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क्या कांग्रेस से भी अधिक देर तक शासन करने में सफल हो पाएगी भाजपा ?

प्रणब ढल सामंता

क्या हमारा मुल्क एकदलीय शासन की ओर बढ़ रहा है? यह सवाल आज भले ही एकदम वाजिब न लगे, लेकिन पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा प्रासंगिक हो गया है। इस वक्त भारत में एक ही पार्टी का दबदबा है। यह चीज आजादी के शुरुआती वर्षों में भी देखी गई थी, जब जवाहर लाल नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस का एकछत्र राज हुआ करता था। बस अंतर यह है कि नेहरू के जमाने में मजबूत विपक्ष का अभाव था। वहीं मौजूदा दौर में विपक्षी दल बिखरे हुए हैं।
कोई भी देश एकदलीय सियासत की तरफ दो सूरत में बढ़ता है। या तो उसके पास करिश्माई नेतृत्व हो या फिर करिश्माई काडर। भारत की बात करें, तो यहां हमेशा एकदलीय राजनीति का आधार नेतृत्व ही रहा है। चाहे हम नेहरू या इंदिरा गांधी के दौर की बात करें या फिर मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे की। लेकिन किसी भी पार्टी को सत्ता में लंबे समय तक बने रहने के लिए प्रभावशाली नेतृत्व के साथ जमीनी कार्यकर्ताओं की मजबूत फौज की भी दरकार होती है।
कोई विकल्प नहीं
पीएम मोदी का यह दूसरा ही कार्यकाल है, इसलिए अभी एकदलीय शासन की चर्चा थोड़ी जल्दबाजी लग सकती है। लेकिन कांग्रेस फिलहाल अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है। उसके पास ऐसा नेतृत्व नहीं, जो पार्टी में नई जान फूंक सके। इस वजह से सत्तारूढ़ दल के सामने विपक्ष जैसी कोई चुनौती है ही नहीं। दूसरे शब्दों में कहें, तो जनता के पास सत्ताधारी पार्टी का कोई मजबूत विकल्प नहीं है। वहीं बीजेपी का यह स्वर्णिम दौर है। पश्चिम बंगाल में पार्टी को झटका जरूर लगा, लेकिन यूपी, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर की शानदार जीत से उसके हौसले बुलंद हैं। बीजेपी हर वर्ग से आने वाले नेताओं को अगुवाई का मौका देती है। दूसरी ओर, कांग्रेस की पहचान नेहरू परिवार से आने वाले नेताओं के इर्द-गिर्द ही सिमटी रही है। वह चाहकर भी इस छवि से कभी बाहर नहीं निकल पाई।
गांधी परिवार से बाहर के जितने लोगों ने भी पार्टी की अगुवाई की, वे सभी अंतरिम अध्यक्ष की तरह ही देखे गए। यही वजह है कि कांग्रेस के भीतर ज्यादातर लोग बस इंतजार कर रहे हैं कि राहुल कब दोबारा अध्यक्ष बनने के लिए हामी भरते हैं। कुछ कांग्रेसी इस परंपरा से नाराज और निराश हैं, तो कुछ ने बेहतर मौकों की तलाश में दूसरी पार्टियों का दामन थाम लिया।
नतीजा यह हुआ कि पार्टी का जनाधार तेजी से खिसकने लगा। हर चुनाव के साथ उसकी सीटें कम हो रही हैं। वोट शेयर घट रहा है। बीजेपी विरोधी वोट भी कांग्रेस को मिलने के बजाय क्षेत्रीय दलों को मिल रहे हैं।
ऐसा नहीं है कि कांग्रेस एकाएक कमजोर हुई है। वह 90 के दशक की शुरुआत से ही बिखरने लगी थी। लेकिन अब शायद आगामी विधानसभा चुनाव के रूप में उसके पास कुछ कर दिखाने का आखिरी मौका है। उसे गुजरात, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, मध्य प्रदेश और राजस्थान के चुनाव में बीजेपी को कांटे की टक्कर देनी होगी। अगर इन चुनावों में भी पार्टी बुरी तरह हारती है, तो यह उसके ताबूत में आखिरी कील होगी। उसके बचे-खुचे सूरमा भी उसे छोड़ जाएंगे।
कांग्रेस के उलट बीजेपी की बात करें, तो उसने एक नेता वाले मॉडल को कारगर तरीके से आत्मसात किया है। अटल बिहारी वाजपेयी के समय में सत्ता का वैकल्पिक केंद्र भी था। लेकिन मोदी के सामने इस तरह की भी कोई चुनौती नहीं। मोदी फिलहाल चट्टान की शक्ल अख्तियार कर चुके हैं, जिन्हें हवा के छोटे-मोटे थपेड़ों से तो कोई फर्क ही नहीं पड़ने वाला।
ऐसे में सवाल उठता है कि बीजेपी को किससे चुनौती मिल सकती है? कांग्रेस के लगातार पतन के बाद कुछ मजबूत क्षेत्रीय दल ही हैं, जो बीजेपी को सीधी टक्कर दे पा रहे हैं। लेकिन उनका प्रभाव बस एकाध राज्य तक ही सीमित है। क्षेत्रीय पार्टियां बीजेपी के खिलाफ एकजुट होंगी, इसकी भी कोई गुंजाइश नहीं दिखती। इस तरह की एकता भी तभी बन सकती है, जब कांग्रेस मजबूत हो। लेकिन फिलहाल उसकी भी स्थिति किसी क्षेत्रीय दल जैसी ही है।
वैसे भी क्षेत्रीय दल हमेशा अपने राज्य से जुड़े हितों को तरजीह देते हैं। बीजू जनता दल और वाईएसआर कांग्रेस इसकी सबसे अच्छी मिसाल हैं। ये दोनों पार्टियां केंद्र के ख़िलाफ खुलकर बिगुल नहीं बजातीं। वे पहले मुद्दों को देखती हैं और उसके आधार पर समर्थन या फिर विरोध में जाने का फैसला करती हैं।
अब बीजेपी उत्तर-पश्चिम के एक दर्जन राज्यों तक सीमित पार्टी नहीं रही। अब सभी राज्यों में उसका जनाधार बढ़ रहा है। जिन राज्यों में वह सत्ता में नहीं है, वहां भी विकल्प के रूप में उभर रही है। यह चीज पश्चिम बंगाल, ओडिशा और तेलंगाना जैसे राज्यों में देखी जा सकती है। बीजेपी के विस्तार को क्षेत्रीय दल अपने लिए ख़तरा तो मानते हैं, लेकिन फिर उन्हें एक मंच पर आने से गुरेज है। वे अपने हिसाब से बीजेपी का मुकाबला करना चाहते हैं।
कांग्रेस की तरह क्षेत्रीय दलों के भीतर भी नेतृत्व एक अहम मसला है। ज्यादातर क्षेत्रीय दलों की कमान अब दूसरी पीढ़ी के परिवारवादी नेताओं के हाथ में हैं। अगर बंगाल की सीएम ममता बनर्जी को छोड़ दिया जाए, तो अधिकतर क्षेत्रीय दलों के प्रमुख पीएम मोदी को सीधे चुनौती देने से बचते हैं। वे विधानसभा चुनाव को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की लड़ाई नहीं बनने देना चाहते, क्योंकि इसमें उनका नुकसान होने का खतरा ज्यादा रहता है। नतीजा यह होता है कि राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ कोई मजबूत स्वर नहीं उठता।
क्षेत्रीय दलों की सीमा
अगर आसान शब्दों में कहें, तो बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर चुनौती देना क्षेत्रीय दलों के बस की बात नहीं। यह काम सिर्फ कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टी ही कर सकती है। इसलिए उसके कमजोर होने का सीधा मतलब है मोदी की अगुवाई में बीजेपी का एकदलीय शासन स्थापित करने की राह पर आगे बढ़ना। लेकिन यह इस पर निर्भर करेगा कि बीजेपी सत्ता कैसे संभालती है। बेरोजगारी और महंगाई जैसे मुद्दों से कैसे निपटती है। और सबसे बड़ी बात- युद्ध के चलते असुरक्षित हुए वैश्विक माहौल में वह कैसी नीतियां अपनाकर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाती है।

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