसी की आग में झोंक दिया गया था। हिन्दुस्तान में कांग्रेस को छोड़कर देश का बहुत बड़ा तबका आज के दिन (25 जून) को एक काले दिवस के रूप में 47 वर्षों से याद रखे है। आज ही के दिन यानि 25 जून 1975 को देर रात्रि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में अपने खिलाफ बढ़ती नाराजगी को दबाने के लिए देश को आपातकाल की आग में झोंक दिया था। भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में इस दिन को देश के सबसे दुर्भाग्यपूर्ण दिन की संज्ञा दी जाती है। 47 साल पहले आज के ही दिन देश के लोगों ने रेडियो पर एक ऐलान सुना और देश में जंगल की आग की तरह खबर फैल गई कि सारे भारत में अब आपातकाल की घोषणा कर दी गई है। 47 साल के बाद भले ही देश के लोकतंत्र की एक गरिमामयी तस्वीर सारी दुनिया में प्रशस्त हो रही हो, लेकिन आज भी अतीत में 25 जून का दिन लोकतंत्र के लिए एक काले अध्याय के रूप में दर्ज है।

इमरजेंसी का यह दौर 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक चला था। 21 महीने तक आपातकाल का दौर चला था। तत्कालीन राष्ट्रपति फख़रुद्दीन अली अहमद ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार की सिफारिश पर भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के अधीन देश में आपातकाल की घोषणा की थी। 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद के हस्ताक्षर के साथ ही देश में पहली और संभवतः अंतिम बार इस तरह का आपातकाल लागू हुआ था। 26 जून की सुबह समूचे देश ने रेडियो पर इंदिरा की आवाज में संदेश सुना था, ‘भाइयो और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे आतंकित होने का कोई कारण नहीं है।

इमरजेंसी यानी आपातकाल की घोषणा के साथ ही देश के नागरिकों के मौलिक अधिकार निलंबित कर दिए गए थे। अभिव्यक्ति का अधिकार ही नहीं, लोगों के पास जीवन का अधिकार भी नहीं छोड़ा गया था। सच तो यह भी है कि 25 जून की रात से ही देश में विपक्ष के नेताओं की गिरफ्तारियों का दौर शुरू हो गया था। जयप्रकाश नारायण, लालकृष्ण आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी, जॉर्ज फर्नांडीस आदि बड़े नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। जेलों में जगह नहीं बची थी। 
       
इंदिरा सरकार ने राजनेताओं को तो जेल में डाल ही दिया इसके अलावा प्रशासन और पुलिस के द्वारा भारी उत्पीड़न की कहानियां सामने आई थीं। प्रेस पर भी सेंसरशिप लगा दी गई थी। हर अखबार में सेंसर अधिकारी बैठा दिया गया, उसकी अनुमति के बाद ही कोई समाचार छप सकता था। इसीलिए तब एक प्रतिष्ठित अंग्रेजी समाचार पत्र ने अपने संपादकीय पृष्ठ पर प्रश्न चिन्ह बनाकर खाली छाप दिया था। यह वह दौर था जब इंदिरा सरकार के विरोध में समाचार छापने पर ही संपादक की गिरफ्तारी हो जाती थी। यह सब तब थम सका, जब 23 जनवरी, 1977 को मार्च महीने में चुनाव की घोषणा हो गई, जिसमें जनता ने कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी तक को हार का स्वाद चखा दिया था।

दरअसल, प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की संदिग्ध मौत के बाद देश की प्रधानमंत्री बनीं इंदिरा गांधी का कुछ कारणों से न्यायपालिका से टकराव शुरू हो गया था। यही टकराव आपातकाल की पृष्ठभूमि बना था। आपातकाल के लिए 27 फरवरी, 1967 को आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने बड़ी पृष्ठभूमि तैयार की। एक मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सुब्बाराव के नेतृत्व वाली एक खंडपीठ ने सात बनाम छह जजों के बहुतम से सुनाए गए फैसले में यह कहा था कि संसद में दो तिहाई बहुमत के साथ भी किसी संविधान संशोधन के जरिये मूलभूत अधिकारों के प्रावधान को न तो खत्म किया जा सकता है और न ही इन्हें सीमित किया जा सकता है।
   
गौरतलब है कि 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी ने अपनी पार्टी को अभूतपूर्व जीत दिलाई थी और खुद भी बड़े अंतर से चुनाव जीती थीं। खुद इंदिरा गांधी की जीत पर सवाल उठाते हुए उनके चुनावी प्रतिद्वंद्वी राजनारायण ने 1971 में अदालत का दरवाजा खटखटाया था। संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर इंदिरा गांधी के सामने रायबरेली लोकसभा सीट पर चुनाव लड़ने वाले राजनारायण ने अपनी याचिका में आरोप लगाया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव जीतने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल किया है। मामले की सुनवाई हुई और इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर दिया गया। इस फैसले से आक्रोशित होकर ही इंदिरा गांधी ने इमर्जेंसी लगाने का फैसला किया। 
  
कोर्ट के फैसले से इंदिरा गांधी इतना क्रोधित हो गई थीं कि अगले दिन ही उन्होंने बिना कैबिनेट की औपचारिक बैठक के आपातकाल लगाने की अनुशंसा राष्ट्रपति से कर डाली, जिस पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने 25 जून और 26 जून की मध्य रात्रि में ही अपने हस्ताक्षर कर डाले और इस तरह देश में पहला आपातकाल लागू हो गया। देश में आपातकाल लगाए जाने पर इंदिरा गांधी के प्राइवेट सेक्रेटरी रहे दिवंगत आर.के. धवन ने कहा था कि सोनिया और राजीव गांधी के मन में आपातकाल को लेकर कभी किसी तरह का संदेह या पछतावा नहीं था। और तो और, मेनका गांधी को इमर्जेंसी से जुड़ी सारी बातें पता थीं और वह हर कदम पर पति संजय गांधी के साथ थीं। वह मासूम या अनजान होने का दावा नहीं कर सकतीं। दिवंगत आर.के. धवन ने यह खुलासा एक न्यूज चैनल को दिए गए इंटरव्यू में किया था।
  
धवन ने बताया था कि पश्चिम बंगाल के तत्कालीन सीएम एसएस राय ने जनवरी 1975 में ही इंदिरा गांधी को आपातकाल लगाने की सलाह दी थी। इमर्जेंसी की योजना तो काफी पहले से ही बन गई थी। धवन ने बताया था कि तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद को आपातकाल लागू करने के लिए उद्घोषणा पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं थी। वह तो इसके लिए तुरंत तैयार हो गए थे। धवन ने यह भी बताया था कि किस तरह आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्रियों की बैठक बुलाकर उन्हें निर्देश दिया गया था कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के उन सदस्यों और विपक्ष के नेताओं की लिस्ट तैयार कर ली जाए, जिन्हें गिरफ्तार किया जाना है। इसी तरह की तैयारियां दिल्ली में भी की गई थीं। आपातकाल खत्म होने के बाद हुए चुनाव में जनता पार्टी की सरकार बनी थी, यह और बात है कि आपसी मतभेद के कारण यह सरकार लम्बी नहीं चली और कुछ समय के बाद फिर से कांग्रेस सत्ता में आ गई।

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