Ancient-Humanगतांक से आगे…..

ये मिनट बढक़र दो हजार वर्ष में एक मास के बराबर हो जाते हैं। परिणाम यह होता है कि हर दो हजार वर्ष में वसंत सम्पात नाक्षत्र वर्ष से एक महीना पीछे हो जाता है। इसी कारण से कृत्तिकाकाल मृगशीर्षकाल और पुनर्वसुकाल से संबंध रखने वाले तीनों पंचांगों का वर्णन किया गया है। जब वसंत सम्पात कृत्तिका में होता था, तब दूसरा महीना था। पर जब वसंतसम्पात मृगशिरा में आया तो दूसरा महीना हो गया। कल्पना करो कि अमुक समय वसंतसम्पात यदि माघ में था, तो दो हजार वर्ष के बाद वह पौष में आएगा और फिर दो हजार वर्ष के बाद मार्गशीर्ष में। इसका कारण ऊपर बतला आये हैं कि नाक्षत्र वर्ष से सायन वर्ष कुछ मिनट छोटा है। दो हजार वर्ष में ये मिनट बढक़र एक महीने के बराबर हो जाते हैं और विषुवत वृत्त के चलने तथा क्रांतिवृत्त के स्थिर होने के कारण वसंतसम्पात उस महीने से खिसक कर उसके पहले महीने में आ जाता है।

तिलक महोदय उक्त कारणों को ध्यान में रखकर वेद और ब्राह्मणों से ऐसे प्रमाण एकत्रित करते हैं, जिससे जाना जाए कि पूर्व काल में हमारा वसंतसम्पात तीन महीनों में रह चुका है। इनमें से पहला कृत्तिकाल है। जिसके लिए आप कहते हैं कि इस समय का वर्णन वेदों में नही है। इसलिए इस विषय पर हमें भी कुछ कहना नही है।

दूसरा मृगशीर्षकाल है जिसके प्रमाणित करने के लिए आपने ब्राह्मणों से कुछ वाक्य उद्धृत किये हैं। ब्राह्मणग्रंथों के होने से इन प्रमाणों के विषय में भी हमें कुछ कहना नही है। हां, परोक्ष रीति से मृगशीर्षकाल को सूचित कराने वाले कुछ प्रमाण ऋग्वेद से दिये गये हैं जिन पर विचार करना हमारे लिए आवश्यक है। यद्यपि कई जगह आपने स्पष्ट रीति से कह दिया है कि ऋग्वेद में वसंतसम्पात को मृगशीर्ष में बताने वाले स्पष्ट प्रमाण नही हैं। तथापि परोक्ष रीति से दिये गये संदेह उत्पन्न करने वाले प्रमाणों को भी जांच लेना चाहिए। हमने बड़े गौर और परिश्रम से उन प्रमाणों को छांट लिया है जो वेदों से दिये गये हैं।

लो. तिलक महोदय कहते हैं कि आकाश में जहां आकाशगंगा है, वहीं पर श्वान नाम दो तारे हैं। तीसरा नौका, चौथा मृगशीर्ष  और पांचवां नमुचि नामी तारा भी है। आप कहते हैं कि यह दृश्य आकाश में बहुत जल्दी दिखता है। किसी समय वर्षारम्भ पर यह समस्त तारासमूह सूर्य के उदयकाल में रहता था और उस समय मृगशीर्ष में वसंतसम्पात होता था। हम कहते हैं कि भले यह दृश्य सूर्योदय के समय वर्षारंभ में रहा हो और भले उसको मृगशीर्ष में वसंतसम्पात  कहा गया हो। किंतु हमें तो यह देखना है कि ऐसी अवस्था का वर्णन वेदों में कहां है। इस मौके पर आकाश गंगा, नौकापुंज मृगशिर, नमुचि और श्वान तारे बतलाये गये हैं। अब देखना चाहिए कि इन पांचों में से कौन सा स्थान मनुष्यों की दृष्टि में प्राय: आता है। हमारी समझ में तो इनमें सबसे प्रसिद्घ चीज आकाश गंगा है, जिसको यहां के लोग के लोग इंद्र के हाथी का रास्ता कहते हैं और अंग्रेज लोग मिल्की वे कहते हैं। यह विचित्र चीज खफीफ बादल सी प्रतीत होती है। अत: इस पर दृष्टि जाना स्वाभाविक है। किंतु श्वान, नौका आदि नक्षत्र तो इतने दबे हुए हैं कि बड़े बड़े  ज्योतिषियों के बतलाने परभी दृष्टि में नही आते। ऐसी सूरत में उन अप्रसिद्घ तारों का वर्णन न होना चाहिए और आकाश गंगा का वर्णन अवश्य होना चाहिए, पर बात सर्वथा उलटी है। आप कहते हैं कि आकाश गंगा का उस समय का कोई नाम देखने में नही आता। पारसी, ग्रीक और भारती इन तीनों आर्यों की भाषाओं में आकाशगंगा का कोई नाम नही है। ऐसी साफ प्रत्यक्ष चीज का ही जब नाम नही है, तो क्या अन्य अप्रसिद्घ ताराओं के साथ वसंतसम्पात का वर्णन आता है? नही वह भी नही आता। नौका तारा का वर्णन है। पर ऐसी किसी स्थान में नही कहा गया कि नौका तारा पर वसंतऋतु का आरंभ होता है या उस स्थान में सूर्योदय होता है।

अब रहे नमुचि, मृगशीर्ष और श्वान। नमुचि कोई तारा नही है, प्रत्युत नमुचि नाम बादल का है तथा इंद्र नाम सूर्य और विद्युत का है। यह सभी जानते हैं कि सूर्य या विद्युत बादलों को छिन्न भिन्न करके पानी बरसाता है। अमरकोश के जिस श्लोक में इंद्र को नमुचिसूदन कहा गया है, वह श्लोक यह है-

सुत्रामा गोत्रभिद्वज्जी वासवो वृत्रहा वृषा।

जम्भभेदी हरिहय: स्वाराण्नमुचिसूदन:।।

इससे सिद्घ होता है कि नमुचि वे बादल हैं, जो प्रहार के बिना नही बरसते। यह सब जानते हैं कि शम्बर बादलों को कहते हैं। पंचतंत्र में आया है कि शम्बरस्य च या माया या माया नमुचेरपि यहां भी नमुचि माया करने वाले बादल ही सिद्घ होते हैं।

मृगशीर्ष शब्द के साथ ऋग्वेद में कहीं भी सूर्य का नाम नही आता प्रत्युत मृग शब्द बादलों के ही लिए आता है। आगे हम वृषाकपि सूक्त की समालोचना में दिखलावेंगे कि मृग बादल अर्थ में किस प्रकार से आता है।

अब केवल श्वान शब्द रह जाता है। हमने ज्योतिषियों से अच्छी तरह जाना है कि आकाश में श्वान नामी दो तारे है। इनको ग्रीक भाषा में क्वान और प्रक्वान कहा गया है। अंग्रेजी में दोनों कनिस मायनर और कनिस मेजर के नाम से प्रसिद्घ है।

क्रमश:

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