‘बेड़ी और वीणा’ के सुर फिर से एक बना दो

300px-India_flagबहादुरशाह जफर का शेर है :-
जिसे देखा हाकिमे वक्त ने, कहा ये तो काबिलेदार है।
कहीं ये सितम भी सुने भला दिये फांसी लाखों को बेगुनाह।।
दार का अर्थ फांसी होता है। सचमुच परतंत्रता के उस काल में हमारे देशवासियों के प्रति विदेशी शासकों की ऐसी ही मानसिकता बन चुकी थी। देशभक्ति उस समय एक अपराध बन चुकी थी और हमारे क्रांतिकारी थे कि इस अपराध को बार-बार किये जा रहे थे। फिरंगियों के पास फांसी के फंदे कम पड़ गये थे, लेकिन फांसी के लिए भारत मां के अमर बलिदानियों ने अपने गले कम नही पडऩे दिये। बहुत से क्रांतिकारी ऐसे थे जिन्हें मृत्यु के उपरांत ना तो कफन मिला और ना ही अपने लोग उन्हें ‘दफन’ (अंतिम संस्कार) कर सके। परंतु एक जज्बा था देशभक्ति का, जो कम होने का नाम नही ले रहा था। वतन की हवाओं को ही उन्होंने अपना ‘कफन’ बना लिया था और अपनी देह की मिट्टी से भी पावन उनके लिए खाके वतन हो गयी थी। इसलिए ‘कफन-दफन’ की प्रक्रिया उनके लिए छोटी हो गयी थी।
आज देश को आजाद हुए 67 वर्ष हो रहे हैं। अत: अपने बलिदानियों को रस्मी तौर पर नही, अपितु हृदय से स्मरण करने की आवश्यकता है। मुझे यहां वर्तमान हापुड़ जनपद के धौलाना गांव का एक प्रसंग स्मरण आ रहा है। जिसके 14 अमर बलिदानियों ने इस गांव का ही नही अपितु इस क्षेत्र का नाम भी स्वतंत्रता संग्राम के स्वर्णिम पृष्ठों में अंकित करा दिया गया था। इन बलिदानियों के नाम थे-श्री झनकूमल सिंहल, दुर्गासिंह, साहब सिंह, सुमेर सिंह, दलेल सिंह, जीराज सिंह, किट्टा सिंह, जियासिह, महाराज सिंह, चंदनसिंह, मुसाहब सिंह, दौलत सिंह, वजीरसिंह, मक्खन सिंह। जब क्रांति का हल चलते-चलते देश के हर मानस को उर्वरा बना रहा था, तब देश का कोई आंचल नही बचा था जो उस क्रांति हल से स्वयं को आंदोलित न समझ रहा हो, इसलिए धौलाना गांव के इन देशभक्तों ने भी राष्ट्रयज्ञ में अपना ‘सर्वस्व होम’ करने का संकल्प लिया। अत: गांव में एक गुप्त बैठक करने के पश्चात इन क्रांतिकारियों ने धौलाना गांव के थाने पर हमला बोल दिया। यह घटना 1857 की क्रांति के समय की है। ग्रामीणों के भीतर उस समय के इतने साहस को देखकर सहज ही पता चल जाता है कि उस क्रांति की ज्वाला को धधकाने में देश का जनसाधारण भी कितना रूचि दिखा रहा था। जो लोग 1857 की क्रांति को कुछ राजाओं की निजी महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए लड़े गये संघर्ष के रूप में अब तक देखते हैं या उस क्रांति को केवल एक विद्रोह ही मानने की भूल करते हैं, उनके लिए धौलाना के इन चौदह शहीदों की दास्तान अपनी धारणा को परिवर्तित करने के लिए पर्याप्त होनी चाहिए।
इन शहीदों के नेता झनकूमल थे। जिन्होंने इस क्रांति के लिए अपना सर्वस्व होम कर दिया था। जब इन लोगों ने पुलिस थाने पर हमला बोला तो पुलिस में हडक़ंप मच गया और दरोगा को भी जान बचाकर मेरठ के लिए भागना पड़ गया था। जहां जाकर उसने अपने ‘अंग्रेज’ आकाओं को इन क्रांतिकारियों के दुस्साहस की कहानी सुनाई। फलस्वरूप मेरठ से पर्याप्त सुरक्षा बल धौलाना के लिए भेजा गया। हमारे क्रांतिकारी रण छोडक़र भागे नही, अपितु आने वाली पलटन का अपने स्थान पर ही इंतजार करते रहे। भारी सुरक्षा बल ने आनन फानन में गांव पर धावा बोल इन 14 क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया। इन्हें एक पेड़ पर लटकाकर फांसी दे दी गयी और यद्यपि ये सारे के सारे ही हिंदू थे, परंतु इन्हें चिता के सुपुर्द न कर दफनाया गया और दफनाते समय इनकी पावन मिट्टी को और भी अपमानित करने के लिए इनके साथ 14 कुत्ते भी दफन कर दिये गये।
11 मई 1957 को इन शहीदों की स्मृति में ग्राम धौलाना में एक स्मारक बनाया गया, जो इनके अमर बलिदान की अमर गाथाओं को आज तक बयान कर रहा है। आज हमें अपने इन जैसे अनेकों क्रांतिकारियों के अमर बलिदानों का स्मरण करने की आवश्यकता है। इनके सपने देश को आजाद करने के थे और सपनों में केवल निजाम (शासन) को ही अपने हाथ में लेना नही था, बल्कि इंतजाम (व्यवस्था) को भी अपने हाथों में लेना इनका उद्देश्य था। हमें 15 अगस्त 1947 को निजाम तो मिल गया पर इंतजाम को लेने के इंतजाम तो वहन्ी समाप्त हो गये। इसलिए आज फिर एक क्रांति की आवश्यकता है, देश का धर्म, देश की संस्कृति और देश का इतिहास आज भी गुलाम है। 67 वर्ष बाद भी जिस देश में महाभारत और गीता को काल्पनिक कहने वाले काटजू जिंदा हों, तो वहां समझिए कि गुलामी अभी भी किसी न किसी रूप में है। इस गुलामी के चिन्हों को मिटाने के लिए आज की युवा पीढ़ी को फिर एक क्रांति के लिए सामने आना होगा। अशफाक इन पंक्तियों को अक्सर गाया करते थे-
भारत जननि तेरी जय हो, विजय हो,
तेरे लिए मृत्यु हो स्वर्ग का द्वार।
बेड़ी की झनझन में वीणा की लय हो,
आये पुन: कृष्ण देखें तेरी दशा,
राणा शिवाजी का फिर से उदय हो।’’
‘बेड़ी और वीणा’ दोनों के एक सुर सम होने बड़े सौभाग्य की बात है, आज बेड़ी वाले वीणा को नही जानते और ‘वीणा’ वाले बेड़ी से बचते हैं। इन दोनों को फिर एक लय निकालने दो। सचमुच भारत ‘विश्वगुरू’ बन जाएगा। मोदी जी, सी सैट समाप्त करो। निज भाषा, निज संस्कृति, निज धर्म को निद्र्वन्द्व गाने दो। जिस दिन ऐसा हो जाएगा, भारत उसी दिन आजाद होगा।
भारत की आजादी अपनी पूर्णता की बाट जोह रही है। देश ने विकास किया है, और उसके विकास में जिन-जिन हाथों ने, दिमागों ने, और बाजुओं ने अपने-अपने स्तर पर कार्य किया है, उन सबका हार्दिक अभिनंदन और जो अभी इस दिशा में कार्य करने की भरपूर संभावनाएं देख रहे हैं, उनका और भी अधिक अभिनंदन।

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