अर्थहीन हो गया है रावण दहन

rawan dahanलगता नहीं कि आज के मौजूदा माहौल में रावण दहन अर्थहीन हो गया है, औचित्य खो चुका है और जिस संदेश को देने के लिए रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों का दहन होता रहा है, प्रतीकात्मक लंका को जलायी जाती रही है, वह संदेश स्वीकारने का साहस अब किसी में बचा ही नहीं है।

कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हममें से अधिकतर लोगों के लिए रावण दहन वह एकमात्र औपचारिकता होकर रह गया है जिसे धर्म और परंपरा के साथ इतने गहरे तक जोड़ दिया जा चुका है कि हम उसका निर्वाह किए बगैर निरापद नहीं रह सकते।

कहा तो यह जाता है कि रावण दहन बुराइयों पर अच्छाइयों का प्रतीक है। सारे लोग भाषणों में भी इस दिन यही कहते हैं, मीडिया और दूसरी सभी जगहों पर भी यही बात कही जाती है। कहीं कहा जाता है असत्य पर सत्य की विजय, कहीं आसुर्य पर दैवत्व की विजय, और कहीं कुछ और।  कुल मिलाकर जिन आदर्श बोध वाक्यों और प्रेरणादायी शब्दों से भरे हुए जुमलों का इस्तेमाल करते हुए हम दशहरा मनाते हैं वह सिर्फ और सिर्फ औपचारिकता निर्वाह होकर रह गया है जैसे कि हम दूसरे उत्सव और पर्व मनाते हैं।

रावण और लंका दहन के नाम पर सालाना करोड़ों फूँकने और दशकों-सदियों से परंपराओं का निर्वाह करते रहने के बावजूद न हममेंं रामत्व ही आ पाया है, न रावणत्व से पीछा छूट पाया है।  इस मामले में हमें धर्म, परंपराओं और पुरातन मानसिकता को छोड़ कर गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है कि ऎसे कर्म का क्या औचित्य, जो समाज में बदलाव लाने का प्रेरक नहीं बन सके। जो कुछ हो, वह उपलब्धिमूलक हो, समाज को दिशा देने वाला हो, उत्तरोत्तर तरक्की पर ले जाने वाला हो।

यहाँ बात परंपराओं के निर्वाह को समयानुकूल और प्रभावी स्वरूप प्रदान करने की है, न कि किसी धर्म, संस्कृति या परंपराओं के किसी भी पक्ष के बारे में।  हर कोई विजयादशमी पर रावण दहन की बात आते ही इसे सत्य पर असत्य की विजय, बुराइयों पर अच्छाइयों की विजय बताते हुए अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करता है लेकिन कोई यह स्वीकारने को तैयार नहीं है कि रावण दहन का उद्देश्य सिर्फ पुतले व लंका फूंकने और आतिशबाजी के धमाकों को सुनकर खुश होने, रावण की ऊँचाई के चर्चे करने, रावण दहन समारोहों में होने वाली राजनीति और वीआईपी कल्चर का महिमागान करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि समाज और राष्ट्र को अनुशासित, मर्यादित और उन्नतिशील बनाने का रहा है।

आज हम रावणत्व से कहाँ दूर जा रहे हैं ? कौनसा रामत्व प्राप्त कर पा रहे हैं।  मर्यादापुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने अधर्म और रावण का संहार कर जिस रामराज्य की स्थापना की थी, जिन मूल्यों और आदर्शों को जीवन व्यवहार में अपनाया, जिस राजधर्म का पालन किया, और जिस प्रकार से प्रजा के हितों को सर्वोपरि मानकर लीलावतार के रूप में जन-मन में रच-बस गए, उस रामत्व को हम कहाँ अंगीकार कर पाए हैं।

हम सिर्फ रामराज्य लाने और राष्ट्र को परम वैभव पर पहुँचाने की बातें करते हैं, उसके प्रति हम व्यक्तिगत रूप से कितना समर्पण कर पा रहे हैं, यह सोचने की बात है। सत्य और तथ्य तो यह है कि हम आज उन सभी कामों को करने में लगे हुए हैं जो रावण या दूसरे राक्षसों ने  बीते युगों में किया है। इससे भी बढ़कर हम ऎसे-ऎसे काम कर रहे हैं, करवा रहे हैं, मूकदर्शक बने हुए देख-सुन रहे हैं, भुगत रहे हैं, जो अपने जमाने में राक्षसों से ने भी नहीं किए होंगे।

आज भूल-भटके रावण, कुंभकर्ण, मेघनाद, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ, रक्तबीज, भण्डासुर, चण्ड-मुण्ड और दूसरे सभी प्रकार के राक्षसों की आत्माओं को एक दिन के लिए पृथ्वी पर परिभ्रमण के लिए भेज दिया जाए तो हमारी हरकतों और आसुरी वृत्तियों को देखकर वे भी लज्जित हो जाएं और अपने आपको हमसे भी श्रेष्ठ स्वीकारने लग जाएं।

हम उन सारे कामों को करने में पीछे नहीं हैं जिन्हें मानवता की हत्या करने वाला कहा जाता है। धन-सम्पत्ति, परायी नार, पद-मद और कद पाने की लड़ाई, झूठ पर झूठ का साम्राज्य, गैंगरेप, भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, मुनाफाखोरी, भ्रूण हत्या, जीव हिंसा, गौवंश हत्या, एक-दूसरे को नीचा दिखाने और गिराने, पैसों के लिए कुछ भी कर डालने, हत्या, लूट, चोरी-डकैती, बलात्कार, अधर्म को अपनाने और विधर्मियों का साथ देने, पुरुषार्थहीन होकर लूट-खसोट कल्चर को अपनाने, पदों के दुरुपयोग, पक्षपात, भाई-भतीजावाद, वंशवाद, परिवारवाद, माँ-बेटा वाद, लव जिहाद, सेक्स जिहाद, पोर्न कल्चर, कामचोरी, बेईमानी, दूसरों के धन पर डाका डालने छीना-झपटी, प्रचार पाने के लिए तमाम हथकण्डों का इस्तेमाल, घड़ियाली आँसू बहाने, आतंकवाद पनपाने, सामाजिक विखण्डन, असामाजिक हरकतों, परायों टुकड़ों पर बिक जाने, सुरा-सुन्दरी और पैसों के लिए कुछ भी कर गुजरने, माता-पिता और गुरुजनों के अपमान, चरित्रहीनता, भाई-बंधुओं के साथ दगा, छल-कपट और धर्म के नाम पर पाखण्ड, आडम्बर और इससे भी बढ़कर वे तमाम अधर्माचरण करने में जुटे हुए हैं, यह न हमसे छिपा हुआ है, न और किसी से।

भगवान श्री राम भी जानते हैं हमारी इस दुरावस्था को। इन सारी हरकतों और हलचलों का एक ही सार निकाला जा सकता है कि हमने अघोषित रूप से निशाचरी संस्कृति को पूरी तरह अपना लिया है। ऎसे में हमें रावण दहन का क्या अधिकार है, यह जवाब हमें अपनी आत्मा से तलाशना होगा।

एक निशाचर के जीवन से अपनी तुलना करें, अपने आप कलई खुल जाएगी अपनी महानता के भ्रमों की। बहु स्टारीय होटलों की मस्ती, सुरापान, माँसभक्षण, चरित्रहीनता, उच्छृंखलता, उद्दण्डता, सज्जनों पर आतंक का कहर बरपाना, समूहों में इकट्ठा होकर श्रेष्ठीजनों पर हमला बोलना, ब्लेकमेलिंग, औरों की कमजोरियां तलाश कर शोषण, पद पाने के लिए किसी भी सीमा तक गिर जाना, देर रात तक जगते रहना, सूर्योदय के काफी देर बाद उठना, आधी रात तक भोजन करते रहना, अपने ही अपने स्वार्थ की पूर्ति में रमे रहना और दूसरी सारी बुराइयों से हमारे सर्वांग जीवन की तुलना कर लें, तो हम पाएंगे कि हम लोग तो उन असुरों से भी ज्यादा गए-बीते हैं।

उन असुरों के काल में भी कुछ मर्यादाएं थी, लेकिन आज हम सब मर्यादाहीन हो गए हैं, हमारे जीने का क्रम पूरा का पूरा फ्री स्टाईल ही हो गया है। हम न तो किसी मर्यादा को मानते हैं न कोई अनुशासन। हमारे हित और स्वार्थ ही हमारे परमेश्वर हैं और इन्हें पाने के लिए किए जाने वाले सारे जायज-नाजायज जतन उनकी उपासना।

इन हालातों में हमें क्या अधिकार है कि रावण को बुरा कहें और उसका पुतला जलाते हुए असत्य पर सत्य तथा बुराइयों पर अच्छाई की विजय के उद्घोष करते हुए उत्सवी आनंद का इज़हार करें।

हे राम  …. हमें माफ करना, हम रामराज्य की बातें ही करना जानते हैं, इसके लिए कुछ करना हमारे बस में नहीं है।

हे रावण ….. तुम भी हमें माफ करना, तुम्हारा पुतला जलाते हुए हम भले ही आसुरी वृत्तियों की बात करें, मगर हम तुमसे भी चार कदम आगे बढ़कर आसुरी नवाचारों का खुला प्रयोग करने लगे हैं, तुम नाराज न होना, हम तुम्हारे ही कामों को आगे बढ़ा रहे हैं। इससे अभी भले ही कुछ न हो पाए, हमें भरोसा है कि भगवान ही कुछ करेंगे अवतार लेकर। अब हमारे बस में कुछ नहीं रहा, हम खुद भी हमारे अपने नहीं रहे, औरों के हाथों की कठपुतलियां बने हुए नचने का धर्म अपना लिया है या परायों के खेतों में बिजूके बन चुपचाप सब सहन करना सीख लिया है। बोलो राम की भी जय – रावण की भी जय।

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