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इतिहास के पन्नों से

गुजरी पन्नाधाय के बलिदान का कोई जोड़ नहीं

अशोक आर्य

भारत का गौरव इस बात से ही है कि इस देश में जहां भी तप , त्याग व संयम की आवश्यकता हुई , इस देश के प्राणी, इस देश के वीर . वीरांगणाएं सदा आगे ही दिखाई दिये । अपनी आन के लिए सिर कटा दिये , धन – सम्पदा त्याग दी किन्तु आन को नहीं जाने दिया । एसे ही त्यागी तपस्वी भारतीयों में माता पन्ना धाय का नाम विश्व इतिहास में सितारे की तरह चमक रहा है ।
आज से लगभग चार सौ वर्ष पूर्व जब दिल्ली में हुमायुं का रज्य था , उस समय राजपुताना में अर्थात् वर्तमान रजस्थान में छोटे – छोटे विभिन्न भारतीय राजस्ताएं थीं । यह राजपूत शासक जरा सी बात पर आपस में भिड जाते थे तथा सैंकडों सैनिकों की गर्दनें कट जातीं थीं । इस समय महाराणा संग्रामसिंह के पुत्र राणा विक्रमसिंह चितौड में राज्य कर राहे थे । वह एक अद्भुत योधा थे । इस कारण उनकी वीरता सम्बन्धी गीत आज भी रजस्थान की धरती पर गाते हुए वहां के लोगों को अति गर्व का अनुभव होता है ।
जहां राणा संग्राम सिंह में दूर्दर्शिता ,वीरता , साह्स , देशभक्ति व जनसेवा की भावना थी, वहां राणा विक्रमसिंह इन अनूठे गुणों से कोसों दूर थे । यह तो एक अत्याचारी के रूप में जाने जाते थे, इस कारण वहां की जनता इनके व्यवहार से अत्यधिक परेशान रहने लगी । राज्य की शक्ति उस की प्रजा तथा सेना ही होते हैं किन्तु प्रजा के साथ ही साथ इनकी सेना भी अत्यधिक दु:खी थी । समय के साथ पिसती चली जा रही सेना में भी धीरे – धीरे विरोध की भावना प्रबल होती चली जा रही थी । अव्यवस्था यहां तक जा रही थी कि जिस स्थान पर भी जा कर लोगों से कोई चर्चा होती तो एसा भान होता कि लोगों में भारी अशान्ति तथा अपने शासक के प्रति विरोध की भावना प्रबल हो रही है । सब ओर अशान्ति ही अशान्ति दिखाई देने लगी । इस सब का परिणाम यह हुआ कि इन्हें पद्च्युत कर दिया गया । इन्हें राजगद्दी से उतार दिया गया । परिणाम स्वरुप विक्रमसिंह राज – काज से विहीन हो गये तथा इन के स्थान पर राणा उदयसिंह को यहां की राजसत्ता सौंप दी गयी । अब राणा उदय सिंह यहां के शासक थे ।
चितौड़ की सत्ता राणा उदयसिंह को सौंप तो दी गई किन्तु अपनी अल्पायु के कारण वह राज्य व्यवस्था ठीक से करने के लायक अभी न थे । इस कारण उनका मार्ग दर्शन करने तथा उन के नाम से राज्य का संचालन करने के लिए किसी व्यक्ति की आवश्यकता थी । अत: इस विचार से कि जब तक राणा ऊदयसिंह सयाना न हो जावें तब तक के लिए राज्य की सब व्यवस्था , सब प्रबन्ध बनवीर के हाथों में दिया गया । यह बनवीर राजा के , राणा के परिवार से न था किन्तु राज्य में उसको उत्तम स्थान प्राप्त था और दरबार में अच्छा रोब भी रखता था ।
राणा उदयसिंह माता – पिता विहीन बालक था । पिता युद्ध के मैदान में मारे जा चुके थे जबकि माता भी इस संसार को त्याग कर परलोक गमन कर गई थीं । एसे माता – पिता विहीन बालक का लालन – पालन का दायित्व पन्ना नाम की एक धाय के कन्धों पर था । वह ही इस बालक की देख – रेख किया करती थी । वह बालक उदयसिंह ओर अपने बालक में कुछ भी अन्तर न करती थी , अपने बच्चे का सा पूरा प्यार व स्नेह पन्ना धाय से उसे मिल रहा था । वह न केवल उसके खाने – पीने का ही ध्यान रखती अपितु सुलाती भी अपने ही पास थी , सदा रखती भी अपने ही पास , अपनी ही आंखों के सामने । इस का ही परिणाम था कि उदय सिंह को भी पन्ना में अपनी माता की मूर्ति दिखाई देती थी । वह पन्ना से बहुत प्रेम करने लगा तथा इस प्रेम के कारण वह उसे माता ही
कहने लगा । पन्ना धाय के पास एक अपनी कोख से जन्मा पुत्र भी था । पन्ना के अपने इस पुत्र का नाम था चन्दन । यह दोनों भाई आपस में सगे भाईयों के समान हंसते – खाते व खेलते थे ।
बड़े ही उत्तम ढंग से राज्य संचालन की व्यवस्था के कारण बनवीर को सब चाहने लगे थे । अत: धीरे – धीरे बनवीर का मन भी लालच से भर गया । अब वह सोचने लगा कि एक तो राज्य का पूरा बोझ उस पर है तथा नाम उदयसिंह का चलता है । दूसरे जिस राणा विक्रमसिह को पद्च्युत किया गया है , वह भी कहीं किसी प्रकार की चाल चलकर उसके लिए कोई संकट न खडा कर दे । इसलिए क्यों न इन दोनों को मारकर अपने मार्ग से हटा दिया जावे । इस प्रकार दोनों के समाप्त होने के पश्चात् पूरी राजसत्ता उसकी अपनी होगी तथा वह स्वेच्छा से शासक रुप में कार्य करने का अधिकारी हो जावेगा , तब उसे किसी प्रकार की कोई रोक – टोक न होगी । एक लम्बे विचार के पश्चात् उसने अपनी इस योजना को क्रियात्मक बाना पहनाने का निश्चय किया । इस कार्य को करने के लिए वह किसी अन्य पर विश्वास न करता था , इस कारण उसने यह कार्य किसी अन्य से करवाने के स्थान पर स्वयं ही सम्पन्न करने का निर्णय भी ले लिया क्योंकि वह जानता था कि उसके साथ भी धोखा हो सकता है तथा सत्य खुल जाने पर उसकी अपनी जान को भी खतरा हो सकता है । उदयसिंह राज्य का असली अधिकारी होने के कारण अपने राजा की ह्त्या की योजना पर अन्य कोई कैसे काम कर सकता था ?
जब मन में लालच आता है तो मानव धूर्त बन जाता है । उस में सत्य- असत्य, न्याय -अन्याय की परख की शक्ति समाप्त हो जाती है । कुछ एसा ही बनवीर के साथ हुआ तथा उसने अपनी धूर्तता का प्रमाण देते हुए , अपनी लालची प्रवृति का प्रमाण देते हुए , अपने देशभक्ति को ताक पर रखते हुए, उसने अवसर पाकर एक रात को नंगी तलवार अपने हाथ में ली तथा सीधे विक्रमजीत सिंह के कमरे मे जा पहुंचा । विक्रम इस समय गहरी नींद में था । अन्यायी बनवीर ने युद्ध के सब नियमों को ताक पर रखते हुए , निहत्थे , शस्त्र – विहीन तथा सोये हुए इस विक्रम पर वार किया तथा अन्यायी ने उसके शरीर को दो टुकडों में बांट दिया ।
बनवीर ने हत्या करते हुए यह सोचा था कि कोई उसे देख नहीं रहा । केवल एकान्त का ही अनुभव करके वह उस कमरे में गया था किन्तु यह उसका दुर्भाग्य ही था कि राज्य का एक अनुचर , विक्रम का एक सेवक , जो देश के प्रति अपार भक्ति अपने अन्दर समेटे था ,उसने बनवीर को यह ह्त्या करते हुए देख लिया । उसे यह समझते देर न लगी कि यह बनवीर लालच से भर गया है । अभी तो इसने विक्रम का ही खून पिया है , इसके पश्चात् राणा उदयसिंह की बारी आने वाली है । उस के अन्दर की स्वामी भक्ती जाग उठी | उसने स्वामी का नमक खाया था , वह नमक को रऋण समझता था तथा नमक की पूरी कीमत अदा करना अपना धर्म समझता था | बनवीर के कुक्रत्य को देखकर एक बार तो वह कांप गया था किन्तु तत्काल उसने उदयसिंह को बनवीर के हाथों से बचाने की योजना बनाई । एक क्षण भी नष्ट किये बिना वह दौडता हुआ माता पन्ना धाय के पास गया । इस समय पन्ना अपने प्रिय चन्दन को छाती पर तथा प्यारे उदयसिंह को साथ में लिये निद्रा की गोद में थी ।
इस सेवक ने तत्काल पन्ना को झिंझोडते हुए जगाया । जगाते ही जल्दी से उसे बताया कि विक्रमसिंह की हत्या करने के पश्चात हाथों में खून से सनी तलवार ले कर बनवीर इधर ही चला आ रहा है।ऐसा लगता है कि वह राणा उदयसिंह की भी हत्या कर देगा । वह किसी भी समय यहां पहुंच सकता है । इस अल्प समय में शीघ्र ही कोई एसा उपाय किया जावे कि चितौड अधिपति राणा उदय सिंह की रक्षा हो सके । अल्पायु राजकुमार तो स्वयं अपने बचाव के लिए कुछ कर नहीं सकते । अत: हे माता ! तुम्हीं उसकी रक्षा का कोई उपाय सोचो ।
यह बात सुनते ही पीले पड़े अपने चेहरे के साथ पन्ना थर – थर कांपने लगी, उस की आंखों के सामने अन्धेरा छाने लगा , उसे कुछ सूझ न रहा था कि वह क्या करे ? परन्तु दूसरे ही क्षण उसका चेहरा खिल उठा । उसने कुछ निर्णय लिया । उसे इस प्रकार का ही एक अन्य उदाहरण स्मरण हो आया, जब अपने स्वामी के बालक की रक्षा करते हुए माता यशोदा ने अपने ही बच्चे को बली के लिए सौप दिया था । जब यशोदा अपने बच्चे के लिए अपने जिगर के टुकडे का बलिदान दे सकती है तो पन्ना क्यों नहीं ? मैं भी अपने जिगर के टुकडे का बलिदान देकर इस राणा की रक्षा करूंगी। यह सोचते ही उस का चेहरा खिल उठा । वह तत्काल आगन्तुक सेवक से बोली ” अपने जीते जी मैं कभी उदय की हत्या न होने दूंगी । मेरे होते एसा कभी नहीं हो सकता ।” सेवक ने पुन: अपनी बात दोहराते हुए बालक को बचाने का उपाय पूछा ।
पन्ना ने कहा कि भाई देखो ! मेरे पास यह मिठाई का एक टोकरा है । उदय को इस टोकरे में लिटाकर तुम वीरा नदी के किनारे ले चलो । यह सब कार्य तुम बडी चतुराई तथा होश्यारी से करना । मैं भी कुछ देर के पश्चात् यहां से निकलूंगी तथा तुझे वहीं मिलूंगी । इस पर नौकर ने कहा कि उदय को तेरे पास न पाकर बनवीर क्या करेगा ? , इस पर भी कुछ विचार किया क्या ?
पन्ना ने तत्काल कहा कि अब उस निर्दयी हाथों बच पाना असम्भव ही दिखाई देता है ” मेरा जो होगा पीछे देखा जावेगा । अभी तो जो मैंने कहा है , उसे झटपट करो ।” यह सुन सेवक ने धीरे से उदयसिंह को टोकरी में रखा तथा बडी सावधानी से वीरा नदी की ओर चल दिया । अब पन्ना ने पहले से ही निश्चित की अपनी योजना पर कार्य आरम्भ कर दिया । वह तो निश्चय कर ही चुकी थी कि स्वामी की रक्षा के लिए कोई भी बलिदान कम है । वह किसी प्रकार का भी बलिदान देने को तत्पर थी । वह देश को सर्वोपरि मानती थी । अन्याय से चितौड को बचाने का निर्णय उसने ले लिया था अत: इसे कार्य रूप देने के लिए उसने अपने जिगर के टुकडे चन्दन को उदय के बिस्तर पर सुलाकर एक प्रकार से बलिवेदी की भेंट कर दिया तथा उसका शरीर कपडे से ढांपकर निश्चिन्त हो स्वयं भी सो गई ।

सोना तो पन्ना का नाटक ही था , बस उसका बनवीर को यह दिखाने का एक यत्न मात्र ही था कि बनवीर क्या कर रह है ? , इस का उसे कुछ भी पता नहीं । अभी वह लेटी ही थी कि हाथों मे लहू से सनी तलवार लेकर बनवीर कमरे में आ घुसा । एक कत्ल के पश्चात् तो वह आपा खो चुका था , उसकी अक्ल मारी जा चुकी थी । अत: आते ही , प्रवेश करते ही चिल्लाते हुए पन्ना से बोला कि ” बता उदय कहां है ?’ अब पन्ना मूर्ति की भान्ति शान्त थी किन्तु बनवीर ने हवा में तलवार लहराते हुए फ़िर पूछा , “बता उदय कहां है ?” पास में उसका अपना बच्चा चन्दन सो रहा था | उदय की रक्षा उसके अपने बालक के बलिदान से होने वाली थी, इस कारण पन्ना के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था । बस मात्र उंगली के इशारे से चन्दन की ओर संकेत कर दिया । संकेत मिलते ही बनवीर ने न तो बच्चे के मुंह से कपडा हटाया न ही कुछ परख की बस संकेत मिलते ही उसने अपनी तलवार का चन्दन के उपर जोर से वार किया । तलवार का वार होते ही बालक के मुख से एक हल्की सी चीख निकली तथा सब ओर खून ही खून दिखाई देने लगा ।
यह दो हत्याएं कर बनवीर ने मन ही मन अपनी सफ़लता पर खुशी अनुभव की तथा इस खुशी में ही वह अपने स्थान की ओर लौट गया । अपनी आंखों के सामने अपनी सन्तान का कत्ल होते देख भी पन्ना अविचल खडी थी । वह जानती थी कि उसकी एक चीत्कार, उसका भयभीत हावभाव न केवल उसकी अपनी हत्या का कारण बनेगी बल्कि उसके कारण उदय का जीवन भी संकट में पड जावेगा । अत: हत्या के समय उसने बनवीर का किसी प्रकार से भी विरोध न करते हुए उसे यह भी पता न चलने दिया कि उदय तो बाहर भेजा जा चुका है तथा जिसकी हत्या हो रही है, वह उसका अपना बेटा था ।
अब पन्ना का अगला कार्य आरम्भ हुआ । पन्ना ने अपने मारे गये बच्चे के टुकडों को उठाया , एक कपडे में लपेटा तथा उस का अन्तिम संस्कार करने के नाम से उसे भी वीरा नदी के तट पर ले गयी तथा वहां पर उसका अन्तिम संस्कार कर दिया । अब प्रश्न था उदय की रक्षाक्शा तथा उसके पालन का , उसके भरण – पोषण का ! यह उसके लिए एक बहुत बडी चिन्ता की बात थी । वह बालक उदय को लिए स्थान – स्थान पर भटक रही थी , कई लोगों से सम्पर्क कर रही थी किन्तु कोई इस विपत्ति को अपने गले डालने को तैयार न हो पा रहा था । अन्त में वह मेवाड के एक सरदार के पास पहुंची । यह सरदार उस भामाशाह का पिता था, जिस भामाशाह ने अपने मेवाड की रक्षा के लिए अपना सारा धन महाराणा प्रताप को अर्पित किया था । उसमें भी अपने पिता के ही संस्कार थे , जिस कारण अपना धन देश के अर्पण किया । उसके इस पिता का नाम था आसाशाह । आसाशाह ने उदयसिंह की रक्षा तथा उसके लालन – पालन का जिम्मा अपने ऊपर ले ले लिया ।
सत्य कभी छुपा नहीं करता । इस बात का ही परिणाम था कि कुछ काल पश्चात् ही चितौड के सैनिकों को पता चल गया कि उदयसिंह जीवित है । अब तक उदयसिंह बडा हो गया था तथा युद्ध कौशल में भी प्रवीण हो गया था ,। बडे सम्मान के साथ चितौड के वास्तविक राजा को वहां की सेनाए आदर पूर्वक लेकर चितौड आईं तथा उन्हें सिंहासन पर बैठाया गया । उदयसिंह को चितौड की गद्दी पर बैठा देख पन्ना के मन को अत्यधिक सन्तोष हुआ । आज उसका वह सपना साकार हो गया था ,जिसे पूरा करने के लिए उसने अपनी ही सन्तान का बलिदान दिया था । आज इस गद्दी पर उदय को बैठे देख वह अपने आप को धन्य मान रही थी , तथा अपने बालक के बलिदान पर उसे गर्व हो रहा था ।
एसी ही त्यागी व तपस्वी माताओं का नाम , जिन्होंने अपनी सन्तान को अपने ही हाथों देश के लिए बलिदान किया , का नाम तो स्वर्णाक्षरों में पिरोना आवश्यक हो जाता है । उसके नाम की माला फ़ेरना अपने में विशेष ही महत्व रखता है।

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