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हिन्दी को न्याय और भारत को स्वत्व की पहचान मिले

hindiनरेश भारती

हाल में भारत के गृह मंत्रालय ने सरकार और समाज के बीच दूरी को पाटने की क्षमता रखने वाले सामाजिक माध्यम या कथित ‘सोशल मीडिया’ के उपयोग और भारत की राजभाषा हिन्दी के महत्व को रेखांकित करते हुए शासकीय कामकाज में हिन्दी का उपयोग करने के निर्देश जारी किए थे। मेरे जैसे विदेशस्थ राष्ट्रवादी हिन्दी प्रेमियों को यह जान कर अच्छा लगा कि अंतत: भारत स्वत्व की पहचान की दिशा में सही कदम उठाने जा रहा है। लेकिन अफ़सोस कि तुरंत बाद ही देश में बढ़ते अन्ग्रेज़ी-भक्त राजनीतिकों ने एक बार फिर युग परिवर्तन के इस प्रथम पग का व्यापक देशहित में स्वागत न करके पुन: स्वार्थ राजनीति की भेंट करने का निर्णय किया। गृह मंत्रालय ने तुरंत यह कहते हुए स्पष्टीकरण दे दिया कि उसका यह निर्देश केवल केंद्र सरकार के कामकाज से सम्बन्ध रखता है। हिंदी को शासकीय कामकाज के लिए व्यावहारिक और योग्य स्थान ग्रहण करने का अवसर देने की सुध और युक्ति अब तक की किसी भी सरकार ने नहीं दिखाई। नई सरकार कितनी निर्भीकता और तत्परता के साथ हिन्दी को उसका सही स्थान दिलाने की चेष्ठा करती है यह देखना शेष है। यदि ऐसा नहीं होगा तो भारत आने वाले वर्षों में अपनी सही पहचान खो बैठेगा। भाषा को संस्कृति की संवाहिका माना जाता है। इसलिए भारत की मुख्य राष्ट्रीय संपर्क भाषा हिन्दी का तीव्र गति के साथ हो रहा, पराभव उसके स्वत्व की पहचान के लिए एक बहुत बड़ा ख़तरा बन सकता है।सरकारी स्तर पर वर्ष में एक दिन को हिन्दी दिवस का नाम देकर राजभाषा हिन्दी के प्रति अपने कर्तव्य की इतिश्री मान ली जाती है। कटुसत्य यह भी है कि हाल के वर्षों में हिन्दी के नाम पर  हिन्दी का जी भरकर शोषण किया गया है। विगत कांग्रेस सरकार ने वर्ष 2011 में सरकारी कामकाज में हिन्दी के स्थान पर आम बोलचाल की भाषा मानी जाने वाली बे सिर पैर की कथित रूप से आसान भाषा हिंगलिश के प्रयोग को मान्यता दे दी। यदि इसका उद्देश्य भाषा की सरलता से होता तो भी समझ में आता। लेकिन हिन्दी में अंग्रेज़ी को ठूंस कर, विकार उत्पन्न करके, एक बेहूदा खिचड़ीसम आधी अधूरी लिपि रहित जुबान को देवनागरी में लिखने की अनुमति सरकारी कर्मचारियों को देकर भ्रमपूर्ण स्थति को जन्म देना राष्ट्रीय स्वाभिमान को आघात पहुँचाने से कम नहीं माना जा सकता। वैसे भी देशी में विदेशी के अतिक्रमण से प्रदूषित मुख्य राष्ट्रीयभाषा का सर्वत्र जान बूझ कर किया जा रहा ध्वंस भविष्य के लिए घातक सिद्ध होगा। हिन्दी अपनी मौलिकता खोने लगी है। इसका व्याकरण बिगडऩे लगा है। पुलिंग का स्त्रीलिंग और स्त्रीलिंग का पुलिंग होने लगा है। हिन्दी वाक्य संरचना में अंग्रेज़ी का अवैध प्रभुत्व दिखने लगा है। अपने देश में ही हिन्दी पराई होती लगने लगी है। अंग्रेज़ी स्कूलों में पढ़े लिखे तरुण युवा हिन्दी में या तो बोलते ही नहीं, या फिर बोलते हैं तो एक दो शब्द गलत सलत बोल कर फिर से धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलने लगते हैं।

विदेशी दासता से मुक्त हो चुके भारत में उन्हीं पूर्व साम्राज्यवादी विदेशियों की भाषा अंग्रेज़ी की निर्लज्ज घुसपैठ के षड्यंत्र को गति मिल रही है। अब तो आलम यह है कि अच्छी भली हिन्दी लिख बोल सकने वाला व्यक्ति भी जब तक अंग्रेज़ी के कुछ शब्दों का प्रयोग नहीं कर लेता उसे अपनी ही क्षमता पर किंचित संदेह होने लगता है। वह हीनभावना से ग्रस्त हो उठता है। यही कारण है कि हिन्दी जाने अनजाने में अपने भारतीय मूलाधार को खोने लगी है। अंग्रेज़ी को सर झुका कर स्वीकारते और ‘हिंगलिश को प्यार से पुचकारते देश के लोग किसी दिन कहीं एक राष्ट्र भाषा विहीन भारत के गूंगे-बहरे न कहलाने लगें। लक्षण स्पष्ट हैं। जो हिंगलिश बोले वह तो शिक्षित और जो शुद्ध हिन्दी बोले उसकी तरफ हिकारत भरी नजरों से देखने वालों की अब कोई कमी नहीं। गर्व के साथ कह सकता हूं कि मुझ जैसे अनेक विदेशवासी भारतीयों ने दशकों से न तो अपनी मूल भारतीय भाषाओँ का विस्मरण किया है और न ही अपनी सांस्कृतिक भारतीयता को अभावग्रस्त होने दिया है। ब्रिटेन की राष्ट्रभाषा अंग्रेज़ी है और ब्रिटेन में रहने बसने वालों के लिए अंग्रेज़ी का ज्ञान होना अनिवार्य है। इस नियम का पूर्ण पालन करते हुए भी हमने अपनी मूल पुण्यभूमि भारत और उसकी परम राष्ट्रीय भाषा हिन्दी के साथ अपना सम्बन्ध कमज़ोर नहीं पडऩे दिया।

संविधान में पहला वाक्य इंडिया दैट इज़ भारत यह परिभाषा दिए जाने के बावजूद भारत अभी भी ‘इंडिया’ ही बना हुआ है। क्या अनन्त काल के लिए इसी परिभाषा के झीने आवरण में लिपटी दासता के साए तले अपने गौरवपूर्ण अतीत का उपहास होता रहेगा? अंग्रेजों का ‘कोलम्बो’ उनके जाते ही पुन: ‘श्रीलंका’ हो गया। दुनियां ने तुरंत उसे अपना लिया। जि़म्बाब्वे को अंग्रेजों ने ‘रोडेशिया’ नाम दे रखा था लेकिन दासता की बेडिय़ों को काट देने के पश्चात अफ्रीकियों ने पुन: उसके मूल नाम ‘जि़म्बाब्वे’ से ही संबोधित किए जाने का आग्रह किया। आज रोडेशिया को कोई नहीं पहचानता। लेकिन भारत सम्भवत: एकमात्र ऐसा देश है जो देश के नाम और राष्ट्रभाषा को लेकर अभी भी वैदेशिकता के समक्ष अपना सर झुकाए खड़ा है। इस आधे अधूरेपन में ही हम खुश हैं। देश की 85 प्रतिशत ग़ैर-अंग्रेज़ी भाषी लोग 15 प्रतिशत अंग्रेज़ीभाषियों के द्वारा तिरस्कृत हों यह कैसा लोकतंत्र है? देश की विधानपालिका और न्यायपालिका में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व कायम रहे, अंग्रेजों के ज़माने में बनाए गए कानून बाकायदा कायम रहें और भारतीय भाषा भाषियों को अंग्रेज़ी वालों से सहायता लेने की बाध्यता बरकरार रहे। यह कैसी स्वतन्त्रता है? हम स्वाधीन अवश्य हैं लेकिन प्रश्न यह है कि हम वस्तुत: कितने स्वतंत्र हैं?हिन्दी लेखकों में अनेक जो भलीभांति देवनागरी लिपि में लिखना जानते हैं हिन्दी के आवरण में अंग्रेज़ी को प्रोत्साहन दे रहे हैं। इसलिए क्योंकि वे समझते हैं जब आम बोलचाल की भाषा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व है तो बिना अंग्रेज़ी की सहायता के उनके लोकप्रिय होने की सम्भावना क्षीण हो गई है। वे ऐसे अंग्रेज़ी शब्दों को अपनी रचनाओं में पेल रहे हैं जिनके अर्थ तक समझने के लिए बहुधा अंग्रेज़ी-हिन्दी शब्दकोश का प्रयोग करना पड़े। जो मात्र हिन्दी ही जानता है उसके लिए शुद्ध हिन्दी में साहित्य के अध्ययन की गुंजायश दिन प्रति दिन कम होती जा रही है। हिन्दी में लिखी जाने वाली कथा, कविता, कहानियों और उपन्यासों के शीर्षक अंग्रेज़ी में रखने का बढ़ता प्रचलन और हिन्दी फिल्मों के नाम अंग्रेज़ी में रखने की प्रवृत्ति बल पकड़ रही है। भारत के जन मन पर राज करने वाले बौलीवुड के हिन्दी फिल्म अभिनेता और अभिनेत्रियाँ जो चित्रपट पर टपर टपर हिन्दी बोलते सुनाई दिखाई पड़ते हैं, धरातल पर उतरते ही छोटे पर्दे पर दिए जाने वाले अपने साक्षात्कारों में  हिन्दी का एक शब्द भी सहजता के साथ नहीं बोल पाते। लेकिन हिन्दी के नाम पर और हिन्दी फि़ल्में देखने के शौकीन करोड़ों हिंदीभाषियों से कई कई हजार करोड़ की कमाई अवश्य करते है। यह हिन्दी और हिन्दीवालों का शोषण नहीं तो फिर क्या है?

देश में सरेआम हो रहा है हिन्दी के साथ अन्याय। बुद्धिजीवियों के द्वारा जारी है हिन्दी का तिरस्कार और विदेशी भाषा अंग्रेज़ी के साथ बढ़ रहा है लाड़-प्यार। हिन्दी के समाचारपत्रों में देखता पढ़ता हूँ और देवनागरी में लिखी समाचार टिप्णियों में अंग्रेज़ी शब्द प्रयोग की भरमार   पाता हूँ। मेरी दृष्टि में यह हिन्दी के प्रति किये जा रहे द्रोह की पराकाष्ठा है। मैं हिन्दी के अनेक स्वयम्भू विद्वानों के इस तर्क को स्वीकार करने योग्य नहीं मानता कि हिन्दी में अंग्रेज़ी शब्दप्रयोग से हिन्दी समृद्ध होती है। न ही मैं इस भ्रामक और आधारहीन तर्क को ही महत्व देता हूँ कि अंग्रेज़ी की अंतर्राष्ट्रीय मान्यता उन्हें इसका दास होने को बाध्य करती है। यदि ऐसा होता तो यूरोप में अंग्रेज़ी का ही एकछत्र अधिकार होता। फ्रेंच, जर्मन, इतालवी और अन्य यूरोपीय भाषाभाषी अंग्रेज़ी की चिरौरी करते नजऱ आते। लेकिन ऐसा नहीं है। अपनी भाषा का अक्षत गौरव बनाए रखते हुए प्रत्येक स्वाभिमानी राष्ट्र अपनी वैश्विक भूमिका को वर्धमान करने को सक्षम है। विदेशी भाषा का मात्र यथावश्यकता ही अध्ययन और प्रयोग करने की सुविधा अपने नागरिकों के लिए प्रदान करता है। उदाहरणार्थ, इंग्लैंड के पडौसी देश फ्रांस में फ्रेंच ही राष्ट्रभाषा है। हर फ्ऱांसिसी नागरिक फ्रेंच भाषा ही बोलता लिखता है। अंग्रेज़ी इसका विकल्प नहीं है। यदि कहीं है तो स्कूलों में दोयम दर्जे की विदेशी भाषा के रूप में अंग्रेज़ी पढऩे सीखने की सुविधा उन लोगों के लिए उपलब्ध है जो कभी अपने जीवन में उसका उपयोग होते देखते हैं। कोई फ्रेंच नागरिक यदि अंग्रेज़ी जानता भी है तो आपके साथ फ्रेंच में ही बात करने में गर्व महसूस करता है। फ्रेंच में अंग्रेज़ी की घुसपैठ का तो प्रश्न ही नहीं उठता। क्या अंग्रेज़ी के बिना फ्रांस का विकास और विश्व प्रभाव अभावग्रस्त हैं? हिन्दी भारत की सर्वाधिक जनसंख्या की भाषा है और इस कारण उसमें देश को जोड़े रखने के लिए परस्पर संपर्क की भाषा बनने की पूर्ण क्षमता विद्यमान है। सभी मान्य भारतीय भाषाओँ के साथ समन्वय कायम करते हुए, हिन्दी को राष्ट्रभाषा बनाए जाने का सर्वप्रथम प्रस्ताव 95 वर्ष पूर्व पंडित मदनमोहन मालवीय ने किया था।

वर्ष 1919 में, मालवीय जी ने बम्बई में आयोजित एक हिंदी साहित्य सम्मलेन की अध्यक्षता करते हुए कहा था कि भारत में सभी भाषाएं आपस में बहन की तरह हैं और हिंदी भाषा उनमे से बड़ी बहन की तरह है। सभी बोली जाने वाली भाषाओँ में हिंदी बहुतायत से बोली जाती है। कुल 32 करोड़ लोगों (उस समय के भारत की जनसंख्या) में से करीब साढ़े तेरह करोड़ लोग हिंदी भाषा का प्रयोग करते हैं। इसलिए देवनागरी लिपि को ही राष्ट्र भाषा की पदवी पर सुशोभित करना चाहिए।

साथ ही उस समय मालवीय जी ने हिंदी को उच्च शिक्षा योग्य बनाने पर भी बल दिया। मालवीय जी का सपना था कि अंग्रेज़ी भाषा की तरह ही हिंदी भी एक दिन पूरे विश्व में बोली जाएगी।

भारत के संविधान में राष्ट्रभाषा के सम्बन्ध में निर्णय लिए जाने के समय भी मतैक्य का अभाव उत्पन्न हुआ था। राजनीतिक कारणों से दक्षिण और उत्तर के बीच भाषाई विभेद की दीवार खड़ी की गई थी। भारत के संविधान निर्माताओं ने लम्बे विचार विमर्श के पश्चात स्थति को सुगम बनाने की चेष्ठा में देश की सभी मुख्य भाषाओँ को समान मान्यता देते हुए भाषाई आधार पर राज्यों के गठन के अनुरूप उनके क्षेत्रीय उपयोग को संभव बनाया। तदनुसार, जहाँ तक मेरी जानकारी है लगभग सभी राज्यों में अब सरकारी कामकाज की भाषा प्रमुख रूप से अंग्रेज़ी न बने रह कर प्रादेशिक भाषा है। इस प्रकार सभी भाषाओँ को योग्य स्थान प्राप्त होने के साथ संविधान में भाषा सम्बन्धी स्पष्ट समाधान यह रहा है कि हिंदी केंद्र और राज्यों के बीच परस्पर संपर्क सुविधा की दृष्टि से और राष्ट्रीय स्तर पर देश की राजभाषा होगी। मात्र 15 वर्षों तक इसके साथ अंग्रेज़ी का प्रयोग बनाए रखने का प्रावधान था। इस अवधि में भी और उसके बाद अंग्रेज़ी को हिन्दी के समकक्ष बनाए रखने की किसी भी प्रकार की अनिवार्यता का जि़क्र संविधान में नहीं मिलता। लेकिन संसद में चुन कर गए जनप्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्रीय राजनीतिक स्वार्थ हितों के कारण अनेक दशक बीत जाने के बाद भी हिन्दी को उसका उचित संवैधानिक अधिकार देने से वंचित रखा है। इसे अब बदले जाने की आवश्यकता है।समय आ गया है कि केंद्र सरकार संविधान की मूलभूत भावना का सम्मान करते हुए घोषणापत्र जारी करके और यदि आवश्यकता हो तो, संसद में सर्वसम्मति या मतदान से निर्णय के बाद हिन्दी को विधिवत राष्ट्रभाषा घोषित करके उसके साथ हो रहे अन्याय का अंत करे। उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में अंग्रेज़ी का स्थान हिन्दी को मिले। केंद्र और राज्यों के बीच सरकारी पत्राचार राष्ट्रभाषा भाषा हिन्दी के साथ देश की भूमि पर विकसित हुईं अन्य भारतीय भाषाओँ के साथ अनुवाद की सुविधा प्रदान करके संभव बनाया जाए। देश के अंदर जहाँ जहां भी अंग्रेज़ी का अनावश्यक प्रयोग जारी है उसे सामान्य जनहित में भारतीय भाषाओँ में बदल कर अंग्रेज़ी के प्रयोग को उसके शून्यान्तक की दिशा में मोड़ दिया जाए। मात्र अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापारिक आदानप्रदान और विदेश सम्बंधित मामलों तक यथावश्यकता अंग्रेज़ी का प्रयोग सीमित कर दिया जाए।क्या पूर्ण बहुमत प्राप्त राष्ट्रवादी भाजपा की सक्षम वर्तमान सरकार और उसके राजग सहयोगियों  से यह आशा की जा सकती है कि वे ‘इंडिया’ को पुन: भारत बनाने और हिन्दी को उसका संवैधानिक दर्जा दिला कर राष्ट्रगौरव को जागृत करने के संकल्प को पूरा करने के लिए त्वरित गति प्रदान करने हेतु कदम उठाएंगे?

 

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