भारतीय स्वाधीनता संग्राम के अमर सेनानी राजा नाहर सिंह

images - 2021-12-23T173138.677

बल्लभगढ़ नरेश राजा नाहर सिंह
लेखक :- स्वामी ओमानन्द जी महाराज
पुस्तक :- देश भक्तों के बलिदान

     1857 में भारतीय स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु प्रज्वलित प्रचण्ड समर अग्नि में परवाना बनकर जलने वाले अगणित ज्ञात एवं अज्ञात नौनिहाल शहीदों में बल्लभगढ़ नरेश राजा नाहरसिंह का नाम अत्यन्त महत्वपूर्ण है । दिल्ली की जड़ में अंग्रेजों के विरुद्ध मोर्चा लगाने का श्रेय इसी महावीर को मिला । रणक्षेत्र में उसे पराजित करना असंभव ही था क्योंकि अंग्रेज बल्लभगढ़ को दिल्ली का "पूर्वी लोह द्वार" मानकर उससे भय-त्रस्त रहते थे और बल्लभगढ़ नरेश से युद्ध करने का साहस तक उनमें न था । राजा नाहरसिंह के जीते जी उनको किसी पेन्शन या उत्तराधिकार की भी ऐसी कोई उलझन न थी, जिसके कारण महारानी लक्ष्मी बाई या नाना साहब की भांति उनके व्यक्तिगत स्वार्थों को अंग्रेजों ने कोई धक्का पहुंचाया हो । फिर भी रोटी और लाल फूल का संकेत पाते ही राजा नाहरसिंह देश की स्वतन्त्रता की रक्षार्थ स्वेच्छा से समर अग्नि में कूद पड़े और दिल्ली के पराभव के उपरान्त भी अंग्रेजों से नाक से चना बिनवाते रहे ।

यह थी उनकी निस्पृह देशभक्ति की प्रबल भावना जिससे अंग्रेज चकरा गए और अन्त में छल से सफेद झंडा दिखाकर धोखे से उन्हें दिल्ली लाए और वहां एक रात सोते हुए इस ‘नाहर’ को फिरंगियों ने कायरता पूर्वक जेल के सीखचों में बन्द कर दिया ।

गिरफ्तारी के बाद भी अंग्रेज बराबर यह चेष्टा करते रहे कि नाहरसिंह उनकी मित्रता स्वीकार कर लें, किन्तु वह महावीर तो उस फौलाद का बना था जो टूट सकती है किन्तु झुकना नहीं जानती । परिणामतः अंग्रेजों की मैत्री को अस्वीकार करने के अपराध में राजा नाहरसिंह ने दिल्ली के ऐतिहासिक फव्वारे पर सहर्ष फांसी के तख्ते पर झूल कर जर्जर भारत माता का अपने रक्त से अभिषेक किया और एक महान उद्देश्य की प्राप्ति के मार्ग में वह मरकर भी अमर हो गए ।
महत्वपूर्ण क्यों नहीं ?
यह दूसरी बात है कि विदेशी दासत्व के युग में लिखे गए भारतीय इतिहास ग्रन्थों में भारत के इस अमर नौनिहाल को वह महत्वपूर्ण स्थान नहीं दिया गया है जिसका वह वास्तविक अधिकारी है । पर क्या अब स्वतन्त्र भारत में भी हम इस पिछली भूल को दोहराते रहें ?
कदाचित् राजा नाहरसिंह के इस अमर बलिदान को दो कारणों से अधिक महत्व नहीं मिला । प्रथम तो यह कि बल्लभगढ़ उन रजवाड़ों में सबसे छोटा था जिन्होंने सन 1857 के स्वातन्त्र्य समर में खुल कर भाग लिया और उसमें अपना अस्तित्व ही लीन कर दिया । उगते सूर्य को नमस्कार करने वाली हमारी मनोवृत्ति इस डूबते सूर्य की ओर आकृष्ट नहीं हुई या फिर दूसरा कारण यह था कि राजा नाहरसिंह को फाँसी देने से पूर्व कूटनीतिज्ञ अंग्रेजों ने उन्हें जबरन “नाहर खाँ” प्रचारित करके जनता में एक भ्रम फैला दिया था । हिन्दू धर्मानुसार राजा अवध्य होता है, किन्तु अंग्रेजों के हित में इस राजा का मारा जाना उस समय अनिवार्य था । अस्तु ।

अंग्रेजों ने एक विरोधी शक्ति के रूप में राजनीतिक उद्देश्य से राजा नाहरसिंह के विरुद्ध जो कुछ भी किया, हम यहां उस पर विचार करना नहीं चाहते, क्योंकि स्वयं ब्रिटिश इतिहासकारों ने महाराजा नाहरसिंह का जिस रूप में उल्लेख किया है वही उनके व्यक्तित्व एवं वीरत्व की परख की उत्तम कसौटी है । यदि महाराजा और उनके पूर्वज अद्वितीय वीर, सुयोग्य सैन्य संचालक, चतुर राजनीतिज्ञ तथा प्रजा-वत्सल शासक न होते तो मुगल साम्राज्य की नाक के तले ही यह स्वतन्त्र जाट-राज्य बल्लभगढ़ शान से मस्तक उठाए यों खड़ा न रहता ।

मुगलों से सन्धि

बल्लभगढ़ का यह छोटा सा राज्य दिल्ली से केवल 20 मील दूर ही तो था । मुगल सिंहासन की जड़ में ही एक शक्तिशाली हिन्दू राज्य स्वयं मुगलों को ही कब सहन होता ? इतिहास साक्षी है कि बार बार शाही सेना ने बल्लभगढ़ पर आक्रमण किए । पर बल्लभगढ़ के सुदृढ़ दुर्ग की अजेयता को स्वीकार करके दिल्ली दरबार बल्लभगढ़ नरेशों के साथ मित्रता के स्थायी सम्बंध में बंध गया । नवयुवक राजा नाहरसिंह की यह दूरदर्शिता ही कही जायेगी कि इन्होंने दिन-दूने बढ़ने वाले अंग्रेजी खतरे का सामना करने की दृष्टि से मुगल बादशाह से मित्रता कर ली ।

मित्रता के साथ ही लड़खड़ाते मुगल साम्राज्य का बहुत सा उत्तरदायित्व भी राजा नाहरसिंह ने अपने कन्धों पर संभाला। परिणामतः दिल्ली नगर की सुरक्षा एवं सुव्यवस्था की बागडोर बादशाह ने राजा को दे दी । शाही दरबार में राजा नाहरसिंह को विशेष सम्मान के रूप में ‘सोने की कुर्सी’ मिलती थी और वह भी बादशाह के बिल्कुल समीप ।

इस प्रकार टूटते हुए मुगल साम्राज्य की ढाल के रूप में सम्राट बहादुर शाह के यदि कोई विश्वस्त सहायक थे तो वह राजा नाहरसिंह ही थे । हर संकट में वह दिल्ली की गद्दी की रक्षार्थ तत्पर रहते थे ।

परन्तु समय की गति तो किसी के रोके नहीं रुकती । धीरे-धीरे दिल्ली का तख्त अंग्रेजों के चंगुल में आता गया । यह दशा देखकर राजा नाहरसिंह सशंक हो उठे । उन्होंने रात-दिन दौड़-धूप करके सैन्य संगठन किया और इस योजना की सफलता के लिए यूरोपीय कप्तानों को अपनी सेना में सम्मान पूर्ण पद दिए । श्री पीयरसन को दिल्ली में बल्लभगढ़ राज्य का रेजीडेन्ट नियत किया तथा बल्लभगढ़ की सेना को यथा सम्भव आधुनिक शस्त्रास्त्रों से सुसज्जित किया ।

16 मई 1857 को जब कि दिल्ली फिर से आजाद हुई, राजा नाहरसिंह की सेना दिल्ली की पूर्वी सीमा पर तैनात हुई । शाही सहायता के लिए 15000 रुहेलों की फौज सजाकर मुहम्मद बख्त खां दिल्ली में आ चुका था किन्तु उसने भी पूर्वी मोर्चे की कमान राजा नाहरसिंह पर ही रहने दी । सम्राट बहादुरशाह भी अपनी दाहिनी भुजा नाहरसिंह को ही मानते थे ।

मजबूत मोर्चाबन्दी

अंग्रेजी आधिपत्य से मुक्त राजधानी दिल्ली के 134 दिन के स्वतन्त्र जीवन में राजा नाहरसिंह ने रात दिन परिश्रम करके सुव्यवस्था बनाए रखने तथा मजबूत मोर्चाबन्दी करने का प्रयत्न किया । उन्होंने दिल्ली से बल्लभगढ़ तक फौजी चौकियां तथा गुप्तचरों के दल नियुक्त कर दिए । उनकी इस तैयारी से त्रस्त होकर ही सर जॉन लारेन्स ने पूर्व की ओर से दिल्ली पर आक्रमण करना स्थगित कर दिया । लार्ड केनिंग को लिखे गए एक पत्र में सर जॉन लारेन्स ने लिखा था – “यहां पूर्व और दक्षिण की ओर बल्लभगढ़ के नाहरसिंह की मजबूत मोर्चाबन्दी है और उस सैनिक दीवार को तोड़ना असंभव ही दिख पड़ता है, जब तक कि चीन अथवा इंग्लैंड से हमारी कुमक नहीं आ जाती ।”

यही हुआ भी – 13 सितंबर को जब अंग्रेजी पलटनों ने दिल्ली पर आक्रमण किया तब वह कश्मीरी दरवाजे की ओर से ही किया गया । एक बार जब गोरे शहर में घुस पड़े तब अधिकांश भारतीय सैनिक तितर-बितर होने लगे । बादशाह को भी किला छोड़कर हुमायूं के मकबरे में शरण लेनी पड़ी । इस बिगड़ी परिस्थिति में राजा ने बादशाह से बल्लभगढ़ चलने का आग्रह किया किन्तु इलाही बख्श नामक एक अंग्रेज एजेन्ट के बहकाने से बादशाह ने हुमायूं के मकबरे से आगे बढ़ना अस्वीकार कर दिया ।

राजा नाहरसिंह की बात न मानने का प्रतिफल यह हुआ कि 21 सितंबर को कप्तान हड़सन ने चुपचाप बहादुर शाह को गिरफ्तार कर लिया । फिर भी राजा ने बहादुरी दिखाई और अंग्रेजी फौज को ही घेरे में डाल लिया । खतरे को पहचान कर कप्तान हडसन ने शाहजादों को गोली मार दी और सम्राट को भी मार डालने की धमकी दी । अतः राजा ने सम्राट की प्राण रक्षा की दृष्टि से घेरा बन्दी उठा ली । दिल्ली के तख्त का यह अन्तिम अध्याय था ।

रणबांकुरे नाहरसिंह ने तब भी हिम्मत नहीं हारी । उसने रातों रात पीछे हटकर बल्लभगढ़ के किले में घुसकर नए सिरे से मोर्चा लगाया और आगरे की ओर से दिल्ली को बढ़ने वाली गोरी पलटनों की धज्जियां उड़ाई जाने लगीं । हजारों गोरे बन्दी बना लिये गए और अगणित बल्लभगढ़ के मैदान में धराशायी हुए । कहा जाता है कि बल्लभगढ़ में रक्त की नाली बहने लगी थी जिससे राजकीय तालाब का रंग रक्तिम हो गया था । सम्राट के शाहज़ादों के रक्त का बदला बल्लभगढ़ में ले लिया गया ।
धोखा
परन्तु चालाक अंग्रेजों ने धोखेबाजी से काम लिया और रणक्षेत्र में संधि सूचक सफेद झंडा दिखा दिया । चार घुड़सवार अफसर दिल्ली से बल्लभगढ़ पहुंचे और राजा से निवेदन करने लगे कि सम्राट बहादुरशाह से सन्धि होने वाली है, उसमें आपका उपस्थित होना आवश्यक है । अंग्रेज आपसे मित्रता ही रखना अभीष्ट समझते हैं ।

भोला जाट नरेश अंग्रेजी जाल में फंस गया । उसने अंग्रेजों का विश्वास कर 500 चुने हुए जवानों के साथ दिल्ली की ओर प्रस्थान कर दिया ।

इस प्रकार अंग्रेजी कूटनीति बल्लभगढ़ की स्वतन्त्रता का अभिशाप बनकर राजा नाहरसिंह के सम्मुख उपस्थित हुई । दिल्ली में प्रवेश करते ही छिपी हुई गोरी पलटन ने अचानक राजा नाहरसिंह को बन्दी बना लिया । उनके बहादुर साथियों को मार-काट दिया गया ।
दूसरे ही दिन पूरी शक्ति से अंग्रेजों ने बल्लभगढ़ पर आक्रमण कर दिया । वह सुदृढ़ दुर्ग जिसे अंग्रेज लौह द्वार कहते थे, तीन दिन तोप के गोलों से गले मिलता रहा । राजा ने अपने दुर्ग को गोला-बारूद का केन्द्र बना रखा था । बरसों तक लड़ने की क्षमता थी उस छोटे से किले में । किन्तु बिना सेनापति के आखिर कब तक लड़ा जा सकता था ?

उधर स्वाभिमानी राजा ने अंग्रेजों का मित्र बनने से साफ इनकार कर दिया । उसने कहा – “शत्रुओं को सिर झुकाना मैंने सीखा नहीं है” । 36 वर्षीय राजा की सुन्दर लुभावनी मुखाकृति को देखकर हड़सन ने बड़ा दया भाव दर्शाते हुए समझाया “नाहरसिंह ! मैं तुम्हें अब भी फांसी से बचा सकता हूँ । थोड़ा सा झुक जाओ ।” राजा ने हड़सन की ओर पीठ करते हुए उत्तर दिया – “कह दिया, फिर सुन लो । गोरे मेरे शत्रु हैं, मेरे देश के शत्रु हैं, उनसे क्षमा मैं कदापि नहीं मांग सकता । लाख नाहरसिंह कल पैदा हो जायेंगे ।”
नाहर के उपर्युक्त उत्तर से अंग्रेज बौखला गए । उन्होंने राजा को फांसी देने का निश्चय किया और चांदनी चौक में आधुनिक फव्वारे के निकट, जहां राजा नाहरसिंह का दिल्ली स्थित आवास था, उनको खुले आम फांसी देने की व्यवस्था की गई । दिल्ली की वह जनता जो किसी दिन राजा को शक्ति का देवता मानकर उसे अपनी सुरक्षा और सुव्यवस्था का अधिष्ठाता समझती थी, उदास भाव से गर्दन झुकाए, बड़ी संख्या में अन्तिम दर्शन को उपस्थित थी । उस दिन राजा की 36वीं वर्षगांठ थी जिसे मनाने के लिए वह वीर इस प्रकार फांसी के तख्ते के निकट आया मानो अपनी वर्षगांठ के उपलक्ष में तुलादान की तराजू के निकट आकर खड़ा हुआ हो । राजा के साथ उसके तीन अन्य विश्वस्त साथी और थे – खुशालसिंह, गुलाबसिंह और भूरासिंह । बल्लभगढ़ के ये चार नौनिहाल देशभक्ति के अपराध में साथ-साथ फांसी के तख्ते पर खड़े हुए ।

दिल्ली की जनता निराश्रय भाव से अश्रु इस हृदयविदारक दृश्य को देख रही थी । परन्तु राजा नाहरसिंह के मुखमंडल पर मलिनता का कोई चिन्ह न था, वरन् एक दिव्य तेज शत्रुओं को आशंकित करता हुआ उनके मुख-मंडल पर छाया हुआ था ।
चिंगारी बुझने न देना
अन्त में फांसी की घड़ी आई और हड़सन ने सिर झुका कर राजा से उनकी अन्तिम इच्छा पूछी । राजा ने सतेज स्वर में उत्तर दिया, “तुम से कुछ नहीं मांगना । परन्तु इन भय त्रस्त दर्शकों को मेरा यह सन्देश दो कि जो चिंगारी मैं आप लोगों में छोड़े जा रहा हूं उसे बुझने न देना । देश की इज्जत अब तुम्हारे हाथ है ।”
हड़सन समझ नहीं सका । उसने दुभाषिये की ओर इशारा किया । किन्तु दुभाषिये ने जब उसे राजा की यह इच्छा सुनाई तब वह सन्न रह गया और राजा की इस अन्तिम इच्छा को उपस्थित दर्शकों को कहने में अपनी असमर्थता प्रकट की ।
इस प्रकार राजा नाहरसिंह निस्वार्थ भाव से देश की बलिवेदी पर चढ़कर अमर हो गए । उनका पार्थिव उनके परिवार को नहीं दिया गया । अतः उनके राज पुरोहित ने राजा का पुतला बनाकर, गंगा किनारे अन्तिम संस्कार की रस्म पूरी की ।

Comment:

betbox giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
Betgar güncel
Betgar giriş
Betgar giriş adresi
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
nitrobahis giriş
noktabet giriş
betvole giriş
betvole giriş
betkolik güncel giriş
betkolik güncel
betkolik giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betnano giriş
romabet giriş
yakabet giriş
queenbet giriş
queenbet giriş
betnano giriş
winxbet giriş
betamiral giriş
livebahis giriş
grandpashabet giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betkare giriş
kareasbet giriş
noktabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
nisanbet giriş