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धर्म-अध्यात्म

ओ३म् “मनुष्य वेदविहित कर्तव्यों का पालन कर ही सच्चा मनुष्य बनता है”

-मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।
हम मनुष्य कहलाते हैं। मनुष्य कहलाने का कारण परमात्मा द्वारा हमें बुद्धि व ज्ञान का दिया जाना तथा हमें उस ज्ञान को प्राप्त होकर मननपूर्वक अपने कर्तव्यों का निर्धारणकर उन्हें करना होता है। सभी मनुष्य ऐसा नहीं करते। देश व विश्व की अधिकांश जनता को यही नहीं पता कि मनुष्य, मनुष्य क्यों कहलाता है और उसके अनिवार्य कर्तव्य क्या हैं? हमारा देश आदि काल से ऋषि, मुनियों व विद्वानों का देश रहा है। हमारे ही देश आर्यावर्त में परमात्मा ने सृष्टि के आदिकाल में चार ऋषियों को चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद का ज्ञान दिया था। यह चार वेद सब सत्य ज्ञान वा विद्याओं की पुस्तकें हैं। वेदों का अध्ययन करने से ही हमें मनुष्य क्या होता है और हमारे कर्तव्य क्या हैं? इन सब बातों का ज्ञान होता है। इसके साथ ही हमें इस सृष्टि के प्रायः सभी रहस्यों सहित तीन अनादि व नित्य पदार्थों ईश्वर, जीव व प्रकृति का भी ज्ञान होता है। मनुष्य के ईश्वर, संसार व अपने प्रति क्या कर्तव्य हैं, यह सब वेदों से जाना जाता है। हम क्या हैं, कौन हैं, हमारा उद्देश्य व लक्ष्य क्या प्राप्त करना है, यह सब विषय भी वेद एवं ऋषियों के बनाये ग्रन्थों के अध्ययन से ही विदित होते हैं। सृष्टि के आदि काल से हमारा देश ज्ञान व विज्ञान से सम्पन्न रहा है। हमारे देश में वेदों के आधार पर शासन व्यवस्थायें चलती थी, लोग सुखी रहते थे, शारीरिक-आत्मिक-सामाजिक उन्नति करते थे और त्याग से युक्त परोपकारमय एवं परमार्थ का जीवन व्यतीत करते थे। आज भी वेद एवं वैदिक जीवन ही सार्थक एवं प्रासंगिक हैं। आज संसार में ऐसी शक्तियां भी हैं जो मनुष्य व देशों को वेद के सत्य मार्ग के विरुद्ध ले जाने के लिये नैतिक व अनैतिक तरीकों को अपनाकर अपने उद्देश्यों को पूरा करने में लगी हैं। हम ऐसी प्रवृत्तियों को जानकर भी एकमत व संगठित न होने के कारण कुछ हितकार कार्य कर नहीं पाते। व्यापक रूप में देखा जाये तो पूरा विश्व इस समय अशान्त व असुरक्षा की भावना से ग्रस्त है। ऐसा होना कुछ मनुष्यों, संगठनों व देशों का सत्य से दूर होना तथा अपनी राजनीतिक व स्वार्थपूर्ण अपेक्षाओं को पूरा करने के कारण से हो रहा है। हम ईश्वर प्रदत्त वेदज्ञान से दूर हो गये हैं, यह भी मनुष्य, देश व विश्व की समस्याओं के मूल में दृष्टिगोचर होता है। ऐसी अवस्था में हमें वेदों का अध्ययन कर समस्याओं को जानना व समझना होगा और वेद एवं प्राचीन ऋषि प्रणीत उपलब्ध साहित्य से राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय समस्याओं का शान्तिपूर्वक व सम्भव हल खोजना होगा।

मनुष्य, मनुष्य क्यों कहलाता है व उसके क्या कर्तव्य हैं, इस पर ऋषि दयानन्द की सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ में लिखी पंक्तियों से प्रकाश पड़ता है। सत्यार्थप्रकाश के परिशिष्ट ‘स्वमन्तव्यामन्तव्यप्रकाश’ में वह लिखते हैं ‘मनुष्य उसी को कहना कि जो मननशील होकर स्वात्मवत् अन्यों के सुख-दुःख और हानि-लाभ को समझे। अन्यायकारी बलवान् से भी न डरे और धर्मात्मा निर्बल से भी डरता रहे। इतना ही नहीं किन्तु अपने सर्व सामथ्र्य से धर्मात्माओं कि चाहे वह महा अनाथ, निर्बल और गुणरहित क्यों न हों, उन की रक्षा, उन्नति, प्रिय आचरण और अधर्मी चाहे चक्रवर्ती सनाथ, महाबलवान् और गुणवान् भी हो तथापि उस का नाश, अवनति और अप्रियाचरण सदा किया करे अर्थात् जहां तक हो सके वहां तक अन्यायकारियों के बल की हानि और न्यायकारियों के बल की उन्नति सर्वथा किया करे। इस काम में चाहे उस (मनुष्य नामी प्राणी) को कितना ही दारुण दुःख प्राप्त हो, चाहे प्राण भी चले ही जावें परन्तु इस मनुष्यपनरूप धर्म से पृथक् कभी न होवे।’ ऋषि दयानन्द की इन पंक्तियों में मनुष्य के स्वरूप व कर्तव्यों पर अच्छा प्रभाव पड़ता है। सभी मनुष्यों को ऋषि के इन शब्दों को हृदयगंम कर लेना चाहिये। ऐसे शब्द अन्यत्र मिलना असम्भव है। यह वेदों के आधार पर की गई मनुष्य की परिभाषा है। इस परिभाषा के अनुसार मनुष्यों का निर्माण ही देश की शासन, शिक्षा व्यवस्था व नीतियों का लक्ष्य होना चाहिये। मनुष्यों को मत-मतान्तरों में बांटकर व उन्हें कुछ भी मानने की छूट देकर, चाहे वह सत्य हों व असत्य, इससे देश के लिये अच्छे परिणाम सामने नहीं आ सकते। ऋषि दयानन्द के अनुसार सत्य को ग्रहण करना और असत्य को छोड़ना सब मनुष्यों का कर्तव्य है। इसके साथ ही अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करना कराना भी देश के शासन व सरकार का कर्तव्य है। जिस दिन इस दिशा में निष्ठा से कार्य किया जायेगा और इसे प्राप्त किया जायेगा, उस दिन देश से सभी वाद व मत-मतान्तर एक होकर सत्य मत वेद मत के अन्तर्गत आ जायेंगे, ऐसा हम वेद व ऋषियों के ग्रन्थों को पढ़कर अनुमान करते हैं। यदि ऐसा नहीं होगा तो मनुष्य समाज व मनुष्य जाति के सम्मुख हिंसा, द्वेष आदि व वैध व अवैध तरीकों से लोगों के मत-परिवर्तन की समस्यायें बनी रहेंगी। 

मनुष्यों के कर्तव्यों पर विचार करते हैं तो यह तथ्य समाने आता है कि हमारे प्राचीन ऋषियों ने वेदों के आधार पर मनुष्य के पांच प्रमुख कर्तव्यों का निर्धारण किया हुआ है। सबको इन कर्तव्यों का पालन करना अनिवार्य होना चाहिये। यह पांच कर्तव्य पंचमहायज्ञ कहलाते हैं। ये हैं 1- ब्रह्मयज्ञ वा सन्ध्या, 2- देवयज्ञ अग्निहोत्र, 3- पितृयज्ञ, 4- अतिथि यज्ञ एवं 5- बलिवैश्वदेवयज्ञ। सन्ध्या में मनुष्य ईश्वर के सत्यस्वरूप एवं उसके सत्य गुणों का ध्यान करता है। ईश्वर के गुणों के अनुसार उसकी स्तुति करता है तथा अपने लिये मांगने योग्य बुद्धि, बल, सद्कर्मों को करने की प्रेरणा, साहस तथा समाज व देश हित की प्रार्थनायें करता है। सन्ध्या ही ईश्वर की उपासना होती है। ईश्वर का ध्यान चिन्तन करने से मनुष्य की आत्मा के दोष, अभद्रतायें तथा दुर्गुण आदि दूर होते हैं तथा ईश्वर के श्रेष्ठतम गुणों के सदृश मनुष्य का जीवन बनाने में सहायता मिलती है। ईश्वर की उपासना से आत्मा का बल इतना बढ़ता है कि पर्वत के समान दुःख यथा मृत्यु आदि प्राप्त होने पर भी मनुष्य घबराता नहीं है। ईश्वर का ध्यान व चिन्तन करने से मनुष्य के अज्ञान का निरन्तर नाश होकर ज्ञान का प्रकाश होता जाता है। वह अधर्म से दूर होता तथा धर्म कार्यों को करने में प्रवृत्त व उत्साहित होता है। मनुष्य यदि प्रयत्न करे तो वह सन्ध्या व वेदों के स्वाध्याय से राम, कृष्ण, दयानन्द, चाणक्य आदि महान पुरुषों के गुणों से युक्त हो सकता है। ऐसा नहीं है कि आज ऐसे गुण वाले नही हैं? हमारी सेना के कर्तव्य परायण लोग अपना बलिदान देते रहते हैं। देश के लिये बलिदान भी श्रेष्ठतम एवं महानतम कर्म है। देश के लिए बलिदान देने वाले महान-पुरुष ही होते हैं। सभी मनुष्यों को ईश्वर के ध्यान व सन्ध्या द्वारा अपने मन, बुद्धि व आत्मा को उन्नत करना चाहिये और सत्कर्मों का सेवन कर अपने जीवन को उन्नत व महान बनाना चाहिये। इसी दृष्टि से सन्ध्या का विधान हमारे ऋषियों ने किया है। सन्ध्या करने से हम ईश्वर के ऋण से एक सीमा तक उऋण भी होते हैं। जो मनुष्य सन्ध्या नहीं करते, ऋषि दयानन्द के अनुसार वह कृतघ्न होते हैं। कृतघ्नता मनुष्य का सबसे बड़ा पाप कर्म होता है। जो ऐसा करते हैं वह अपना परजन्म बिगाड़ते हैं चाहें वह किसी भी मत व विचारधारा को मान लें, उनका कल्याण नहीं हो सकता। इसका कारण यह है कि इस संसार में केवल एक ही ईश्वर है जो सत्य गुणों से युक्त है। संसार की सभी आत्माओं व मनुष्यों का वही न्यायकर्ता है। उस सर्वव्यापक, सर्वान्तर्यामी, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी परमात्मा के न्याय से कोई मनुष्य, आत्मा व प्राणी बच नहीं सकता और न कोई किसी को बचा सकता है अर्थात् जीवात्मा और परमात्मा के बीच की न्याय प्रक्रिया में कोई तीसरा आ ही नहीं सकता। सत्य के विपरीत किसी के कुछ मानने या न मानने से ईश्वर की व्यवस्था में कुछ प्रभाव नहीं पड़ता है। 

मनुष्य का दूसरा प्रमुख कर्तव्य है देवयज्ञ करना। देवयज्ञ में वेदमन्त्रों से ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना व उपासना भी होती है तथा मन्त्रों में निहित अग्निहोत्र यज्ञ के लाभ भी विदित होते हैं। अग्निहोत्र से वायु एवं वर्षा जल की शुद्धि तथा अन्न, वनस्पतियों एवं ओषधियों की शुद्धता व पवित्रता होती है जिससे मनुष्यों को सुख व स्वास्थ्य का लाभ प्राप्त होता है। यही कारण था कि वैदिक कालीन प्राचीन भारत साधारण व महाव्याधियों आदि से रहित था। लोग स्वस्थ एवं दीर्घायु होते थे। शुद्ध सात्विक भोजन व आयुर्वेद का प्रचार था। लोग वेदानुकूल तथा प्रकृति के नियमों का पालन करते हुए जीवन व्यतीत करते थे जिसकी आज के समय में भी अत्यन्त आवश्यकता है। 

मनुष्य का तीसरा कर्तव्य है अपने माता-पिता तथा परिवार के वृद्धों की सेवा व शुश्रुषा करना, उन्हें अन्न, वस्त्र, ओषधि देना तथा उनसे मधुर व्यवहार करना जिससे वह सुखी व सन्तुष्ट रहें। ऐसा करने पर परमात्मा इस कर्तव्य के पालक को अपनी ओर से सुख व आनन्द प्रदान करते हैं। यही पितृयज्ञ कहलाता है। चैथा महायज्ञ अतिथियज्ञ है। देश व समाज में लोकोपकार की भावना से वेदज्ञान का प्रसार करते हुए लोगों की अविद्या व समस्याओं का समाधान करने वाले इस यज्ञ के विद्वान अतिथियों का अन्न, जल, आश्रय, धन, वस्त्र व उनकी आवश्यकता की वस्तुओं की पूर्ति कर सेवा करनी होती है। इससे समाज से अविद्या का अन्धकार दूर होने सहित मनुष्य को अपनी समस्याओं का समाधान भी प्राप्त होता है। विद्वान अतिथियों की सेवा करने से भी परमात्मा प्रसन्न होते हैं और अतिथियज्ञ के कर्ता को सुख व कल्याण की प्राप्ति होती है। मनुष्य का पांचवा कर्तव्य पशु, पक्षियों व कीट-पतंगों के प्रति दया व प्रेम की भावना को रखना व उनके आश्रय व भोजन आदि मे सहायक होना होता है। पशुओं को चारा और पक्षियों को दाना व अन्न खिलाना बलिवैश्वदेवयज्ञ में आता है। ऐसा करने का एक लाभ यह होता है कि जब हम अपने कर्मभोग से कभी पशु व पक्षी बनेंगे तो हमें भी सामाजिक व्यवस्था से अन्न आदि पदार्थ मिल सकेंगे और हम पर कोई मनुष्य हिंसा आदि कुकृत्य नही करेगा। इस प्रसंग में यह लिखना भी समीचीन है कि मांसाहार मनुष्य धर्म व कर्तव्य के विरुद्ध एवं ईश्वर से दण्डनीय है। पशुओं व पक्षियों में हमारे ही समान आत्मायें हैं। मांसाहार के लिये जो हिंसा की जाती है उससे पशुओं को दुःख होता है जो कि अधर्म व पाप है। हमारे समय-समय पर जो पारिवारिक-जन व मित्र आदि दिंवगत होते रहते हैं, सम्भव है वह भी इन पशु व पक्षी योनियों में विद्यमान हों। ऐसी स्थिति में मांसाहार व हिंसा करने से हम अपने पूर्व प्रियजनों की हिंसा के अपराधी बन जाते हैं। अतः पशु व पक्षियों के प्रति हमें दया करनी चाहिये तथा इनके भोजन आदि में सहायक होना चाहिये। सभी मनुष्यों को मांसाहार का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये, यही धर्म एवं मनुष्य का कर्तव्य है। 

सभी मनुष्यों को यम व नियमों का पूर्णतः पालन भी करना चाहिये। यम व नियमों का पालन भी मनुष्यों का आवश्यक कर्तव्य है। पांच यम हैं अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह। इनका सबको पालन करना चाहिये। पांच नियम हैं शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय एवं ईश्वर प्रणिधान। इनका भी पालन करने से मनुष्य ज्ञानवान तथा सदाचारी बनता है और ईश्वर का प्रिय बनकर धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होता है। इन यम व नियमों के विपरीत आचरण करना मनुष्यों के लिए वर्जित है। कर्तव्य पालन ही धर्म पालन का पर्याय है। हमें यम व नियमों सहित पंच महायज्ञों का पालन कर सच्चा मनुष्य बनना है। ईश्वर कृपा करें कि जिससे हमारे देश के लोग वेदों के स्वाध्याय तथा वेदों में निहित सत्कर्मों के विधान को करने वाले बनें। ओ३म् शम्।  

-मनमोहन कुमार आर्य
पताः 196 चुक्खूवाला-2
देहरादून-248001
फोनः09412985121

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