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संपादकीय

हाशिम अंसारी और इकबाल के ‘इमामे-हिन्द’ राम

बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के अधिवक्ता रहे 92 वर्षीय हाशिम अंसारी ने पिछले दिनों अचानक अपने आपको रामजन्म भूमि के विवाद से पीछे हटा लिया, और यह घोषणा भी कर दी कि वे रामलला को ‘आजाद’ देखना चाहते हैं। श्री अंसारी पिछले 64 वर्ष से इस प्रकरण से जुड़े रहे हैं। राम जन्म भूमि का प्रकरण यद्यपि इस समय देश के सर्वोच्च न्यायालय में विचारधीन है, और उसके विषय में कुछ भी कहना माननीय न्यायालय की गरिमा के प्रतिकूल होगा। पर हम यह अवश्य कहना चाहेंगे कि अंसारी साहब का ‘रामप्रेम’ ऐसे ही नही जागा होगा। उन जैसा व्यक्ति अवश्य ही कहीं न कहीं तथ्यों से अवगत हो चुका होगा और तभी उनके हृदय से यह बात निकली होगी कि वे अब रामलला को ‘आजाद’ देखना चाहते हैं। कवि इकबाल के शब्दों में कहें, तो वे समझ गये हैं कि-
”इस देश में हुए हैं हजारों मलक सरिश्त
मशहूर जिनके दम से है दुनिया में नामे हिन्द।
है राम के वजूद पे हिन्दोस्तां को नाज
अहले नजर समझते हैं उसको इमामे हिन्द।।”
अब वह ये समझ गये लगते हैं-
”सोई पड़ी हुई है मुद्दत से दिल की बस्ती,
आ हम नया शिवाला (मंदिर) इस देश में बना दें,
दुनिया के तीरथों से ऊंचा हो अपना तीरथ (राम मंदिर)
दामाने आसमां से उसका कलस मिला दें।
हर सुबह उठके गायें मंतर वो मीठे-मीठे
सारे पुजारियों को मय प्रीत की पिला दे।।”
अच्छी बात जब समझ में आ जाए, तभी अच्छा है। हर आने वाला दिन भी हमें यही संदेश देता है कि मैं आपके शेष जीवन का पहला दिन हूं, इसलिए कितना अच्छा हो कि आज से ही सत्य को अपनाकर सुंदर से शिव बनने का प्रयास प्रारंभ कर दिया जाए। यदि ऐसा है तो हाशिम अंसारी निश्चय ही ‘सत्यम् शिवम् सुंदरम्’ के उस गीत को राग रहे हैं जो इस देश की संस्कृति के भव्य भवन की वह आधारशिला है जिसने इस भवन को सुदृढ़ता प्रदान की है। हमें ऐसी भावना का सदा सम्मान करना चाहिए। यद्यपि यह भी सत्य है कि श्री अंसारी के मैदान से हट जाने से वाद की कार्यवाही और प्रक्रिया पर कोई प्रभाव नही पडऩे वाला है। परंतु दो पक्षों को मंदिर-मस्जिद के विवाद में डाले रखकर देश में संशय और संदेह का वातावरण बनाकर जिन लोगों ने अपने निहित स्वार्थ पूर्ण किये या अभी भी कर रहे हैं, उन्हें श्री अंसारी के इस कदम से अवश्य कुछ शिक्षा मिलेगी।
अभी पिछले दिनों श्री अंसारी के वक्तव्य को लेकर एक निजी टी.वी. चैनल ने इस विषय पर एक टीवी चर्चा का आयोजन किया था, जिसमें हिंदू महासभा के प्रवक्ता के रूप में मुझे भी आमंत्रित किया गया। इस में आरजेडी के श्री कौसर खान का प्रस्ताव आ रहा था कि प्रधानमंत्री श्री मोदी और कुछ अन्य राष्ट्रीय नेताओं (जिनमें मुस्लिम एक भी ना हो) का एक पैनल बनाकर इस समस्या का समाधान खोजा जाए। इस पर भाजपा उत्तर प्रदेश की प्रांतीय प्रवक्ता श्रीमती अनिला सिंह और बाबरी एक्शन कमेटी के जफरयाब जिलानी सहित सपा के नेता भी असहमत थे, तब मैंने श्री कौसर से और सपा के नेता से कहा था कि इस समस्या का समाधान ऐतिहासिक तथ्यों एवं साक्ष्यों के आधार पर हो।
यह एक तथ्य है कि हिंदू समाज अपने इस पवित्र स्थल के लिए 1528 ई. से लड़ता चला आ रहा है। इस पवित्र स्थल को लेकर बाबर (1528 ई.) के काल से लेकर अकबर के काल (1556 ई. से) तक 20 युद्घ लड़े गये थे। इतिहासकार कनिंघम का कहना है कि सन 1528 के वर्ष में ही यहां लगभग पौने दो लाख (एक लाख तिहत्तर हजार) हिंदुओं ने अपना बलिदान दे दिया था। इतिहास के जिज्ञासु लोगों को जानकारी है कि बाबर के समय से भी पूर्व सालार मसूद नामक मुस्लिम शासक के विरूद्घ हिंदुत्व के परमोपासक राजा सुहेलदेव ने भयंकर युद्घ इस पवित्र स्थल को लेकर लड़ा था। फैजाबाद गजेटियर से ज्ञात होता है कि सालार मसूद जब मेरठ, फर्रूखाबाद, कन्नौज और लखनऊ की ओर से अयोध्या की ओर बढ़ रहा था तो वह साकेत तक आ पहुंचा था, तब उसे हिन्ंदुत्व के गौरव राजा सुहेलदेव ने सीतापुर तक खदेड़-खदेड़कर मारा था और इस पवित्र स्थल की रक्षा की थी। इतना ही नही तब मसूद के विरूद्घ हमारे संतों ने भी युद्घ किया था। हमारे संतों के आश्रमों में अखाड़ों की व्यवस्था और वहां पर युद्घ प्रवीण युवकों के रहने की परंपरा भी मुस्लिम काल की देन है। वास्तव में अखाड़ों के वीर योद्घा संन्यासी धर्म रक्षक भी होते थे। ‘मीरात-ए-मसूदी’ से हमें ज्ञात होता है किराजा सुहेलदेव के साथ उस समय के 17 राजाओं ने मिलकर एक संघ का निर्माण किया था और एक राष्ट्रीय सेना बनाकर शत्रु का सामना किया था। उस समय देश में क्रांति का वातावरण था।
शेख अब्दुर्रहमान चिश्ती ने इस युद्घ में मिली पराजय पर लिखा है-”इस्लाम के नाम पर जो अंधड़ अयोध्या बहराइच तक जा पहुंचा था, वह सब नष्ट हो गया। इस युद्घ में अरब ईरान के हर घर का चिराग बुझ गया। यही कारण है कि दो सौ वर्षों तक से अधिक समय यहां बुत परस्ती जारी रही। हुनूद (हिंदू) की अमलदारी रही।”
बाबर के समय उसके सेनापति मीर बांकी खां का सहयोग इस पवित्र स्थल पर खड़े राममंदिर को भूमिसात करने में सर्वाधिक रहा। उसने बाबर को एक पत्र लिखा था-”मंदिर को भूमिसात करने के पश्चात उसके ही मलबे और मसाले से जब से मस्जिद का निर्माण आरंभ हुआ है, दीवारें अपने आप गिर जाती हैं। दिन भर में जितनी दीवार बनकर तैयार होती है, शाम को न जाने कैसे गिर पड़ती है। महीनों से यह खेल चल रहा है। अपनी आत्मकथा ‘तुजुके बाबरी’ में बाबर ने स्वयं भी बांकी खां के इस पत्र की पुष्टि पृष्ठ 523 पर की है। यद्यपि बाबर राममंदिर को गिराना नही चाहता था, क्योंकि वह जानता था कि राम के साथ इस देश के लोगों का कितना भावनात्मक और आत्मिक लगाव है। इसलिए इसे भूमिसात करने का अर्थ होगा-पूरे देश में विद्रोह को झेलने के लिए तैयार रहना। पर उसे इस पवित्र राष्ट्रमंदिर को गिराने के लिए मीर बांकी खां और कई मुस्लिम आलिमों ने प्रेरित किया।
तत्कालीन भीटी रियासत के राजा महताब सिंह थे जो उस समय तीर्थ यात्रा पर जाने की तैयारी कर रहे थे। पर जब उन्हें ज्ञात हुआ कि राममंदिर पर अप्रत्याशित आपदा आ गयी है, तो वे तीर्थ यात्रा का विचार त्यागकर अपनी सेना सहित राम मंदिर की सुरक्षार्थ चल दिये थे। राजा के साथ उसकी सेना भी और सेना के अतिरिक्त राम सेवकों ने भी राजा का सहयोग किया था, सबका उद्देश्य एक ही था, चाहे ‘दधीचि परंपरा’ का पालन करना हो और चाहे पृथ्वीराज परंपरा का, पर मंदिर की सुरक्षा हर स्थिति में होनी चाहिए। इस युद्घ में राजा की सेना 80 हजार थी, जबकि बांकी खां की पौने दो लाख की सेना थी। इतिहासकार लिखता है कि बांकी खां की इतनी बड़ी सेना में से तीन चौथाई सेना को समाप्त होना पड़ा था। राजा महताब सिंह 17 दिन तक युद्घ करते-करते बलिदान हो गये थे।
राजा महताब सिंह की भांति ही एक क्रांतिकारी योद्घा था जिसका नाम था देवीदीन पाण्डे। उस देशभक्त ने विदेशी संस्कृति नाशकों के विरूद्घ हुंकार भरी और 70 हजार की सेना तैयार करके (इतनी बड़ी सेना स्वयं सेवकों से ही तैयार की गयी थी, इतिहास में ऐसे क्षण ढूंढऩे कठिन होते हैं, जब इतनी बड़ी संख्या में एक लक्ष्य और एक मन होकर लोग एकत्र हुए हों और संघर्ष कर बलिदान होने के लिए चल दिये हों) लडऩे चल दिया। यह घटना (1528 ई.) की है। स्वयं बाबर ने भी अपनी आत्मकथा में देवीदीन पाण्डे की अद्भुत देशभक्ति और वीरता की प्रशंसा की है। देवीदीन पाण्डे ने मीर बांकी खां को गंभीर रूप से घायल कर दिया था। बांकी खां अपने हाथी से गिरते-गिरते इस ‘आर्यपुत्र’ को तीन गोलियां मारकर हुतात्मा कर गया पर इस ‘अमृत पुत्र’ ने भी बता दिया कि आर्य पुत्र ही अमृत पुत्र होने का अधिकारी हो सकता है।
इसके पश्चात रामजन्म भूमि को लेकर हंसावर के शासक रणविजय सिंह ने अपने गुरू स्वामी महेश्वरानंद ही महाराज की प्रेरणा से युद्घ जारी रखा। उनकी रानी जयराज कुमारी ने तीन हजार महिलाओं की सेना बनाई, स्वामी महेश्वरानंद ने रानी को चौबीस हजार सेना का सहयोग दिया। स्वामी जी ने स्वयं भी युद्घ किया। ये तीनों महान देशभक्त अपनी सेना के साथ हुतात्मा हो गये। उनकी देशभक्ति आज स्तुत्य है। उनका साहस और शौर्य सचमुच भारत के इतिहास का वह उज्ज्वल पक्ष है जिस पर आने वाली पीढिय़ां गर्व करेंगी। युद्घों का यह क्रम यूं ही चलता रहा और 1947 तक आते आते 91 युद्घ रामजन्मभूमि को लेकर लड़े गये। तब इस राष्ट्र मंदिर की रक्षार्थ हिंदू महासभा के श्री गोपाल विशारद ने न्यायालय में केस दायर किया। हम उस केस के तथ्यों या परिस्थितियों पर नही जाएंगे, माननीय सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा का प्रश्न है।
रामजन्म भूमि को लेकर कुछ समय पूर्व लखनऊ के एक मुस्लिम पत्रकार ने भी शाही इमाम से कह दिया था कि वह भूमि हिंदुओं की है और 1528 के अभिलेखों से यह पूर्णत: सिद्घ भी है तो इसे हिंदुओं को क्यों नही दे दिया जाता है। इस पर शाही इमाम ने क्या किया था? इसे सारे देश ने देखा था।
आज हाशिम अंसारी बोल रहे हैं, कल कोई और बोलेगा। मुस्लिम समाज में भी राष्ट्रवादी लोग हैं, उनकी अपनी आवाज है और उस पर लाख पहरे ही सही पर उनकी अंतर्रात्मा बोलेगी और वे ‘बड़े दिल’ वाले बनकर आगे आएंगे। जैसा कि मुस्लिम राष्ट्रवादी मंच की ओर से उक्त टीवी चर्च में उपस्थित रहे। मंच के प्रतिनिधि ने स्पष्ट कहा भी था कि इस भूमि को लेकर विवाद नही होना चाहिए। वहां मंदिर बनने दिया जाए। स्वस्थ चिंतन और स्वस्थ चर्चाएं आगे बढऩी चाहिएं, क्योंकि उनसे ही स्वस्थ समाज का निर्माण होता है। हाशिम अंसारी जी ने उम्र के इस पड़ाव पर आकर राम को ‘इमामे हिन्द’ माना और सत्य को समझा, इसके लिए उनका अभिनंदन।

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