अयोध्या में श्री सीताराम की रसिक उपासना

images (8)

डा. राधे श्याम द्विवेदी

मध्यकालीन हिन्दी भक्ति साहित्य का सर्वेक्षण करने पर जिज्ञासुओं को सामान्यतः उसकी प्रधानतम प्रवृत्ति के रूप में मधुरोपासना का तत्व-साक्षात्कार होता है. भक्ति की चाहे निर्गुण शाखा हो या सगुण, निर्गुण का चाहे योग मार्ग हो या प्रेममार्ग, सगुण की चाहे कृष्णोपासना हो या रामोपासना- विचित्र क्षेत्रों में प्रायः सर्वत्र इस मधुरोपासना की हो एक सर्वव्यापक प्रवृत्ति- सूत्रे, मणिमणा इव- परिलक्षित होती है.

 राम नगरी अयोध्या में 11,000 से ज्यादा मंदिर हैं, पूरे विश्व में यह एक ऐसा स्थान है जहां इतनी बड़ी संख्या में मंदिर है. धर्म नगरी अयोध्या भगवान राम की जन्म स्थली के रूप में जानी जाती है.  यह अनेक रहस्यों और संस्कृतियों से भरा हैं, हर रहस्य और संस्कृति का एक ही आधार राम का प्रेम है। यदि श्रृंगार की बात होती है तो भगवान विष्णु के ही दूसरे अवतार कृष्ण का नाम पहले लिया जाता है। रासलीला, गोपलीला, राधा प्रेम जैसी कई कथाएं कृष्ण से सम्बन्धित हैं. भारत देश में एक संप्रदाय ऐसा भी है जो श्रीराम के लिए भी ऐसा ही प्रेम रखता है, यानी उन्हें अपना स्वामी मानता है, खुद को उनकी प्रेमिका. दुनिया इन्हें राम रसिक के नाम से जानती है. इनकी उपासना के कुछ अलग ही पद्धति होती है.

1.

सिर पर चुनरी डालकर उपासना:-

अयोध्या में जन्मभूमि मंदिर से कुछ दूर कनक भवन स्थित है. कहते हैं कि इस भवन को माता कैकेयी ने देवी सीता को मुंह दिखाई में दिया था. श्रीराम विवाह के बाद सीता के साथ यहीं रहे थे. इसी कनक भवन मंदिर में अब श्रीराम का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाया जाता है. रसिक संप्रदाय के लोग यहां सिर पर चुनरी डालकर भगवान की आरती करते हैं और राम संकीर्तन में खो जाते हैं. वह खुद का संबंध सीता से जोड़ते हैं और श्रीराम को दूल्हा मानते हैं. 

2.

श्रीराम दूल्हे के रूप में पूज्य:-

मान्यता  है कि जब मिथिला में श्रीराम-सीता का विवाह हुआ तब उसके बाद उनकी सखियों ने विवाह ही नहीं किया. उन्हें इस युगल को देखकर ही जीवन का सारा ज्ञान मिल गया. उन्होंने वरदान मांगा कि हमारा जब भी जन्म हो, राम-सीता की भक्ति में ही जीवन कटे और हम अधिक से अधिक उनके निकट रहें. बिहार में सीतामढ़ी, जनकपुरी, दरभंगा, मैथिल आदि इलाकों में आज भी श्रीराम और यहां तक कि अयोध्या के हर वासी को वे पाहुन (ससुराल से आया अतिथि) मानते हैं. वह उन्हें दूल्हा ही मानते हैं. 

3.

त्रेतायुग से रामरसिकों की सानिध्यता :-

राम रसिकों की मौजूदगी त्रेतायुग से ही है. अहिल्या, शबरी खुद श्रीराम की नवधा भक्ति में समर्पित महिलाएं थीं. हिंदी साहित्य की रामाश्रयी शाखा के जो कवि हुए हैं, उनमें कई भक्त कवि राम रसिक संप्रदाय के हैं. इनमें सबसे ऊंचा नाम आता है संत और भक्त कवि रामानंद का. एक खास बात ये भी है कि राम रसिक होने के बाद स्त्री-पुरुष का भेद मिट जाता है, सिर्फ आत्मा रह जाती है, जो किसी देह से बंधी सी है. 

4.

संत रामानंद से रसिक पीठ की स्थापना:-

लोक विचारों में राम रसिक तो पहले से मौजूद थे, 17वीं शताब्दी तक मंदिरों में उनका दिख जाना स्वाभाविक था, लेकिन इसके बाद संत कवि रामानंद को संप्रदाय के तौर पर इन्हें एकत्रित करने का काम किया गया. रामानंद की वैरागी परंपरा को तापसी-सखा के नाम से जाना जाता है. उनके ही शिष्य दाहिमा ब्राह्मण कृष्णदास ने पहली बार जयपुर के निकट गलता में रामानंद संप्रदाय की गद्दी की स्थापना की. रामानंद के दो प्रसिद्ध शिष्य किल्हादास और अग्रदास थे. अग्रदास ने राजस्थान के विभिन्न भागों में रसिक सम्प्रदाय का प्रतिपादन किया था. राजस्थान में उत्पन्न रसिक सम्प्रदाय अयोध्या, जनकपुर और चित्रकूट में फैला. इस सम्प्रदाय का साहित्य ज्यादातर मैथिली के साथ मिश्रित ब्रज और अवधी भाषा में है, 1861 में रूपदेवी द्वारा रचित अंतिम महत्वपूर्ण कविता राम रास है.

5.

अयोध्या के लक्ष्मण किले में राम रसिकों की मौजूदगी:-

अयोध्या में, लक्ष्मण किला में भी राम रसिकों की खास और दुर्लभ पूजा देखी जा सकती है. आचार्य पीठ लक्ष्मण किला रसिक उपासना का सबसे प्राचीन पीठ है. आचार्य जीवाराम के शिष्य स्वामी युगलानन्य शरण की तपोस्थली पर इस मंदिर को साल 1865 में रीवा स्टेट के दीवान दीनबंधु के विशेष आग्रह के बाद बनवाया गया था. दशहरे के अतिरिक्त पूरे वर्ष में यहां भगवान राम को शस्त्र धारण नहीं कराया जाता है. यहां वह सिर्फ सीता के पति हैं, सखियों के जीजा हैं और जगत के स्वामी हैं. उनकी उपासना में श्रृंगार का भाव प्रमुख हैं. राम रसिक सिर्फ राम की भक्ति नहीं करते हैं, बल्कि राम से भक्ति में रचा-बसा प्रेम करते हैं. रसिक उपासना के संत यहां भगवान राम की उपासना दूल्हे के रूप करते हैं. मंदिर में विवाह के पदों का गायन होता है.

6.

 अयोध्या मां सीता की भी नगरी :-

रामनगरी वस्तुत: श्रीराम के साथ मां सीता की भी नगरी है. श्रीराम और मां सीता में अभिन्नता प्रतिपादित है. यह शास्त्रीय तथ्य रामनगरी में पूरी प्रामाणिकता और पूर्णता के साथ प्रवाहमान है. रामजन्मभूमि पर विराजे रामलला को छोड़कर बाकी के सभी मंदिरों में श्रीराम के साथ मां जानकी का भी विग्रह अनिवार्य रूप से स्थापित है. वैष्णव परंपरा की दो मुख्यधारा रामानुज एवं रामानंद संप्रदाय में सीता आद्या-परात्परा एवं अखिल ब्रह्मांड नायक सृष्टि नियंता श्रीराम की सहचरी के रूप में समान रूप से स्वीकृत-शिरोधार्य हैं.गोस्वामी तुलसीदास कहते हैं कि सीता उत्पत्ति, पालन और संहार की अधिष्ठात्री शक्ति है. वैष्णव मतावलंबी संतों की यह आम धारणा है कि श्रीराम करुणा के साथ न्याय और कर्म के आधार पर फल देने वाले हैं, जबकि मां जानकी अतीव करुणामयी हैं और वे पीड़ित मानवता पर अहेतुक कृपा करती हैं. रामानंद संप्रदाय की उपधारा रसिक उपासना परंपरा में तो मां सीता श्रीराम की चिर सहचरी के साथ जीव मात्र की आदि गुरु और मार्गदर्शिका के रूप में प्रतिष्ठित हैं.

मान्यता है कि भक्तों की पुकार वही श्री राम तक पहुंचाती हैं और श्रीराम की कृपा भी उनके ही माध्यम से भक्तों पर बरसती है. 

7.

अयोध्या का रंग महल में माता सीता की सखी भाव:-

अयोध्या के मंदिरों में से एक पवित्र मंदिर रंगमहल भी है। यह सैकड़ों वर्ष पुरानी मंदिर है जहां की उपासना बहुत ही महत्वपूर्ण है भगवान श्रीराम की जन्म स्थली से सटे रंगमहल की पौराणिकता अत्यंत अद्भुत है श्री राम जन्मभूमि में जहां श्री राम की उपासना होती है वही राम जन्मभूमि के बगल स्थित रंगमहल में माता सीता की उपासना होती है, इस मंदिर के संत अपने आपको सीता जी की सखी मानते हैं.

8.

 बड़ा स्थान जानकीघाट मन्दिर रसिक उपासना का केन्द्र  :-

रसिक उपासना की मूलपीठ श्री स्वामी करुणा सिंधु मेमोरियल चैरिटेबल सेवा संस्थान द्वारा संचालित श्री जानकीघाट बड़ा स्थान है. ट्रस्ट के द्वारा गौ सेवा व गौमाता के संरक्षण व संवर्धन का भी कार्य किया जा रहा है.इसके अलावा संत महंत की सेवा व विराट अन्न क्षेत्र संतों एवं आगंतुकों के लिए विराट रूप से प्रतिदिन दोपहर भंडारे का आयोजन किया जा रहा है. ट्रस्ट के द्वारा ही वेद पाठी व संस्कृत छात्र विद्यार्थी सेवा के साथ ही निर्धन व गरीब विद्यार्थियों के लिए भोजन प्रसाद आवास की भी सुविधा प्रदान की जाती है.परमार्थ सेवा की यह सिद्ध स्थली है. यह अयोध्या की अति प्राचीनतम मन्दिर है. जहा पर हर वर्ष विविध धार्मिक आयोजनों के साथ ही जन मानस व राम भक्तो की सेवा सतत चलती ही रहती है.

9.

 खाकी बाबा प्रिया अली सहचरी भाव पाये :-

श्री रूपकला जी (अयोध्या के सिद्ध संत) के साथ खाकी बाबा की मित्रता थी । जब कभी अयोध्या आते तो उनसे मिलते और श्री रामकथा सुनकर उसका आनंद लेते । एक दिन रात्रि मे वही विश्राम किया । रात्रि मे श्री रूपकला जी को विरह हुआ तो उनके मुख से आर्त वाणी से निकलने लगा – हे प्रियतम ! हे प्राणनाथ ! हे किशोरी जू । इस तरह कहकर रोने लगे । खाकी बाबा ने उनको डांटा और कहा की यह क्या प्रियतम और प्यारे प्यारे कहकर रोते रहते हो ? रूपकला जी ने खाकी बाबा से कहा – खाकी बाबा ! श्री अवध आये हो तो आपको एक बार श्री श्री लक्ष्मण शरण जी का दर्शन करना चाहिए । श्री रूपकला जी के कहने पर खाकी बाबा उन रसिक संत का दर्शन करने गए  । जब खाकी बाबा दर्शन करने गए तब बाबा जी चारपाई पर लेटे थे । 

श्री लक्ष्मण शरण जी ने खाकी बाबा से कहा की थोड़ा समय रुके रहो । जब सब लोग चले गए तब खाकी बाबा को अपने पास बुलाया । जैसे ही पास जाकर उनके चरणों का स्पर्श किया तो देखा की उनके शरीर का अंग प्रत्यंग बदल गया । उनका शरीर एक अतिसुंदर तरुणी के शरीर मे बदल गया । सामने जो रसिक संत लेटे है उनको भी एक सुंदर युवती के रूप मे देखा । कुछ क्षणों मे वह दृश्य चला गया । खाकी बाबा वहां से भागे । 

रूपकला जी के पास आकर बोले –  उसके चरण छूते ही मै एक युवती बन गया और वह बाबा खुद भी एक युवती बन गया । रूपकला जी ने कहा – आप पर श्री किशोरी जी की कृपा हो गयी । आपको संत ने श्री किशोरी जी की सहचरियों मे सम्मिलित कर लिया । आप अपने स्वरूप को पहचानो, आज से आप तो प्रिया अली हो गए।  गुरुदेव द्वारा प्रदत्त नाम सीतारामदास, दुनिया के लिए खाकी बाबा और अंतरंग उपासना मे आपका नाम प्रिया अली होगा । उसके बाद धीरे धीरे रसिक संतो एक संग व सेवा करते करते उनको माधुर्य उपासना की प्राप्ति हुई । 

10.

हनुमत् निवास मंदिर:-

अयोध्या में रसिक उपासना परम्परा से जुड़े हनुमत् उपासना के प्रमुख केन्द्र हनुमत् निवास मंदिर है।सौ वर्षों से भी अधिक पुराने इस धर्म स्थान की हनुमत् उपासना के क्षेत्र में विशिष्ट परम्परा रही है। कहा जाता है की गोमती शरण जी महाराज को हनुमानजी का साक्षात्कार हुआ था। चित्रकूट में कठिन साधना के पश्चात ईश्वरीय प्रेरणा से रसिक परम्परा की केन्द्रीय पीठ लक्ष्मण किला के इस स्थान पर स्थित गौशाला को ही उन्होंने अपनी साधना स्थली बना लिया था। कालांतर में इस स्थान का विस्तार समय समय पर होता रहा।

         अयोध्या में श्रावण कुंज नृत्य राघव कुंज , सियाराम केलि कुंज चार शिला कुंज तथा राम सखा बगिया आदि पाच प्रमुख मंदिर रसिक उपासना और राम सखा सम्प्रदाय के हैं। श्रावण कुंज अयोध्या के नया घाट पर स्थित है। मान्यता के अनुसार गोस्वामी तुलसी दास जी ने यही रामचरित मानस के बालकाण्ड  की रचना की थी। नृत्य राघव कुंज मणिराम छावनी के निकट बासुदेव घाट स्थित है। पहले अयोध्या से ही नियंत्रित होता था। अब पुनरुद्धार पुष्कर राजस्थान के महंथ जी द्वारा हो रहा है।

राम सखा बगिया रानी बाग में एक विस्तृत भूभाग में स्थित है। नृत्य राघव कुंज बासुदेवघाट अयोध्या एक प्राचीन मंदिर है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। सियावर केलि कुंज नागेश्वरनाथ मंदिर के पीछे स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। चार शिला कुंज जानकी घाट अयोध्या में स्थित है। यह राम सखा सम्प्रदाय का पुराना मंदिर है। राम सखा मंदिर रानी बाग अयोध्या के वर्तमान महन्थ श्री अवध किशोर मिश्र ने मंदिर की परम्परा के बारे में बताया कि अयोध्या के कुल पाच मंदिर एक ही पूर्व महंथ द्वारा संचालित थे। रसिक उपासना और सखा सखी भाव के कई अन्य मंदिर अयोध्या में अपनी अनूठी भक्ति की छटा बिखेर रहे है। यहां का प्रमुख आकर्षण राम विवाह होता है। वैसे राम जन्मोत्सव,सावन झूला और परिक्रमा आदि अवसर पर भी रसिक उपासना देखी जा सकती है।

Comment:

Kuponbet Giriş
betgaranti giriş
Teknik Seo
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
vaycasino giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
betnano giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
nesinecasino giriş
bahislion giriş
betebet giriş
rekorbet giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
romabet giriş
betlike giriş
ikimisli giriş
betpas giriş
betpas giriş
betnano giriş
betnano giriş
betnano giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betgaranti güncel giriş
betgaranti yeni adres
betgaranti giriş güncel
betgaranti giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
romabet giriş
pumabet giriş
romabet giriş
milanobet giriş
milanobet giriş
pumabet giriş
pumabet giriş
romabet giriş
romabet giriş
milanobet giriş
ikimisli giriş
ikimisli giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
betpas giriş
betpas giriş
milanobet giriş