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आज का चिंतन

“पूजा क्या, किसकी, कैसे व क्यों करें?”

ओ३म्

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मनुष्य जानता है कि वह ज्ञान एवं शारीरिक बल की दृष्टि से अपूर्ण वा अल्प सामर्थ्य वाला है। उसे अपने कार्यों को पूरा करने में दूसरे मनुष्यों की सहायता लेनी पड़ती है। कुछ काम ऐसे भी होते हैं, जहां मनुष्यों की सहायता से काम नहीं चलता क्योंकि मनुष्य वह कार्य नहीं कर सकते जिसकी हमें अपेक्षा होती है। ऐसा देखा गया है कि कई बार कुछ विवाहित दम्पत्तियों की सन्तान नहीं होती। चिकित्सा से भी उन्हें लाभ नहीं होता। उन्हें कहा जाता है कि परमात्मा की विशेष पूजा या कोई यज्ञ हवन आदि कराया जाये तो सम्भव है कि दम्पत्ति का मनोरथ पूरा हो जाये। ऐसा भी देखने को मिला है कि कई बार कुछ चिकित्सा एवं ईश्वर की उपासना व यज्ञ आदि कार्यों से मनुष्य के मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं। अतः मनुष्यों से भिन्न ईश्वरीय वा दैवीय शक्ति की पूजा व उसकी स्तुति, प्रार्थना, उपासना, यज्ञ-अग्निहोत्र व चिकित्सा आदि कुछ अन्य उपायों से कई कार्यों की सिद्धि होती है जो अन्यथा नहीं होती। हमें पूजा का वास्तविक स्वरूप समझना चाहिये तभी हमारी पूजा ठीक प्रकार से हो सकेगी और उससे हमें अपेक्षित लाभ भी होगा। पूजा का अर्थ किसी की सेवा व सत्कार करना होता है। सेवा व सत्कार चेतन मनुष्य का व पशु-पक्षी आदि प्राणियों का ही किया जा सकता है। मनुष्यों में हम सबसे अधिक अपने माता-पिता के ऋणी होते हैं। उसके बाद हमारे ऊपर सबसे अधिक उपकार व लाभ हमारे आचार्यों व गुरुजनों का होता है। इनकी हमें सेवा करनी चाहिये और सत्कार के अन्तर्गत उनकी आज्ञा का पालन, उनको अन्न, जल, आवास, वस्त्र, उनके प्रति मधुर व्यवहार, धन व मान-सम्मान से उन्हें सन्तुष्ट रखना चाहिये। माता, पिता व आचार्यों के अतिरिक्त हमारे परिवार के वृद्धजन व समाज के सच्चे उपकारक व सुधारक लोग भी हमारी सेवा व सत्कार के अधिकारी होते हैं। इनकी भी हमें सेवा रूपी पूजा करनी चाहिये। पशुओं में गाय, बैल, भैंस, बकरी, भेड़ आदि होते हैं जिनसे हमें दैनन्दिन जीवन में लाभ मिलता है। उनके प्रति भी हमारा आदर, प्रेम व सम्मान का भाव होना चाहिये और उनके जीवन को सुखद बनाने के लिए हमें उन्हें भोजन व आश्रय आदि देकर योगदान करना चाहिये। इससे हम इनके ऋण से उऋण होते हैं।

माता, पिता, आचार्य, परिवार व समाज के वृद्धजन तथा सभी प्राणी चेतन देवता हैं। इसी प्रकार से पृथिवी, सूर्य, चन्द्र, अग्नि, वायु, जल, आकाश आदि जड़ देवता हैं। जड़ देवता का अर्थ है कि इनसे हमें अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। हमारा यह शरीर भी इन्हीं के सहयोग से बना हुआ है और इनके सहयोग से ही जीवित रहता व चलता है। अतः इनके हम पर अनेक उपकार होने से यह भी हमारे सत्करणीय, पूजनीय वा सेवनीय देवता हैं। सूर्य की पूजा का अर्थ हैं कि हम सूर्य के गुण, कर्म व स्वभाव को जानें और उससे स्वयं लाभान्वित होने के साथ अन्यों को भी लाभान्वित करें। इसी प्रकार से अन्य सभी जड़ देवताओं के प्रति भी हमारा कर्तव्य है। यह जड़ देवता हमारी प्रार्थना के पात्र नहीं हैं। यदि हम इनसे किसी प्रकार की प्रार्थना अथवा इनकी स्तुति एवं उपासना करेंगे भी तो अचेतन होने से इनको उसका ज्ञान नहीं होगा। जब ज्ञान ही नहीं होगा तो वह हमें लाभ कैसे पहुंचायेंगे। इसके लिए तो हमें उनके गुणों आदि का अध्ययन कर उनसे एक वैज्ञानिक व ज्ञानी मनुष्य के समान उपयोग लेना होगा। यही इन जड़ देवताओं व पदार्थों की पूजा होती है। इसके बाद हमें यह विचार आता है कि हमारा यह संसार कैसे बना है? कौन इसे चला रहा है, क्या यह हमेशा इसी प्रकार से चलता रहेगा या कभी नाश को भी प्राप्त होगा? आदि प्रश्न ऐसे हैं कि जिन पर हम यदि विचार करें तो हमें इनके सत्य व यथार्थ उत्तर सूझते नहीं हैं। इनके सत्य उत्तर हमें वेदों, उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण ग्रन्थ, मनुस्मृति सहित कुछ कुछ बाल्मीकि रामायण और महाभारत आदि ग्रन्थों में मिलते हैं। वेदों का अध्ययन करने व उनका ज्ञान हो जाने पर ईश्वर, जीवात्मा व प्रकृति विषयक हमें पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो जाता है। वेदों का अध्ययन करने पर यह भी विदित होता है कि वेद मनुष्यकृत वा पौरुषेय ज्ञान नहीं है। यह अपौरूषेय वा ईश्वरीय ज्ञान है। वेदों के अध्ययन से यह भी ज्ञात होता है कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, निराकार, सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान, सृष्टिकर्ता, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य व पवित्र है। इन व ऐसे अनन्त गुणों के कारण ही हम सब मनुष्यों का पूजा व सत्कार के योग्य सहित उपासनीय एकमात्र ईश्वर है।

हम वेदों में ईश्वर की आज्ञा को जानकर उसका पालन करें, उसकी स्तुति, प्रार्थना व उपासना द्वारा उसको प्रसन्न व सन्तुष्ट रक्खें, यही हमारा कर्तव्य है। इसके साथ ही हम स्वयं को पक्षपातरहित व सबसे प्रीतिपूर्वक, धर्मानुसार व यथायोग्य व्यवहार करने वाला बनायें। सत्य के ग्रहण करने और असत्य के त्याग में सर्वदा उद्यत रहें। वेद के पढ़ने और पढ़ाने तथा दूसरों को वेद सुनाने व दूसरे विद्वानों से स्वयं सुनने में भी सदैव तत्पर रहें और इसे अपना परम धर्म मानें। ऐसी अनेक बातें हैं जिनको मानना व उन पर आचरण करना ही ईश्वर की स्तुति व उसकी उपासना कहलाती है। हमारे समस्त पूर्वज ऋषि, महात्मा, महापुरुष, ज्ञानी व विद्वान ऐसा ही करते थे। उन्हीं का अनुसरण हमें भी करना है। ईश्वर की पूजा वा उपासना की विधि योग दर्शन में वर्णित है। ईश्वर का विचार, चिन्तन, ध्यान व ईश्वर का गुण कीर्तन करते हुए उसमें खो जाना वा डूब जाना, यही ईश्वर की यथार्थ उपासना कहलाती है। महर्षि दयानन्द सरस्वती जी ने भी उपासना के लिए सन्ध्या वा पंचमहायज्ञ विधि की एक लघु पुस्तक लिखी है जिसमें सन्ध्या व अग्निहोत्र सहित अन्य प्रमुख कर्तव्यों का उल्लेख व उनका वर्णन है। साथ ही उन कर्मों को करने की विधि भी पुस्तक में दी गई है। ऐसा करके हम ईश्वर की सत्य व यथार्थ पूजा वा उपासना कर सकते हैं और इससे धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं। ऐसा करना ही वेद, शास्त्र और ऋषि परम्परा के अनुकूल है और यही हम मनुष्यों के लिए उपादेय है। इससे हमारे सभी सत्य मनोरथ पूर्ण होते हैं। हमने जो प्रश्न उठायें है यथा हमारा यह संसार कैसे बना? कौन इसे चला रहा है, क्या यह हमेशा इसी प्रकार से चलता रहेगा या कभी नाश को भी प्राप्त होगा, इनके उत्तर हैं कि सर्वशक्तिमान व सर्वव्यापक ईश्वर ने पूर्व कल्प के अनुसार मूल त्रिगुणात्मक प्रकृति से इस संसार की रचना की है जिसे बने हुए 1.96 अरब वर्ष बीत चुके हैं। इस समस्त ब्रह्माण्ड को सर्वव्यापक ईश्वर ने धारण किया हुआ है और वही इसका पालन कर रहा है। उसी से यह संसार व हम सब प्राणी रक्षित हैं। यह संसार हमेशा ऐसा ही नहीं चलेगा। एक ब्राह्म दिन पूरा होने अर्थात् ब्राह्म दिन जो कि 4.32 अरब वर्षों का होता है, इसके पूरा होने पर यह संसार अपने कारण मूल प्रकृति में विलीन हो जायेगा। प्रलय की अवधि एक ब्राह्म रात्रि पूर्ण होने पर पुनः ईश्वर नई सृष्टि की रचना करेंगे जिसमें हमारे कर्मों व प्रारब्ध के अनुसार जन्म होंगे।

पांच हजार वर्ष पूर्व हुए महाभारत युद्ध के बाद देश अज्ञान के अन्धकार में लुप्त हो गया। वैदिक ज्ञान आंशिक रूप से विलुप्त हो गया और उसके स्थान पर उसका विकृत स्वरूप प्रचलित होना आरम्भ हुआ जो बाद में पाषाण मूर्तिपूजा, मृतक श्राद्ध, फलित ज्योतिष, गंगा आदि नदियों में स्नान से पाप क्षमा मानना व उसे ही मुक्ति का साधन मानना, सामाजिक विषमता व असमानता, समाज में पक्षपात, भेदभाव, अन्याय व शोषण आदि प्रचलित हो गये। इसमें मूर्तिपूजा व फलित ज्योतिष ने देश व समाज के हितों सहित वैदिक धर्म व संस्कृति को विकृत व नष्ट करने का कार्य किया है। ईश्वर सच्चिदानन्द, निराकार, सर्वव्यापक व सर्वज्ञ आदि गुणों वाला है। यह गुण किसी भी मूर्ति या आकृति में किंचित भी नहीं होते है। अतः पाषाण व धातु की मूर्ति बनाकर उससे कुछ मांगना व ईश्वर मानकर उसकी पूजा व उपासना करना सम्पन्न नहीं होता। ईश्वर चेतन है, मूर्ति जड़ है। यह दोनों परस्पर विरोधी गुण हैं। ईश्वर सर्वशक्तिमान है तो मूर्ति शक्ति रहित है। ईश्वर सर्वज्ञानमय वा सर्वज्ञ है तथा मूर्ति ज्ञान से सर्वथा शून्य है। ईश्वर अजर, अमर व निर्विकार है तथा मूर्ति अग्नि से नष्ट होने वाली, इसका आदि व अन्त दोनों है तथा इसमें समय के साथ विकार अर्थात् टूट फूट व चोरी आदि होनी सम्भव रहती है। अतः ईश्वर की पूजा व उपासना का स्थान मूर्ति की पूजा नहीं ले सकती। ईश्वर की उपासना तो ध्यान व चिन्तन, वेदों व वैदिक ग्रन्थों के स्वाध्याय, समाधि लगाना व ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना आदि करके ही हो सकती है। अतः अपना कल्याण चाहने वाले सभी मनुष्यों को वेद विरुद्ध मूर्तिपूजा व फलित ज्योतिष आदि सभी अवैदिक कृत्यों का तत्काल त्याग कर देना चाहिये और वैदिक योग की रीति से ईश्वर की उपासना, यज्ञ व अग्निहोत्र सहित माता-पिता-आचार्य-वृद्धजनों की पूजा वा सत्कार एवं सभी प्राणियों को सेवा, उन्हें भोजन आदि प्रदान करना करके करनी चाहिये। ऐसा करके ही हम ईश्वर की आज्ञा का पालन कर स्वस्थ, सुखी, आनन्दित रह सकते हैं और धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं। ईश्वर, जीवात्मा तथा प्रकृति के ज्ञान सहित पूजा वा ईश्वर की स्तुति-प्रार्थना-उपासना आदि विविध विषयों के ज्ञान के लिए मनुष्यों को ऋषि दयानन्द की अमर रचना सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ का स्वाध्याय करना चाहिये। इससे वह सभी वा अधिकांश सांसारिक व आध्यात्मिक विषयों को जान सकेंगे। ओ३म् शम्।

-मनमोहन कुमार आर्य

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