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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

ज्ञानवापी मस्जिद का सच और अनवर शेख

ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग के पश्चात अब यह बात स्पष्ट हो गई है कि मध्यकाल में तुर्क और मुगल शासक भारत की संस्कृति और धर्म स्थलों को मिटाकर या अपवित्र करके भारत में सर्वत्र इस्लाम का परचम लहराने की योजना पर कार्य करते रहे थे ।अभी तक जो लोग इस बात को लेकर बार-बार कहते आ रहे थे कि हिंदू मंदिरों का बड़ी संख्या में विनाश करके इस्लाम ने भारत में मस्जिदें खड़ी की हैं, उनकी बातों को धर्मनिरपेक्ष वादी छद्म लेखक मजाक में उड़ा देते थे। इस दिशा में कम्युनिस्ट लेखकों ने तो निर्लज्जता की सारी सीमाएं पार कर दी थीं। वह कभी भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होते थे कि मस्जिदों के निर्माण में हिंदुओं के धर्म स्थलों को तोड़ने जैसा काम ‘ उदारवादी मुगलों’ ने कभी किया होगा।
अब जब यह बात स्पष्ट हो ही गई है कि ज्ञानवापी मस्जिद जैसी मस्जिदों को भी हिंदुओं के धर्म स्थलों को तोड़कर ही बनाया गया है तो यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से आता है कि मुसलमानों ने हिंदू मंदिरों का विनाश अंततः किस उद्देश्य को लेकर किया ?
इस पर विचार करते हुए हमें अनवर शेख द्वारा लिखित ‘ इस्लाम एंड टेररिज्म’ नामक पुस्तक के पृष्ठ 121 पर उल्लिखित इस तथ्य को ध्यान में रखना चाहिए कि :- “वास्तव में पैगंबर मूर्तियों से घृणा नहीं करता था, वह वास्तव में भारतीय संस्कृति और उसके प्रबल धार्मिक प्रभाव का विरोधी था। जिसका कि मध्यपूर्व पर भी प्रभाव था और सांस्कृतिक दृष्टि से अरेबिया भारत का एक अंग बन चुका था। इसलिए भारतीय मूल की प्रत्येक वस्तु को अपमानित, अधोपतित एवं नष्ट भ्रष्ट किया जाना चाहिए।”
सचमुच इस्लाम और उसके आक्रमणकारियों का भारत के प्रति और भारत की संस्कृति व धर्म के प्रति ऐसा ही दृष्टिकोण रहा था। इसी दृष्टिकोण को दृष्टिगत रखते हुए भारत के साथ और भारत के धर्म व संस्कृति के साथ अपमान और तिरस्कार का हर वह उपाय अपनाए गया जिसे इस्लाम के आक्रमणकारी अपना सकते थे। अपनी इस योजना को सिरे चढ़ाने के लिए इस्लाम और उसके मानने वालों ने भारतीय धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाने में भी किसी प्रकार की कमी नहीं की। अतः इन शासकों से भारत और भारत के लोगों के प्रति किसी प्रकार की उदारता की कल्पना करना निरी मूर्खता है।
उनके द्वारा भारत के धर्म और संस्कृति का उपहास करने की यह प्रवृत्ति इस्लाम के भारत में आगमन के साथ ही आरंभ हो गई थी। दुर्भाग्य से इसी प्रवृत्ति को कांग्रेस और कम्युनिस्टों ने भी अपना लिया। इतना ही नहीं, धर्मनिरपेक्षता के नाम पर आधुनिकतावादी हिंदुओं ने भी भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रति इसी दृष्टिकोण को अपनाकर अपना लेखन कार्य जारी किया। उसी का परिणाम है कि तथाकथित प्रगतिशील धर्मनिरपेक्षतावादी लेखक अपने द्वारा ऐसा साहित्य इस समय भी बड़ी मात्रा में लिख रहे हैं जिससे वैदिक या सनातन धर्म और संस्कृति का उपहास होता हो या उसे ईसाई और मुसलमानों की संस्कृति की अपेक्षा निम्न करके आंका जा सके।
हमें स्वामी विवेकानंद के इन शब्दों को स्वयं अपने विषय में ही ध्यान रखना चाहिए कि :- “तुमने सदियों के आघातों को सहन किया है। केवल इसलिए कि तुमने इस विषय में चिंता बनाए रखी और इसके लिए सभी कुछ की बलि भी दे डाली। तुम्हारे पूर्वजों ने साहस के साथ सभी कुछ सहा। हर प्रकार की यातनाएं झेलीं। यहां तक कि मृत्यु भी स्वीकार कर ली। किंतु अपने धर्म को सुरक्षित बनाए रखा। विदेशी आक्रांताओं ने एक के बाद एक मंदिर तोड़ा, किंतु जैसे ही आक्रमण की आंधी साफ हुई तो मंदिर का शीर्ष पुनः खड़ा कर दिया जाता था। इनमें से दक्षिण भारत के कुछ प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर तुम्हें अपार बुद्धिमत्ता की शिक्षा देंगे और इनमें तुम्हें देश ,धर्म व हिंदू समाज के इतिहास की गहनतम दृष्टि, अनेक की अपेक्षा कहीं अधिक प्राप्त हो जाएगी ।
ध्यान से देखो, इन मंदिरों ने किस प्रकार सैकड़ों आक्रमणों के आघातों के चिन्हों को संभाला हुआ है। यानी कि उन पर सैकड़ों आक्रमणों के चिन्ह अंकित हैं और सैकड़ों पुनर्निर्माण के बीच अंकित हैं। वे निरंतर ध्वंस किए जाते थे और ध्वंसावशेषों से नवजीवन युक्त और सदैव की भांति निरंतर पुनर्जीवित होते रहते थे।” ( कंपलीट वर्क्स खंड 3rd पृष्ठ 289)
इस्लाम ने भारत की मूर्ति पूजा का विरोध किया। यह सही भी है। क्योंकि मूर्ति भगवान नहीं होती और ना ही मूर्ति पूजा से भगवान की प्राप्ति होती है। इसके उपरांत भी हमें अनवर शेख के इन शब्दों पर ध्यान देना चाहिए कि :- “पैगंबरपन की व्यवस्था भी बहुत कुछ मूर्तियों के समान है । जहां कि दैवी शक्तियां उसके पीछे छिपी मूर्ति के ज्ञान का, वे दृश्यमान सहयोगी या चिह्न का काम करते हैं। परिणाम स्वरूप लोग मूर्ति की पूजा करते हैं ना कि संबंधित देवता की। जब एक व्यक्ति अपने को पैगंबर होने का दावा करता है तो वह अपने आपको परछाई और ईश्वर को वास्तविक के रूप में प्रस्तुत करता है। किंतु जैसे ही उसमें असीमित प्रभुत्व की चाह पैदा हो जाती है, वह अति असाधारण रीति से इस वरीयता के क्रम को बदल देने के लिए व्यग्र हो जाता है कि लोग सोचने लगें कि परछाई ही वास्तविकता है और वास्तविकता परछाई मात्र ही है।”
वास्तव में अनवर शेख ने यहां बड़ी पते की बात कही है। सारा इस्लामिक जगत मूर्ति पूजा का विरोधी होकर भी एक ऐसी मूर्ति की पूजा कर रहा है, जो उसके और उसके खुदा के बीच खड़ी है। इस मूर्ति के उस ओर देखने का साहस तो बड़े से बड़े इस्लामिक विद्वान या इस्लामिक स्कॉलर को भी नहीं होता। उनके लिए इस प्रकार की मूर्ति पूजा गले की फांस बन चुका है। सच को कोई कह नहीं सकता कि खुदा मूर्ति के उस ओर है। उससे मिलने के लिए बीच की मूर्ति को हटाना पड़ेगा । जिसे खुदा से मिलने की चाह है उसके लिए किसी प्रकार के मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। पर जिस प्रकार मूर्ति या तथाकथित भगवानों को हिंदू समाज ने अपने लिए अपने भगवान का मध्यस्थ बना लिया, उसी प्रकार इस्लाम ने भी एक अदृश्य, पर वास्तव में दृश्य मूर्त्ति को अपने खुदा से मिलने का मध्यस्थ बना लिया।
मूर्ति पूजा की दुर्बलता को समझ कर ही अनवर शेख ने उसको कहीं इस्लाम के पैगंबरपन की अपेक्षा उचित माना है। वह लिखते हैं कि :- “मैं इतना अवश्य कहना चाहूंगा की मूर्ति पूजा में ढोंग मात्र भी नहीं होता है, क्योंकि यह या तो अज्ञानता वश की जाती है अथवा मूर्ति को मात्र दृश्यमान सहयोग सामग्री माना जाता है। दूसरी ओर पैगंबरपन में निष्ठा का सर्वथा अभाव ही होता है, क्योंकि पैगंबर का लक्ष्य स्वयं का मानवता के आवरण को हटाए बिना ही ईश्वर के रूप में पूजा जाने का होता है। यह पैगंबर के चमत्कारों को इस सीमा तक बढ़ा चढ़ाकर प्रदर्शन से किया जाता है कि वह वास्तविकता के रूप में दिखने लगता है।”
इस्लाम के मानने वालों की सोच होती है कि जब तक आप किसी क्षेत्र में या किसी देश में कमजोर हो या अल्पसंख्यक हो तब तक अपने आपको शांति का पुजारी बनाए रखो। काफिरों को इस बात का आभास देते रहो कि हम उनके वर्चस्व को स्वीकार करते हैं और हम शांति के साथ रहने के अभ्यासी हैं ।पर जैसे ही शक्ति प्राप्त कर बराबरी के स्तर पर आ जाओ तो दूसरे के विनाश के लिए और अपना वर्चस्व स्थापित करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दो। वास्तव में, मुसलमानों को यह प्रवृत्ति अपने पैगंबर से ही प्राप्त हुई है ।
अनवर शेख इस बारे में हमारा बहुत स्पष्ट मार्गदर्शन करते हैं। वह कुरान की ही व्यवस्थाओं का उल्लेख कर यह स्पष्ट करते हैं कि जब तक मोहम्मद अपने आप में कमजोर था , तब तक वह अपने आपको खुदा का सेवक कहता रहा , पर जैसे ही उसने शक्ति प्राप्त कर ली तो वह स्वयं खुदा के साथ सह शासक बन बैठा।
इस विषय में अनवर शेख लिखते हैं कि मोहम्मद मूर्तियों से घृणा करता था और उनके विनाश को उचित ठहराता था, क्योंकि वह स्वयं अपने आपको एक मूर्त्ति के रूप में स्थापित कर अपनी ही मूर्ति की पूजा करवाना चाहता था। यह सिद्धांत अटपटा लगता है , किंतु सत्य है। अपने इस मंतव्य पर मोहम्मद पैगंबर धीरे-धीरे आगे बढ़ा। कुरान में प्रारंभ में उसने अपने आप को एक सेवक बताया। यह भी लिखा कि वह अनदेखे को नहीं जानता और उसके पास चमत्कार दिखाने की कोई शक्ति नहीं है। मुझे तो अल्लाह की सेवा करने का ही आदेश मिला है ना कि उसके साथ किसी अन्य को शरीक करने का। मैं उसे ही पुकारता हूं और मुझे उसी की ओर लौटना है।
वास्तव में पैगंबर ने अपने लिए यह दावा। तब तक किया जब तक वह अपने आप को कमजोर मान रहा था। जैसे ही वह शक्तिशाली और आत्मनिर्भर हो गया तो उसने अपने लिए नई व्यवस्था लागू करवाई। कहा कि – केवल ईश्वर को मानना पर्याप्त नहीं है, अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करो। यदि वह मुंह मोड़े तो जान लो कि अल्लाह काफिरों से प्रेम नहीं करता। यह भी लिखा कि जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करेगा वह उसे बागों अर्थात जन्नत में प्रवेश करेगा । इस प्रकार की व्यवस्थाओं को लिखकर पैगंबर ने अपने आप को खुदा जैसा सिद्ध करने का प्रयास किया।
मोहम्मद अपने पैगंबरपन को सारी दुनिया पर लादने की योजना बना कर चला था। यही कारण था कि वह भारत के धर्म और भारत की संस्कृति से महान घृणा करता था। क्योंकि जब तक भारत का एकेश्वरवादी वैदिक धर्म खड़ा था, तब तक उसकी योजना सारे संसार में उसकी अपनी भावना के अनुरूप लागू नहीं हो सकती थी। यही कारण था कि उसने भारत के वैदिक समाज को क्षत-विक्षत करने का भरसक प्रयास किया। मोहम्मद की इस प्रकार की भारत विरोधी मानसिकता को उसके उत्तराधिकारी आक्रमणकारियों ने भी अपनाया। इस विषय में अनवर शेख लिखते हैं कि मोहम्मद की पैगंबरीय योजनाओं में भारत एक महान रोड़ा था। इसका कारण यह था कि अरब की जीवन व्यवस्था और पांथिक विचार दोनों ही भारत की संस्कृति और धर्म से बुरी तरह प्रभावित थे। अपनी बात को और अधिक स्पष्ट करने के लिए मैं कहना चाहूंगा कि जिस प्रकार आज भारतीय उपमहाद्वीप इस्लाम की जीवन पद्धति से प्रभावित है उसी प्रकार पैगंबर मोहम्मद के काल में अरब महाद्वीप हिंदू जीवन व्यवस्था से प्रभावित था। अतः जब तक मोहम्मद हिंदुत्व की जड़ों पर सफलतापूर्वक आघात न करे, तब तक अपने आपको पूजनीय नहीं बना सकता था। संक्षेप में, अपने को पूजनीय स्थापित करने के लिए उसे हिंदू मूर्तियों को नष्ट करना अनिवार्य था।”
आज हमारे देश में भगवा या केसरिया को कोसने वाले भी बड़ी संख्या में हैं। यह तो और भी अधिक दु:ख का विषय है कि स्वयं हिंदुओं में भी कई लोग भगवा या केसरिया या गेरुआ को हेय दृष्टि से देखते हैं। इसके संबंध में जब कोई व्यक्ति कुछ लिखता , पढ़ता या बोलता है तो उसे हिंदू समाज में ही बैठे यह अर्धमुस्लिम अपमानित करते हैं । जिस केसरिया पर कभी अरब भी गर्व करता था, उसे आज स्वयं भारतवर्ष के लोग भी अपना पूर्ण समर्थन नहीं देते। जिन लोगों की इस प्रकार की सोच बन चुकी है कि केसरिया घृणा का प्रतीक है वह हिंदू समाज का एक अंग होकर भी वास्तव में अर्धमुस्लिम बन चुके हैं। मानसिक रूप से बीमार इन लोगों का उपचार किया जाना समय की आवश्यकता है।
केसरिया के सच और महत्व पर प्रकाश डालते हुए अनवर शेख ने लिखा है कि सामान्यतः भारत के प्रति विशेषकर हिंदुत्व के प्रति छुपी हुई घृणा के संदर्भ में हमें समझ लेना चाहिए कि ओ३म या हिंदू ध्वज का रंग भगवा होता है। जिसे केसरिया और गेरूआ भी कहते हैं। उनका ध्वज उगते हुए सूर्य का प्रतिनिधित्व करता है, जो न केवल भगवा रंग की ओर संकेत करता है वरन उस समय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्ध्वगामी भारतीय शक्ति एवं सामर्थ्य की ओर भी संकेत करता है। वास्तव में केसरिया यहां का राष्ट्रीय रंग था। क्योंकि हिंदू वीर पुरुष, सन्यासी और संत केसरिया रंग के कपड़े पहना करते थे। इसके अतिरिक्त यह रंग हिंदू ग्रंथों में वर्णित वीरता की हिंदू परंपरा, महानता और उदारता के कर्मों के प्रति निष्ठा का भी प्रतीक था। अथर्ववेद भगवा रंग के ध्वज का स्पष्ट उल्लेख करता है । ……अरब देवता ही नहीं वरन सामान्य अरब वासी भी भारतीय प्रभाव में पीले या केसरिया रंग के वस्त्र पहना करते थे। जिनसे पैगंबर को इतनी घृणा थी कि वह केसरिया पोशाकों को जला देने का समर्थन किया करता था और कुरान पढ़ते समय इन वस्त्रों के पहनने को मना करता था।”
इस प्रसंग में हम यह भी कहना चाहेंगे कि भारतवर्ष के छद्म इतिहास लेखकों और धर्मनिरपेक्षतावादी राजनीतिज्ञों का बार-बार यह कहना होता है कि कश्मीर में जो लोग आतंकवाद की राह पर चल रहे हैं उनके पीछे इस्लाम के मानने वालों की निर्धनता और अशिक्षा काम करती है। यह लोग अपनी इस प्रकार की मान्यता को स्थापित करते समय इस तथ्य को पूर्णतया उपेक्षित करते हैं कि मुसलमानों को आतंकवाद की राह पर ले जाने के लिए कुरान की वे 24 आयतें अधिक उत्तरदायी हैं जो काफिरों से घृणा करना सिखाती हैं। उनकी ओर संकेत करना या उन पर लिखना इन छद्म इतिहासकारों और लेखकों को स्वीकार नहीं है या जानबूझकर वह उन पर लिखना, पढ़ना या बोलना नहीं चाहते।
इसके उपरांत भी यदि एक बार यह मान भी लिया जाए कि कश्मीर के आतंकवादियों की निर्धनता और अशिक्षा ही उन्हें आतंकवादी बनाती है तो क्या वहां या इस पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अशिक्षा और निर्धनता केवल मुसलमानों के हिस्से में ही आई है ? क्या इस उपमहाद्वीप में हिंदू निर्धन और अशिक्षित नहीं है ? यह बात तब और भी अधिक विचारणीय हो जाती है जब हिंदू समाज के एक वर्ग को सदियों तक लोगों ने निर्धन और अशिक्षित बनाए रहने का प्रबंध किया। भारत का वह दलित शोषित समाज आज तक आतंकवादी नहीं बना और चुपचाप अपनी रोजी-रोटी में लगा रहा। भारतीय समाज का दलित, शोषित, उपेक्षित समाज कभी आतंकवादी नहीं बना। इसका कारण केवल एक है कि उसने चाहे किसी भी दृष्टिकोण से सही , वे शिक्षाएं प्राप्त की हैं जो उसे मानव बनाए रखकर समाज की मुख्यधारा में चलने के लिए प्रेरित करती हैं और यह सिखाती हैं कि पराए धन को हड़पने के लिए अपने जीवन को आतंकी मत बनाना। वस्तुतः किसी भी समाज को उसके महापुरुषों की या धर्म ग्रंथों की शिक्षाएं बहुत अधिक प्रभावित करती हैं। इस सच को यदि हिंदू समाज पर लागू करके देखा जा सकता है तो इसे मुस्लिम या ईसाई समाज पर लागू करके क्यों नहीं देखा जाता ?
आज ऐसे ही प्रश्न हमसे ज्ञानवापी मस्जिद का वर्तमान पूछ रहा है और हमसे कह रहा है कि सांप्रदायिक घृणा से भारतीय उपमहाद्वीप को भयंकर हानि उठानी पड़ी है। अब भविष्य को सुधारने के लिए इतिहास का सुधार आवश्यक है। यदि इसके लिए मुस्लिम समाज के विद्वान आगे आकर पहल करें तो यह देश के सर्व संप्रदाय समभाव के महान आदर्श को स्थापित कराने में बहुत अधिक सहायक सिद्ध होगा।

डॉक्टर राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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