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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

ज्ञानवापी मस्जिद : तथ्य, सत्य और राष्ट्रीय संकल्प

ज्ञानवापी मस्जिद को लेकर इस समय चर्चा जोरों पर है। भारत में गंगा जमुनी संस्कृति की बात करने वाले छद्म धर्मनिरपेक्ष तथाकथित इतिहासकार और राजनीतिज्ञ इसे हिंदू मुस्लिम स्थापत्य कला का एक बेजोड़ नमूना बता रहे हैं। यह सब कुछ उस समय हो रहा है जब मस्जिद के स्थान पर काशी विश्वनाथ मंदिर को एक से अधिक बार तोड़ने के स्पष्ट प्रमाण हमारे पास इतिहास में उपलब्ध हैं। भारतवर्ष में गंगा जमुनी संस्कृति की बात करने वाले लोगों से यह पूछा जा सकता है कि यदि भारत की संस्कृति का निर्माण मुस्लिमों के आने के पश्चात ही हुआ है तो फिर भारत की वैदिक संस्कृति का क्या होगा ? हमें भारत की वैदिक संस्कृति का सर्व समन्वयी स्वरूप इस तथाकथित गंगा जमुनी संस्कृति से कहीं अधिक उत्कृष्ट दिखाई देता है । इसके बहुत सारे कारण हैं। उनमें से एक यह भी है कि यह गंगा जमुनी संस्कृति भारत के बारे में कुछ इस प्रकार की मान्यता रखती है कि भारतवर्ष में जातीय वैमनस्य तो सदा से रहा है जबकि मुस्लिमों के आने के पश्चात सांप्रदायिक सद्भाव अवश्य पैदा हो गया। जबकि वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है।
हमें कुछ इस प्रकार दिखाया, बताया और समझाया जाता है कि भारत सांप्रदायिक सद्भाव का उत्कृष्ट उदाहरण उत्पन्न करने वाला देश है। भारतवर्ष में इस प्रकार का सांप्रदायिक सद्भाव मुस्लिमों के आने के पश्चात विकसित हुआ। उससे पहले यहां जातियों तक में पारस्परिक कलह और कटुता का वातावरण था। इतिहास की इस विषयवस्तु में इस प्रकार की मिलावट से एक नया संदेश और संकेत जाता है कि भारत के मुस्लिम शासक सांप्रदायिक सद्भाव में विश्वास रखते थे और उन्होंने पूर्ण मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए भारत पर शासन किया था।
जो लोग भारत के मुस्लिम शासकों के विषय में इस प्रकार की अवधारणा से ग्रस्त हैं उन्हीं का कहना है कि ज्ञानवापी मस्जिद हिंदू और मुस्लिम स्थापत्य का मिश्रण है। मस्जिद के गुंबद के नीचे मंदिर के आकार जैसी दीवार दिखाई देती है। अपनी अतार्किक और मूर्खतापूर्ण धारणाओं को सिरे चढ़ाने के लिए ये तथाकथित छद्म इतिहासकार सारे देश को भ्रमित करने का प्रयास करते रहते हैं। इनके भ्रमात्मक प्रचार से सत्य कहीं ओझल हो जाता है और असत्य का महिमामंडन होते होते वह सत्य का स्थान प्राप्त कर लेता है।
ऐसे ही इतिहासकारों की एक मान्यता यह भी है कि भारतवर्ष में देश और राष्ट्र की अवधारणा संपूर्ण संसार की भांति 18वीं 19वीं शताब्दी से स्थापित होनी आरंभ हुई । उससे पहले भारत वर्ष में देश और राष्ट्र जैसे शब्द ना तो प्रचलित थे और ना ही इन पर कोई विचार किया जाता था । इनका तर्क यह भी होता है कि महाराणा प्रताप और अकबर के बीच जो संघर्ष हुआ वह भी हिंदू मुस्लिम जैसी सोच से ग्रसित होकर नहीं हुआ था, अपितु यह केवल एक राजनीतिक संघर्ष था। जिसमें महाराणा प्रताप और अकबर अपने-अपने राज्य विस्तार के लिए लड़ रहे थे। सच इसके भी विपरीत है। संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ वेद में अनेक स्थलों पर राष्ट्र शब्द का प्रयोग किया गया है। इसके अतिरिक्त राष्ट्र की भूमि के प्रति समर्पित होकर कार्य करते रहने के संकेत भी वेद ने अनेक स्थानों पर किए हैं। राष्ट्र को क्षतिग्रस्त करने वाले राक्षस लोगों के विरुद्ध क्या जाना चाहिए ? – इस पर भी वेद ने स्पष्ट रूप से अपना उपदेश प्रकट किया है।
भारत के लोगों ने प्राचीन काल से अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित होकर अनेक ऐसे प्रतीक स्थापित किए जिन्हें वे दुर्ग या धर्मस्थल के रूप में श्रद्धा भाव से देखते रहे। भारत में राष्ट्र की अवधारणा को सुदृढ़ करने के लिए राजनीति और धर्म दोनों साथ साथ चलते हैं। राजनीति पर नैतिकता की नकेल धर्म डालता है। कहने का अभिप्राय है कि राजनीति कहीं भी अनियंत्रित, स्वेच्छाचारी और तानाशाह ना हो जाए, इस बात की सुव्यवस्था धर्म के नैतिक नियमों से उदभूत होती है। इस प्रकार राजनीति के केन्द्र दुर्ग जहां भारत के पवित्र राजनीतिक चिन्तन को प्रकट करते हैं वहीं भारत की मंदिर संस्कृति धर्म की पवित्रता को स्थापित करती है। दुर्ग और मंदिर भारत के लोगों के लिए समान रूप से श्रद्धा के केंद्र रहे इसीलिये रहे हैं क्योंकि इन दोनों से ही राष्ट्र निर्माण के स्वर भारत में प्राचीन काल से निकलते गूंजते रहे हैं।
यहां पर यह भी उल्लेखनीय है कि भारत की ऐसी व्यवस्था अपने आप बैठे-बिठाए नहीं बनी, बल्कि इसके पीछे हमारे ऋषियों का दीर्घकालिक बौद्धिक परिश्रम कार्य करता रहा है। वेदों के प्रकांड विद्वान इस व्यवस्था को स्थापित करने के लिए दीर्घकाल तक परिश्रम करते रहे हैं। भारतवर्ष में वेदों के अतिरिक्त जितने भर भी आर्ष ग्रंथ हैं उन सबके मूल में राष्ट्र चिंतन और धर्म चिंतन विशेष प्रेरक तक के रूप में कार्य करता रहा है ।
काशी विश्वनाथ मंदिर भारत के राष्ट्रवादी चिंतन को प्रकट करने वाला एक पवित्र प्रेरक स्थल रहा है। यही कारण रहा कि मुस्लिमों ने जिन जिन धर्म स्थलों को तोड़ने के लिए इसलिए चिह्नित किया कि उनके तोड़ने से भारत का राष्ट्रवादी चिंतन समाप्त होगा, उनमें काशी विश्वनाथ मंदिर का स्थान सर्वोपरि है। एक से अधिक बार कितने ही मुस्लिम आक्रमणकारियों और शासकों ने इस मंदिर को तोड़ा, परंतु भारत के लोग अपने धर्म और राष्ट्र के चिंतन के केंद्र के रूप में मान्यता प्राप्त इस धर्म स्थल को बार-बार बनाते रहे।
भारत प्राचीन काल से दुर्ग निर्माण, मंदिर निर्माण और ऐतिहासिक भवनों के निर्माण में विशेष रूप से पारंगत रहा है। राजा का राजभवन कैसा होना चाहिए , इस बात की जानकारी के लिए रामायण व महाभारत को हमें पढ़ना चाहिए। महाभारत में यह स्पष्ट उल्लेख है कि खांडवप्रस्थ में बनाए गए युधिष्ठिर के राजभवन में हजारों लोगों के एक साथ बैठने की सारी सुविधाएं उपलब्ध थीं। जिसमें न केवल राष्ट्र का बल्कि विश्व के कल्याण का चिंतन किया जाता था। इसी प्रकार मनु महाराज सहित चाणक्य ने भी राजभवनों और दुर्गों के निर्माण पर विशेष प्रकाश डाला है। ऐसे में यह कहा जाना कि मुसलमानों के आने के पश्चात ही भारत में स्थापत्य कला प्रारंभ हुई, पूर्णतया गलत होगा। जो लोग ज्ञानवापी मस्जिद को हिंदू-मुस्लिम स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना कहते हैं, उन्हें भारत के स्थापत्य कला संबंधी प्राचीन ज्ञान पर भी ध्यान देना चाहिए । यदि ज्ञानवापी मस्जिद और ताजमहल की आकृति में कुछ समरूपता है तो इसका अभिप्राय यह नहीं है कि यह मुगलों की देन है अपितु इसका अभिप्राय यह है कि भारत के स्थापत्य कला संबंधी ज्ञान का दोनों स्थानों पर समान रूप से उपयोग किया गया है। दोनों की समरूपता यह बताती है कि यह एक ही शैली पर निर्माण करने वाले लोगों द्वारा निर्मित किए गए हैं । मुसलमानों के पास अपनी कोई स्वतंत्र स्थापत्य कला कभी नहीं रही , इसलिए यह केवल और केवल आर्य हिंदू स्थापत्य कला के ही सर्वोत्कृष्ट उदाहरण हैं।
मुगलों के द्वारा यदि इस ज्ञानवापी मस्जिद पर किसी गुंबद आदि का निर्माण करके या मूल मंदिर के स्वरूप में थोड़ा बहुत परिवर्तन करके इस पर अपनी छाप छोड़ने का प्रयास किया गया है तो वह अनाधिकार चेष्टा से अतिरिक्त कुछ भी नहीं है। ऐसे बलात प्रयासों को इतिहासकारों को इसी दृष्टिकोण से देखना चाहिए। यदि आप किसी के मूल लेख के साथ छेड़छाड़ नहीं कर सकते और यदि करते हैं तो उसके लिए दंडित किए जा सकते हो तो इसी प्रकार स्थापत्य कला के प्रतीक किसी धर्म स्थल, दुर्ग या राजभवन के मौलिक स्वरूप में भी आपको किसी प्रकार का परिवर्तन करने का अधिकार नहीं है। यदि इसके उपरांत भी ऐसा परिवर्तन करते पाए जाते हो तो निश्चित रूप से इसके लिए भी आप को दंडित किया जाना ही चाहिए। इसके उपरांत भी यदि कुछ लोग ज्ञानवापी मस्जिद को हिंदू मुस्लिम गंगा जमुनी संस्कृति का बेजोड़ नमूना कहते हैं तो क्या वह यह बता सकते हैं कि गंगा जमुनी संस्कृति के प्रतीक इस बेजोड़ नमूने को कब हिंदू मुसलमानों ने संयुक्त रूप से मिलकर स्थापित किया था या बनाया था ? यदि बनाया था तो फिर इसको मुगलों या मुसलमानों के द्वारा बार-बार ढहाया क्यों जाता रहा और क्यों हिंदू इसे बार-बार बनाते रहे ? निश्चय ही कहीं ना कहीं घालमेल है। कोई भी मुस्लिम या मुस्लिम शासक इतना उदार नहीं हो सकता कि वह अपने धर्म स्थल को हिंदू स्वरूप देने पर सहमत हो जाए। इसलिए इतिहास संबंधी ज्ञान रखने वाले तथाकथित फ्रेंच कट दाढ़ीबाज विद्वान भारत को ऐसे पहाड़े ना पढ़ाएं कि मुस्लिमों के द्वारा अपनी सहर्ष स्वीकृति के पश्चात इस ज्ञानवापी मस्जिद का आधा स्वरूप मंदिर वाला और आधा मस्जिद वाला बना।
ऐसा होता तो 1809 में जब हिंदुओं ने विश्वनाथ मंदिर और ज्ञानवापी मस्जिद के बीच एक छोटा स्थल बनाने का प्रयास किया था तो उसे मुस्लिमों द्वारा रोका नहीं जाता और ना ही उस समय बड़े स्तर पर देश में सांप्रदायिक दंगे होते । इसके विपरीत उस समय मुस्लिमों की हृदय की यह पवित्रता प्रकट होती कि वे हिंदुओं को ऐसा करने की स्वतंत्र सहमति प्रदान कर देते।
अब इस ज्ञानवापी मस्जिद के संबंध में न्यायालय में जो याचिका दायर की गई है उसमें कहा गया है कि मस्जिद में मंदिर के अवशेषों का प्रयोग किया गया है जिससे यह स्पष्ट होता है कि इस भूमि पर हिंदुओं का अधिकार रहा है और यह उन्हें अब लौटा दी जानी चाहिए। याचिका के अनुसार इस वाद में प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट 1991 लागू नहीं होता, क्योंकि मस्जिद को मंदिर के अवशेषों से बनाया गया था ​​​​​​।1991 में काशी विश्वनाथ मंदिर के पुरोहितों के वंशजों ने वाराणसी सिविल कोर्ट में याचिका दायर की थी । उस याचिका में कहा गया था कि मूल मंदिर को 2050 वर्ष पहले राजा विक्रमादित्य ने बनवाया था। इसके पश्चात 1669 में औरंगजेब ने इसे तोड़कर मस्जिद बनवाई।
1998 में ज्ञानवापी मस्जिद की देखरेख करने वाली कमेटी अंजमुन इंतजामिया इसके विरुद्ध इलाहाबाद हाईकोर्ट पहुंची। कमेटी ने कहा कि इस विवाद में कोई निर्णय नहीं लिया जा सकता, क्योंकि प्लेसेस ऑफ वरशिप एक्ट के अंतर्गत इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसके बाद इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने निम्न न्यायालय की कार्यवाही पर रोक लगा दी थी।
2019 में विजय शंकर रस्तोगी ने वाराणसी जिला न्यायालय में ज्ञानवापी मस्जिद परिसर के आर्कियोलॉजिकल सर्वे कराने की मांग करते हुए याचिका प्रस्तुत की। माननीय उच्च न्यायालय के स्थगन आदेश की वैधता पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय के एक आदेश के बाद 2019 में वाराणसी न्यायालय में फिर से इस मामले में सुनवाई आरंभ हुई।
2020 में अंजुमन इंतजामिया ने आर्कियोलॉजिकल सर्वे कराए जाने की याचिका का विरोध किया। इसी वर्ष रस्तोगी ने उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा स्थगन नहीं बढ़ाने का हवाला देते हुए निम्न न्यायालय से सुनवाई पुनः आरंभ करने की अपील की।
भारत में जिन लोगों को ज्ञानवापी मस्जिद के प्रकरण को लेकर कष्ट की अनुभूति हो रही है यह वही लोग हैं जो इतिहास के सच को सच के रूप में स्थापित नहीं होने देना चाहते हैं। यदि उनकी आपत्ति केवल इस बात को लेकर है कि संसार के सामने ज्ञानवापी मस्जिद का सच ना आने पाए तो हमारा यह राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए कि यह सच अब सामने आना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त यदि ऐसे लोगों की ऐसे कष्ट की अनुभूति या आपत्ति केवल इस आधार पर है कि वे अल्पसंख्यक हैं और उनके साथ अन्याय होगा तो भारत सरकार और भारत के सर्वोच्च न्यायालय को उन्हें पूर्ण सुरक्षा दी जानी चाहिए अर्थात उनकी उपस्थिति में दूध का दूध और पानी का पानी होना चाहिए। पर जब दूध का दूध और पानी का पानी हो जाए तो उस पर छाती पीटने वाले किसी अल्पसंख्यक गैंग को सामने ना लाया जाए। अपने राष्ट्रीय संकल्प की पूर्ति के लिए हमें आगे बढ़ना होगा। पीछे हटने का या यथास्थिति में खड़े रहकर कदमताल करने का समय बीत चुका है। यदि आज के परिप्रेक्ष्य में भी हमने कदमताल करने की नीति को अर्थात छद्म धर्मनिरपेक्षता के आधार पर तुष्टीकरण के खेल को खेलना जारी रखा तो यह हमारे लिए आत्मघाती हो सकता है।
13 / 05/ 2022

डॉ राकेश कुमार आर्य
संपादक : उगता भारत

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