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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

शिवाजी हमारे नेतृत्व के लिए आज भी प्रेरक हैं

shivaji ugta bharatशिवाजी भारतीय राष्ट्रवाद के उन्नायक थे। उनके हर निर्णय और हर कार्य में राष्ट्रवाद झलकता था। अक्टूबर 1664 ई. में उन्होंने बीजापुर से खवासखान की सहायता के लिए आये बाजी घोर पड़े की सेना को परास्त कर भगा दिया था। बाजी घोरपड़े को अपने भी प्राण गंवाने पड़ गये। भारत का राष्ट्र निर्माता शिवाजी इस जीत से अपने साम्राज्य का और भी अधिक विस्तार करने में सफल रहा। पुर्तगाली इतिहासकारों का कहना है कि शिवाजी ने डिचोली रामबाग और दक्षिण में कोंकण में फोंडा को छोडक़र शेष सारा भाग प्राप्त कर लिया। इसके अतिरिक्त आठ लाख सोने के सिक्के तथा 20 लाख सोने के रूपये लूट में प्राप्त हुए।

दिसंबर 1664 ई. में शिवाजी ने सिंधुदुर्ग नामक मालवण के पास समुद्री किनारे पर एक किले की स्थापना की। इसके नाम से ही पता चल जाता है कि यह समुद्री किनारे पर था। पर यह शिवाजी के राष्ट्र और संस्कृति प्रेम को झलकाने वाला तथा उनकी दूरदृष्टि को स्पष्ट करने वाला निर्णय भी था। इससे उनकी नौसेना को एक सुरक्षा कवच उपलब्ध हो गया।

इधर के क्षेत्र में विस्तार लेते शिवाजी ने कर्नाटक के बसरूर क्षेत्र पर हमला कर उसे लूट कर लगभग आठ करोड़ रूपया प्राप्त किये। यद्यपि डच इतिहासकार इस लूट में केवल 30,000 रूपया प्राप्त होना ही लिखते हैं।

जयपुर का राजा जयसिंह शिवाजी के विरूद्घ रण क्षेत्र में उतर आया। वह औरंगजेब का कृपा पात्र था और इसलिए अपने आपको बादशाह की दृष्टि में और भी अधिक ऊंचा स्थापित करने के लिए शिवाजी को परास्त करने के उद्देश्य से दक्षिण की ओर बढ़ा। उसने शिवाजी के अधिकारियों को बड़ी राशि रिश्वत में देकर उन्हें अपनी ओर मिलाने का प्रयास किया। ‘हेफत अंजुमन’ में रखे पत्रों में जयसिंह और औरंगजेब के मध्य हुए तत्कालीन पत्राचार से इस तथ्य का पता हमें चलता है। जयसिंह  ने बड़ी भारी-भारी तोपों और विशाल सैन्यदल के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया। पूना से सांसवड़ पहुंचने में जयसिंह को 15 दिन का समय लगा। 29 मार्च 1665 को युद्घ हुआ। मराठों ने पुरंदर की ओर बढ़ जाने का निर्णय लिया। जयसिंह के साथ दिलेर खां भी युद्घ में उपस्थित था, उसने किले के ऊपर स्थित कुछ झोंपडिय़ों में आग लगा दी। दिलेर की सहायता के लिए जयसिंह का पुत्र कीरतसिंह भी अपने तीन हजार सैनिकोंं के साथ युद्घ में विद्यमान था।

14 अप्रैल 1665 को जयसिंह ने रूद्रामल को अपने आधीन कर लिया। शिवाजी की ओर से नेताजी पालकर ने परेण्डा पर आक्रमण किया परंतु वह असफल रहा। मराठों ने 14 अप्रैल को पुरंदर के युद्घ में मुगल सेना से हार मान ली। जयसिंह ने भारी विनाश किया। पचास गांव जला डाले गये। अचल सिंह कछवाहा ने भी कई गांव नष्ट कर दिये। मुगलों की सेना जिधर भी जैसे भी बन पड़ा वैसे ही विनाश मचाने लगी।

मराठा अपने परंपरागत छापामार युद्घ पर उतर आये। वे भागे नही और अपने पूर्ण पराक्रम और साहस के साथ रात्रि में मुगल सेना पर आक्रमण करने लगे। मुगल सेना का रास्ता अवरूद्घ करने के लिए उन्होंने जंगलों में भी आग लगा दी, पर मुगल सेना का उत्साह भी देखने योग्य था, वह अभी उत्साहित थी और हर प्रकार से शत्रु को समाप्त कर देना चाहती थी। इस युद्घ में मराठा योद्घा मुरारबाज ने विशेष पराक्रम का प्रदर्शन किया था।

शिवाजी ने चेताया जयसिंह को

जयसिंह के अपने विरूद्घ अभियान पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए शिवाजी ने जयसिंह के लिए एक पत्र लिखा। जिसमें उसके भीतर देशभक्ति और धर्मभक्ति को जगाने का प्रयास किया गया था। प्रभाकर माचवे अपनी पुस्तक ‘छत्रपति शिवाजी’ में उस पत्र का अनुवाद करते हुए लिखते हैं :-‘‘हे राजाधिराज जयसिंह! आपके कारण राजपूतों की गर्दन ऊंची रही है। बाबर वंश की राजलक्ष्मी आपके कारण से प्रबल हुई है। जगज्जनक परमात्मा आपको धर्म और न्याय का मार्ग दिखायें। मैंने ऐसा सुना है कि आप मुझ पर हमला करके दखन जीतने में लाल मुंह के मुगलों को सफलता दिलाने की इच्छा कर रहे हों। पर आपके इस कार्य से आपके मुंह पर कालिख पुती है और देश और धर्म पर आपत्ति आ गयी है। यदि आप अपने बल पर दक्षिण दिग्विजय करने आ रहे हों तो यह सिर मैं आपके रास्ते में बिछाने के लिए तैयार हूं। बड़ी सेना लेकर मैं आपके साथ होकर सारा हिंदुस्तान जीतने में आपकी सहर्ष सहायता करूंगा। लेकिन सज्जनों को धोखा देने वाले औरंगजेब की मीठी बातों में आकर आप उनकी ओर से आये हैं। अब आपसे किस प्रकार का खेल खेला जाए, मैं नही जानता। आपसे मिल जाऊं तो मर्द जैसा व्यवहार नही। क्योंकि व्यक्ति को समय का मुख देखकर सेवा नही करनी चाहिए। तलवार लेकर लड़ाई के लिए आऊं तो दोनों ओर हिन्दू (शिवाजी का राष्ट्रवाद देखिए हिंदू शब्द प्रयोग कर रहे हैं, मराठा या राजपूत नही, हिंदुस्तान शब्द प्रयोग कर रहे हैं महाराष्ट्र या किसी क्षेत्र विशेष का नामोल्लेख नही) का ही नाश और क्षति होगी।

बड़े दुख की बात है कि विधर्मी शत्रुओं का रक्त पीने के अतिरिक्त और किसी भी काम के लिए (किसी हिंदू का रक्त पीने के लिए) मेरी तलवार म्यान से बाहर नही निकली। यदि इस लड़ाई के लिए कोई तुर्क आया होता तो हमें घर बैठे शिकार मिल जाता। अफजल खां और शाइस्ताखां से काम नही चला अत: अब आपको भेजा गया है, क्योंकि औरंगजेब स्वयं हमारा हमला नही सह पाएगा। उसकी ऐसी इच्छा है कि इस दुनिया में हिंदुओं की सेना में कोई बलशाली न रहे। सिंह परस्पर लडक़र घायल हो जाएं। हम लोगों से लडक़र हिंदुओं को धूल में मिलाने की आपकी  इच्छा नही होगी। यदि आपकी तलवार में पानी हो और घोड़े में दम हो तो हिंदुओं के शत्रु पर आक्रमण करो। यदि परमात्मा ने आपको बुद्घि प्रदान की है और आपको अपने पौरूष का प्रदर्शन करना ही है, तो अपनी मातृभूमि के क्रोध से अपनी शमशीर तृप्त करो और अत्याचारों से दुखी हुए लोगों को आंसुओं का पानी दो। यह समय हिंदुओं के परस्पर लडऩे का नही है क्योंकि उन पर कठिन आपत्ति आयी है। हमारे बाल-बच्चे देश, धर्म, देवालय सब पर आपत्ति आयी हुई है, ऐसा ही चलता रहा तो हमारा नामोनिशां इस जमीन पर नही रहेगा। शत्रु हमारे पैर हमारे ही पैरों में अटका रहे हैं। हमारी तलवार हमारे ही सिर पर चला रहे हैं। हमें इस समय तलवार चलाकर शत्रु को तुर्की-बतुर्की उत्तर देना चाहिए। देश के लिए खूब हाथ पैर चलाने होंगे। यदि आप मेवाड़ में राजसिंह से एका करके कपट छोड़ोगे तो बहुत बड़ा काम होगा। ऐसी आशा है। चारों ओर से हमला करके शत्रु का सिर सांप की भांति कुचल डालो। जिससे वह दखन में आकर अपना जाल न फैला सके। तब तक मैं भाला चलाने वाले वीरों को लेकर बीजापुर और गोलकुण्डा के दोनों बादशाहों को भगा देता हूं। दखन में इस सिरे से उस सिरे तक दुश्मन का नामोनिशान नही रहने दूंगा। दो दिल मिल जायें तो पथरीला पर्वत तोड़ सकते हैं और बड़े जमावड़े के ठीकरे किये जा सकते हैं। इसके विषय में मुझे आपसे बातचीत करनी है। वह खत में लिखनी ठीक नही है। आप चाहेंगे तो मैं आपसे मिलने आऊंगा। अपनी कार्यसिद्घि का रास्ता निकालिये और इहलोक में और परलोक में कीर्ति अर्जित कीजिए। तलवार, देश, घोड़ा और धर्म की कसम खाकर कहता हूं कि ऐसा करने से आप पर कभी कोई आपत्ति नही आएगी। अफजलखां के अंत से आप शंकित ना हो। क्योंकि उस जगह सचाई यही थी कि वह मुझे मारने के लिए 1200 हवश लाया था। यदि मैंने उस पर हाथ न चलाया होता तो यह पत्र तुम्हें कौन लिखता। मैं रात को आपसे मिलने आऊंगा। यदि यह पत्र आपको पसंद ना हो तो मैं और मेरी तलवार है, और आप की फौज है। कल सूर्यास्त से मेरी शमशीर म्यान से बाहर होगी।’’ एक ऐतिहासिक दस्तावेज है ये पत्र। शिवाजी की देशभक्ति आज भी देशविरोधी शक्तियों के प्रति देश के नेतृत्व को शिक्षा देती है, हमें आज भी देश को तोडऩे वाली शक्तियों से और शत्रु से हाथ मिलाने वाले लोगों से उसी प्रकार पेश आना होगा जैसे शिवाजी आया करते थे। शिवाजी हिन्दुत्व और राष्ट्रवाद के संदर्भ में हमारे नेतृत्व के लिए आज भी प्रेरक हैं।

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