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कविता

श्री कृष्ण जी की पहली चोट

गीता मेरे गीतों में ….गीत संख्या — 3

श्री कृष्ण जी की पहली चोट

अर्जुन की बचकानी बातें सुनकर माधव मंद – मंद मुस्काए,
किया घोर आश्चर्य व्यक्त तब वे अर्जुन के और निकट आए।
एक वीर क्षत्रिय के वचनों को सुन, कृष्ण बड़े ही दु:खी हुए,
तब युद्ध से विमुख हुए अर्जुन को कुछ गहरे रहस्य बताए।।

बोले- अर्जुन ! तू जन्म – कर्म से कभी नहीं रहा है कायर,
युद्धाभिलाषी बन तूने युद्ध किए , युद्धार्थ रहा सदा तत्पर।
तूने कितने ही दानव मार दिए ना युद्ध से पीठ दिखाई कभी,
जिस – जिसने तेरे बल को ललकारा – वही नहीं रहा भू पर।।

शस्त्र – शास्त्र का उचित समन्वय – तेरे जीवन का संयम है ,
तेरी वीरता को लेकर अर्जुन ! मैं जितना बोलूं, उतना कम है।
हे पार्थ ! तू अब से पहले जैसा था वैसा ही बनना अब होगा,
यह धर्मक्षेत्र है कुरुक्षेत्र – यहाँ तू धर्मरक्षक और रणनायक है।।

मत कायरों जैसी बात बना अब रणभेरी बजा और युद्ध मचा,
जब शत्रु सामने ललकारे, बता ! तेरे पास क्या विकल्प बचा ?
पलायनवादी मत बन अर्जुन ! तेरी कीर्ति को यह सब नष्ट करे, शत्रु संतापक है बंधु ! ना तुझे अपने सही रूप का ध्यान रहा।।

क्षुद्र दुर्बलता तुझको घेर रही , और निज धर्म से कर चुकी भ्रष्ट ,
जो धर्म भ्रष्ट हो जाता मानव, जग में वही कहलाता – ‘पथभ्रष्ट’।
ना तेरा आचरण यह शोभा देता, तू अपने कुल को भी लजा रहा,
जिसके लिए क्षत्राणी संतान जने, वह धर्म भी तुझ से हुआ नष्ट ।।

अंतःकरण की यह दुर्बलता, हे पार्थ ! अब तुझे दूर करनी होगी ,
खड़े होकर इस युद्ध – क्षेत्र में, वीरोचित हुँकार अब भरनी होगी।
तेरी गर्जन से शत्रु कांपे , और तर्जन तेरी दहला दे शत्रु का ह्रदय,
हे कौन्तेय ! कायरता की केंचुली छोड़ तुझे वीरता धरनी होगी ।।

डॉक्टर राकेश कुमार आर्य

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