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*आत्मनिर्भर भारत का रोडमैप एवं सरकार की भूमिका* 

जरुरत :—-सरकार एक ऐसी नई नीति लेकर आए जिसकी शुरुआत गांव से हो . सरकार अपनी हिस्सेदारी के साथ  गांव सत्तर पर क्लस्टर बना कर रूरल  इंडस्ट्री स्थापित करे  और खुद  गुणवत्ता पर कंट्रोल कर के मार्केटिंग की जिम्मेदारी ले 

भारत की पहली और सबसे विकट समस्या यह है की   एक बहुत बड़ी आबादी(लगभग 60 %) का केवल कृषि पर निर्भर होना है पर कृषि आज एक घाटे का सौदा बन कर रह गई है कुछ कारणों से जैसे   कृत्रिम कृषि तकनीकों को ना अपनाना ,प्राकृतिक  आपदा जैसे बाढ़,सूखा ,उचित दाम ना मिलना ,और कृषि उत्पादों का निर्यात ना होना आदि आदि फलसवरूप बहुत बड़ी संख्या मे लोग कृषि छोड़ कर पेट पालने के लिए शहरों की तरफ पलायन कर रहे है जिसका प्रत्यक्ष रूप आप ने कोरोना की त्रासदी के दौरान  भारत के हर शहर में देखा  ये  सभी मजदूर पहले किसान हुआ करते थे जो अपनी खेती किसानी से विमुक्त हो कर मजदूर से बने है और समय की मार ने इनको मजबूर भी बना दिया है  क्यों किसान मजदूर बन रहे है यह बहुत बड़ा सवाल है इसका तोड़ निकालना होगा .वैसे तो मोदी सरकार 1 .0  का  चुनाव घोषणा पत्र मे यह दावा किया गया था की भारत में नदियों को जोड़ा जाएगा ताकि बाढ़ और सूखे से किसान की फसल को बचाया जा सके परन्तु  अब तक कितनी नदिया जुडी आपके सामने है वही बाढ़ वही सूखा  हर दिन हर महीने हर साल      दूसरी  और  योजना प्रधानमंत्री सिचाई योजना का हाल तो उस से भी बुरा है जो ज़मीन पर कही है ही नहीं  जो सिर्फ प्रधानमंत्री के सचिव और सलाहकारों  के लैपटॉप में बहुत ही सुन्दर ढंग से दर्शाए गई है जिसमे किसान को ड्रिप तकनीक से फसल में पानी देते हुए दिखाया गया है और लहलाते खेतो में सूंदर भविष्य के सपने लेती उसकी पत्नी और बच्चों का चित्रण किया गया है  सवाल फिर वही की आखिर क्यों और कब तक योजनाए पर योजनाए और नतीजा ज़ीरो

यह स्थिति लगभग वैसी ही है जैसे 1970 के दशक मे चीन की हुआ करती थी भारत और चीन दोनों लगभग समान  और विश्व में सर्वाधिक आबादी वाले देश है इस दृष्टि से दोनों देशो की   समस्या में समानता है तो समाधान  भी  चीन की तर्ज पर  ही  उद्योग  नीति बना कर  निकल सकता है मेरा यहाँ चीन जैसे राजनैतिक वयवस्था से कतई नहीं है मैं  सिर्फ उनकी   सफल औद्योगीकरण के अनुशरण पर बल दे रहा हु      तो सरकार एक ऐसी नई नीति लेकर आए जिसकी शुरुआत  गांव से हो जैसा चीन ने जियांग जैमिन के नेत्र्तव में 1978 में किया था  . सरकार अपनी हिस्सेदारी के साथ  गांव सत्तर पर क्लस्टर बना कर रूरल  इंडस्ट्री स्थापित करे  और खुद  गुणवत्ता पर कंट्रोल कर के मार्केटिंग की जिम्मेदारी ले   मतलब  पूर्ण निजीकरण की बजाए दोहरे ट्रैक प्रणाली (सरकारी /निजी ) लागु कर के उद्योग के लिए ढांचा भी सरकार खड़ा करे और तैयार  माल  सरकार सांझेदार के तौर  बड़े घरेलू उद्योग और विश्व सत्र निर्यात करने की योजना बनाए .नहीं तो रूरल इंडस्ट्री के नाम पे लोग लोन लेते रहेंगे और कर्जदार बन कर आत्म हत्या करते रहेंगे
चीन ने तो उस दौर में मशीने खरीदी थी पर आज भारत सक्षम है मशीनो का निर्माण करने में तो करोडो डॉलर आयात पर खरच ना करे बल्कि  मशीन  कलपुर्जे निर्यात भी करे
बड़े उद्योग तथा  सुचना एवं सॉफ्टवेयर क्षेत्र के लिए भारत मे कई सैकड़ो की संख्या मे  SEZ    स्पेशल इकनॉमिक जोन घोषित  किये  हुए है तो  उधोगो के लिए जमीन की कोई समस्या नहीं है इस लिए आप चीन से पलायन करने वाली कम्पनीओ का आसानी से भारत ला सकते है जिसके बारे मे भाषण बाज़ी तो बहुत हों रही है पर ज़मीन   पर काम सनतोषजनक नहीं हों रहा
 
दूसरी बड़ी चुनौती स्किल मैनपावर की है उस का समाधान क्षेत्रिए भाषाओ मे कम पढ़े लिखे लोगो क़ो कम अवधि के मैन्युफैक्चरिंग आधारित कोर्स करवा कर किया जा सकता है परन्तु डिप्लोमा और डिग्री धारी लोगो क़ो रिफ्रेशर कोर्स करवाना होगा हमारे कॉलेजो में प्रैक्टिकल तो करवाए  ही नहीं जाते बस सीधे मार्कशीटो में मार्क्स  लगा दिए जाते है।
परन्तु ऐसे नहीं जैसे स्किल इंडिया में हों रहा है जहा एनरोलमेंट करके मात्र सर्टिफिकेट बांटे जा रहे है  न कोई स्किल न कोई रोजगार  बस ” सरकारी पैसे हजम ड्रामा ख़तम ”
तीसरी जरुरत राजनैतिक इच्छा शक्ति एवं  उस का राज्यो के साथ रणनीतिक  और आर्थिक सहयोग जिसकी बहुत ही ज़्यादा जरुरत है  इस महामारी काल में भी केंद्र और राज्यों की सरकारों का  आपसी सामंजस की दुःख देने वाली तस्वीर आप देख चुके हों  राज्य अपनी पडोसी राज्यों की सीमाएं सील कर रहे थे बिना किसी सहमति के और कोई रेलगाड़िओ के लिए एक दूसरे पर आरोप लगा रहे थे आदि आदि।
चौथी  जरुरत स्मार्ट एवं प्रोफेशनल सोच वाले कार्यकारी अधिकारी जो अभी ना के बराबर है नहीं तो मुनाफे में चलने वाले नवरतन उद्योग जैसे भारत संचार निगम,एयर इंडिया,सेल  इंडिया ,राष्ट्रीय इस्पात  घाटे में नहीं होते ,
इस समस्या से निजात पाने के लिए उनके वेतन  भत्ते और पदोनति उसी उद्योग के मुनाफे और घाटे के साथ जोड़ा जाये आदि आदि।
तो अब समय है  देश हित में  यथार्थ से रूबरू होकर तथा राजनैतिक नफे नुकशान से ऊपर उठ कर एक ऐसा  औद्योगीक ढांचा खड़ा करने का जिसमे हर हाथ का काम मिले और  देश का हर नागरिक आत्मनिर्भर हों तभी आप का आत्मनिर्भर भारत का सपना साकार होगा।
 जय हिन्द जय भारत  

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