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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

मोदी, योगी और वेद का राष्ट्रवाद

यदि हम भारतीय राष्ट्रवाद के विषय में भारत में रहकर ही चिंतन करें और भारत के प्राचीन साहित्य को खंगालने या उसकी पड़ताल करने का प्रयास करें तो पता चलता है कि वेदों में ही ऐसे अनेकों मंत्र हैं जिनमें राष्ट्रवाद के चिंतन को मानव मस्तिष्क में भरने का भारत सृष्टि के पहले दिन से कार्य करता चला आ रहा है । भारत का यह चिंतन व्यक्ति को व्यक्ति से जोड़कर उसे मोक्ष की ओर चलने के लिए प्रेरित करने वाला चिंतन है ।
यह बहुत ही सौभाग्य की बात है कि भारत की इसी चिंतन धारा के प्रतिनिधि पुरुष के रूप में हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ कार्य कर रहे हैं।
अथर्ववेद के ‘ पृथ्वी सूक्त ‘ में पृथ्वी को माता कहकर संबोधित किया गया है । वहां पर धरती माता का गुणगान करते हुए कहा गया है कि — ” माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः ” अर्थात यह भूमि माता है और मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ। ” इस प्रकार इस वेद मंत्र में पृथ्वी को माता कहकर राष्ट्र के साथ हमारे ऋषियों ने अपना संबंध माता और पुत्र का स्थापित किया । संसार में इससे पवित्र अन्य कोई संबंध नहीं हो सकता । जब हम किसी व्यक्ति के बारे में यह कहते हैं कि वह ‘धरतीपुत्र ‘ है तो उसका अर्थ यही होता है कि वह भारत के इस मौलिक संस्कार से जुड़ा हुआ है कि वह अपनी मातृभूमि को माता मानता है और स्वयं को उसके पुत्र के रूप में समर्पित करता है । इसी प्रकार किसी व्यक्ति के बारे में जब यह कहा जाता है कि ‘वह जड़ों से जुड़ा हुआ व्यक्ति है ‘- तो उसका अर्थ भी यही होता है कि वह भारत के इस मौलिक संस्कार से जुड़ा हुआ है कि वह अपनी मातृभूमि को सर्वाधिक प्यार करता है और उसके लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने के लिए समर्पित रहता है । जड़ से जुड़े होने का अर्थ है जन-जन से जुड़ा होना और भारत के एकात्म मानववाद के आधार पर भारत को विश्वगुरु बनाने के संकल्प को हृदय में धारण करके चलने वाला व्यक्ति ।
धरती को माता कहकर भारतवासियों ने अपने आप को उसके प्रति पूर्ण समर्पित कर दिया । यही कारण रहा कि जब – जब देश में राष्ट्र के लिए बलिदान करने की आवश्यकता अनुभव की गई , तब – तब भारत के कोटि-कोटि लोगों ने अपने आपको राष्ट्र के लिए वैसे ही समर्पित कर दिया जैसे कोई पुत्र अपनी मां के लिए अपना सर्वस्व समर्पित कर देता है या उसके लिए अपने आप को बलिवेदी पर चढ़ा देता है । यहां पर अनेकों अवसर ऐसे आए जब लोगों ने विदेशी शत्रुओं को भगाने के लिए बिना वेतन की सेना अपने आप तैयार कर ली और अपना सर्वोत्कृष्ट बलिदान देने के लिए सहर्ष युद्ध के मैदान में जा पहुंचे । नेताजी सुभाष चंद्र बोस की ‘आजाद हिंद फौज’ इसका ताजा उदाहरण है । इससे पहले भी अनेकों बार ऐसे अवसर आए जब जनता के बीच से कोई महायोद्धा उठा और उसने युवाओं का आवाहन कर एक बड़ी सेना तैयार कर विदेशियों का सामना किया । भारत का दुर्भाग्य रहा कि भारत के ऐसे महान योद्धाओं के महान कार्यों पर कोई शोध नहीं किया गया । ईर्ष्या और द्वेष से भरे इतिहासकारों की लेखनी ने इन महान योद्धाओं के ऐसे महान कार्यों को दबा दिया । इतना उत्कृष्टतम गौरवशाली इतिहास भारत ने तभी बनाया जब उसका उसकी मौलिक चेतना को झंकृत करने वाले ऐसे वेदमंत्र उसके पास सृष्टि के पहले दिन से उपलब्ध थे । जो उसे स्वतंत्रता का बोध कराते थे और स्वतंत्रता को प्रत्येक व्यक्ति का मौलिक अधिकार घोषित करते थे।

वेद के राष्ट्रवादी चिंतन को ही पुराणों ने भी स्थान दिया है । पुराण वास्तव में हमारे इतिहास की घटनाओं के वर्णन करने का ही साधन हैं। विष्णुपुराण में राष्ट्र के प्रति श्रद्धाभाव अपने चरमोत्कर्ष पर दिखाई देता है। इस पुराण में भारत का यशोगान ‘पृथ्वी पर स्वर्ग’ के रूप में किया गया है।

अत्रापि भारतं श्रेष्ठं जम्बूद्वीपे महागने।यतोहि कर्म भूरेषा ह्यतोऽन्या भोग भूमयः॥

गायन्ति देवाः किल गीतकानि धन्यास्तु ते भारत-भूमि भागे।स्वर्गापस्वर्गास्पदमार्गे भूते भवन्ति भूयः पुरुषाः सुरत्वात् ॥

पुराण का यह श्लोक केवल एक गप्प मात्र नहीं है और न ही यह मानव मस्तिष्क की कल्पना से जन्मा एक ऐसा श्लोक मात्र है जो आत्म प्रशंसा में गढ़ लिया गया है । इसके विपरीत सच यह है कि हमने वास्तव में भारत को देव पुरुषों का देश देर तक बनाए रखा। जब संसार के शेष देश सभ्यता और संस्कृति से सर्वथा वंचित थे और पशुओं की भांति परस्पर लड़ने मरने की बातें कर रहे थे , तब भारत ने देव संस्कृति का निर्माण कर लिया था। उस देव संस्कृति के संपर्क में जब भी कोई विदेशी आता था तो उसकी आत्मा यहीं और केवल यहीं निवास करने के लिए उसे प्रेरित करने लगती थी । भारत उस समय सचमुच में एक ‘पारसमणि’ बन गया था । इसी भाव को देखकर हमारे ऋषियों ने पुराण का यह श्लोक रचा होगा।

‘भागवतपुराण ‘ में तो भारतभूमि को और भी अधिक प्रशंसित करते हुए सम्पूर्ण विश्व में ‘सबसे पवित्र भूमि’ कहा गया है। वहां पर भी यह कहा गया है कि इस पवित्र भारतभूमि पर तो देवता भी जन्म धारण करने की अभिलाषा रखते हैं । क्योंकि संसार की यही एकमात्र ऐसी पवित्र भूमि है , जहां जन्म लेने पर स्वर्ग की प्राप्ति होती है अर्थात परलोक भी सुधर जाता है ।

कदा वयं हि लप्स्यामो जन्म भारत-भूतले।
कदा पुण्येन महता प्राप्यस्यामः परमं पदम्।

हिंदुत्व की चेतना के स्वर के रूप में भारत के रोम-रोम में स्थापित हुए एकात्म मानववाद के इसी भारतीय राष्ट्रवाद ने पराधीनता के काल में हमारे कवियों को भारत और भारती की प्रशंसा में गीत लिखने की प्रेरणा दी । यदि हम भारतीय स्वाधीनता आंदोलन में कवियों व लेखकों की कविताओं के योगदान पर चिंतन करें या उनको पढ़ें तो उनमें भारत के इसी एकात्म मानववादी राष्ट्रवाद की झंकार गुंजायमान होती हुई दिखाई देती है। जिसने सोए हुए भारत को जगाने का अतुलनीय कार्य किया।
अथर्ववेद के भूमि सूक्त के विषय में डॉ हृदय नारायण दीक्षित लिखते हैं, “देवता जिस भूमि की रक्षा उपासना करते हैं वह मातृभूमि हमें मधु सम्पन्न करे। इस पृथ्वी का हृदय परम आकाश के अमृत से सम्बंधित रहता है। वह भूमि हमारे राष्ट्र में तेज बल बढ़ाये। पृथ्वी सूक्त के 12.1.7 व 8 श्लोक कहते हैं “हे पृथ्वी माता आपके हिम आच्छादित पर्वत और वन शत्रुरहित हों। आपके शरीर के पोषक तत्व हमें प्रतिष्ठा दें। यह पृथ्वी हमारी माता है और हम इसके पुत्र- माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या:। (वही 11-12) स्तुति है “हे माता! सूर्य किरणें हमारे लिए वाणी लायें। आप हमें मधु रस दें, आप दो पैरों, चार पैरों वाले सहित सभी प्राणियों का पोषण करती हैं।” यहां पृथ्वी के सभी गुणों का वर्णन है लेकिन अपनी ओर से क्षमायाचना भी है, “हे माता हम दायें- बाएं पैर से चलते, बैठे या खड़े होने की स्थिति में दुखी न हों। सोते हुए, दायें- बाएं करवट लेते हुए, आपकी ओर पांव पसारते हुए शयन करते हैं- आप दुखी न हों। हम औषधि, बीज बोने या निकालने के लिए आपको खोदें तो आपका परिवार, घासफूस, वनस्पति फिर से तीव्र गति से उगे-बढ़े। आपके मर्म को चोट न पहुंचे।” 63 मंत्रों में गठित इस पृथ्वी सूक्त को अमरीकी विद्वान ब्लूमफील्ड ने विश्व की श्रेष्ठ कविता बताया है।
…वृहदारण्यकोपनिषद् (अध्याय 2, ब्राह्माण्ड 5) में याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी को समझाया, “इयं पृथ्वी सर्वेषा भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु – यह पृथ्वी सभी भूतों (मूल तत्वों) का मधु है और सब भूत इस पृथ्वी के मधु।” (वही, 1) इसी प्रकार “यह अग्नि समस्त भूतों का मधु है और समस्त भूत इस अग्नि के मधु हैं।” (वही 2) “यह वायु समस्त भूतों का मधु है और समस्त भूत वायु के मधु हैं।” (वही, 3) फिर आदित्य और दिशा चन्द्र, विद्युत मेघ और आकाश को भी इसी प्रकार “मधु” बताते हैं। (वही, 4-10) फिर कहते हैं “यह धर्म और सत्य समस्त भूतों का मधु है और समस्त भूत इस सत्य व धर्म के मधु है।” (वही, 11-12) यहां धर्म का अर्थ समूची सृष्टि प्रकृति को परिवार जानना और बरतना ही है। प्रकृति चाहती है सब जिएं, सबको जीने दें, सब सुखी हों, सब आनंद मग्न रहें। मधुमय हो सबका जीवन। प्रगाढ़ संवेदना की तरंग में इसी अनुभूति से जन्म लेती है – मधुप्रीति और मधुप्रीति से युक्त कोई भी व्यक्ति पर्यावरण का नाश नहीं कर सकता।
मां भारती के प्रति ऐसे ही पवित्र भावों से भरकर राष्ट्र निर्माण से विश्व निर्माण की ओर हम बढ़ें। व्यष्टि से समष्टि की ओर चलने का भारत का चिंतन भी हमसे यही कहता है ।

डॉ राकेश कुमार आर्य

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