Categories
बिखरे मोती

आत्मबोध से मिटत है,जग में सभी अभाव

बिखरे मोती-भाग 83

जग में दुर्लभ ही मिलें,
उर में साधुभाव।
यही तो दैवी संपदा,
पार लगावै नाव ।। 860 ।।
साधुभाव-अंत:करण के श्रेष्ठ भावों को साधुवाद कहते हैं। श्रेष्ठभाव अर्थात सद्गुण-सदाचार दैवी संपत्ति है।
व्याख्या : इस संसार में जमीन जायदाद और धन वैभव के स्वामी तो बहुत मिलते हैं किंतु दैवी संपत्ति का स्वामी कोई बिरला ही मिलता है। हमारे ऋषियों ने अंत:करण के श्रेष्ठ भावों को साधुभाव कहा है क्योंकि ये ही परमात्म प्राप्ति कराने वाले तथा जीवनी नैया को भवसागर से पार लगाने वाले हैं।
अशांत मन जाहिर करै,
हुआ है कोई पाप।
शांत मन से ध्यान हो,
जो पुण्य का है प्रताप ।। 861 ।।
व्याख्या : खिन्न अथवा मायूस मन इस बात का परिचायक है कि व्यक्ति से अपने जीवन में कोई भूल अथवा पाप हुआ है जबकि प्रसन्नचित अथवा शांत मन इस बात का बोधक होता है कि व्यक्ति का जीवन पाप की अपेक्षा पुण्य अथवा सत्कर्मों में व्यतीत हो रहा है। स्मरण रहे, प्रभु सिमरन में केवल ऐसे व्यक्तियों का ध्यान लगता है जिनका मन मोद (प्रसन्नता) में रहता है। अशांत अथवा उद्घिग्न मन वालों का प्रभु-सिमरन में कभी मन नही लग पाता है। अत: प्रसन्न चित्त रहने का अभ्यास कीजिए।
दृष्टिकोण में सर्वदा,
रखना तुम समभाव।
आत्मबोध से मिटत है,
जग में सभी अभाव ।। 862 ।।
व्याख्या : इस जीवन रूपी नदी के दो किनारे हैं :-एक सुख है दूसरा दुख है। ये धूप और छाया की तरह आते और जाते रहते हैं। इनके लिए कभी विवेक का संतुलन मत खोना। हमारे हृदय में संवेदना उठती है,व कुछ क्षण के पश्चात चली जाती है जो उन्हें तटस्थ भाव से देखता है वह प्रभावशून्य रहता है। जीवन के प्रति यही नजरिया समभाव कहलाता है। ध्यान रहे, संसार के सारे दुखों का प्रमुख कारण अज्ञानता है किंतु जब मनुष्य को आत्मज्ञान को जाता है तो समस्त सृष्टि के प्रति स्वत: ही समभाव उत्पन्न होता है तथा अज्ञानता जनित कष्ट क्लेश समाप्त हो जाते हैं।
अज्ञान के कारण डरत है,
इस दुनिया के लोग।
एक ज्ञान की किरण से,
कटते हैं सब रोग ।। 863 ।।
व्याख्या :-भाव यह है कि इस संसार में भय के मूल में अज्ञान छिपा है। यदि अज्ञान हट जाए तो डर स्वत: ही मिट जाता है। जैसे एक रोगी को रोग का भय सताता है किंतु डॉक्टर को भय नही लगता है क्योंकि उसे उसकी चिकित्सा का ज्ञान है। ठीक इसी प्रकार संसार में जितने भी दुख हैं उनका मूल कारण अज्ञान है। अत: हमें विविध प्रकार के ज्ञान के लिए सर्वदा प्रयासरत रहना चाहिए।
ज्ञान बढ़ै तो दुख घटै,
कर्म के क्षय से मोक्ष।
आत्मज्ञान हो ध्यान से,
प्रभु माया के परोक्ष ।। 864 ।।
व्याख्या : इस संसार में व्यक्ति के ज्ञान का जैसे तैसे प्रचार प्रसार होता जाता है। वैसे ही दुविधा (दुख) सुविधा में बदलती चली जाती है। कर्म के बीज हमारी कामनाएं हैं, जैसे जैसे ये समाप्त होती हैं तो व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त होता है।  ध्यान की गहराई में उतरने से व्यक्ति को आत्मज्ञान होता है तथा  यह अनुभूति होती है कि प्रकृति माया से परे परमात्मा है। माया के पर्दे के कारण ही आत्मा परमात्मा से विमुख होती है। क्रमश:

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
casinolevant giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti mobil giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betpark giriş
jojobet giriş
grandpashabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti mobil giriş
betgaranti güncel giriş
onwin giriş
Kolaybet Giriş
casinolevant
ngsbahis giriş
artemisbet güncel
grandpashabet giriş
jojobet giriş
bettilt giriş
sahabet
sahabet
betgaranti giriş
betgaranti giriş
kolaybet giriş
betgaranti giriş
betgaranti
bettilt giriş
betgaranti giriş
betgaranti
betgaranti giriş