Categories
इतिहास के पन्नों से

महाभारत: एक आधुनिक समाज वैज्ञानिक की दृष्टि

-प्रो. कुसुमलता केडिया
जब मैं 8 या 9 वर्ष की थी तो मुझे टायफाइड हो गया। उस समय घरवालों ने हमारे नगर के एक प्रसिद्ध पंडित जी को बुलाया और 18 दिनों तक उन्होंने महाभारत की कथा के कई अंश कहे। मैं कुछ समझी कुछ नहीं समझी। बाद में, जब मैं 18 वर्ष की हुई तो मैंने जिज्ञासा से महाभारत एवं विष्णु पुराण, भागवत पुराण, वायु पुराण, स्कन्द पुराण, शिव पुराण और देवी भागवत पुराण पढ़ा। संस्कार से मैं सनातनी हिंदू परिवार की एक धर्मनिष्ठ और संस्कारी युवती थी परंतु समस्त शिक्षा-दीक्षा आधुनिक महाविद्यालय में ही हुई, जो एंग्लो क्रिश्चियन शिक्षण परंपरा में भारत में 1947 ईस्वी के बाद शिक्षा के नाम पर पूरे देश में फैलाई गई शिक्षा के केन्द्र हैं। जिसमें राजनीतिशास्त्र, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र ही नहीं, इतिहास भी या तो मुस्लिम स्रोतों के आधार पर पढ़ाने का दावा किया जाता है या यूरोपीय स्रोतों के आधार पर। जीवन और जगत, भारत और विश्व, मानव तथा मानवेतर जगत और मानवों में स्त्री और पुरूष तथा यूरोपीय समाज तथा अन्य समाज आदि विषयों में यूरोप की आधी-अधूरी दृष्टि को ही भारत में पढ़ाया जाता है। इसी आधुनिक शिक्षा में मैं दीक्षित हुई और इसी में स्नातकोत्तर उपाधि के बाद शोध कार्य किया। फिर, 50 वर्ष की अवस्था होने पर मुझे लगा कि कम से कम अपने इतिहास ग्रंथों को मूलरूप में ही पढ़ना चाहिये, अतः मैंने वाल्मीकि रामायण, महाभारत और पुराणों का पुनः अध्ययन परिपक्व आधुनिक दृष्टि से शुरू किया। क्योंकि इतिहास के विषय में यूरोपीय दृष्टि मैं भली-भांति जान चुकी थी और इसीलिये भारतीय दृष्टि को जानना आवश्यक था। भारत सहित विश्व के अनेक देशों में जिन दिनों यूरो-ईसाई शक्तियां फैलीं, उन दिनों अपनी प्रभुता को टिकाऊ बनाने के लिये उन्होंने हर जगह संबंधित समाजों की झूठी छवियां गढ़ी और अपने विषय में भी अतिरंजित प्रचार किया, जो शक्ति और प्रभुता उनके पास आई, उसे कई गुना बढ़ाकर दिखाना उनकी कार्यनीति ही हो गई। इसलिये मैं जानना चाहती थी कि उपनिवेश के काल में भारत में स्वयं के विषय में, देश के विषय में राजनीति के विषय में और अपने आस-पास के विषय में जो छवियां यूरो-ईसाई उपनिवेशवादियों ने दीं, जो इमेज रची, जो इम्प्रेशन्स (चित्त पर प्रभाव) उन्होंने डाले, जो धारणायें फैलाईं, विचार की जो सरणियां रचीं और आरोपित की, उनका भारत के अपने सत्य से और अपने इतिहास से तथा अपने शास्त्रों से कोई संबंध है भी या नहीं। महाभारत पढ़ना शुरू करते ही वे सब छवियां और प्रभाव ध्वस्त होने लगे। पहले ही अध्याय से भारत के विषय में बिल्कुल अलग ही जानकारी मिलनी शुरू हो गई। इसीलिये मैं महाभारत के अपने पाठ और अपने अवलोकन को धीरे-धीरे सम्मुख रखूंगी ताकि हम स्वयं को जान पायें और उन औपनिवेशिक संरचनाओं का झूठ जान पायें जो हमारे लिये उपनिवेशवादियों ने गढ़ी थीं।
आसपास के अनेक आधुनिक शिक्षित लोगों ने मुझे बताया कि घर में महाभारत नहीं रखते क्योंकि उसे रखने से घर में कलह होती है। अगर सारे खंड मंगा लें तो उन्हें अलग-अलग जगह रखना आवश्यक है। यह सब मुझे बहुत अटपटा लगा, क्यांेकि मुझे याद आया कि बचपन में ही घर में गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित महाभारत के सभी खंड थे और वे सब सम्मानपूर्वक एकत्र ही रखे थे। मैंने पुनः गीताप्रेस, गोरखपुर से प्रकाशित सभी खंड मंगाये और पढ़ना शुरू किया। प्रारंभ में ही जब मैंने यह पढ़ा कि महाभारत की रचना श्री वेदव्यास ने की थी, जो स्वयं महाभारत के समय उपस्थित थे और उस समय इतिहास के प्रत्यक्षदर्शी, साक्षी तथा सक्रिय दृष्टा थे, तब मुझे दुबारा पढ़ते समय यह बात नये सिरे से बहुत महत्वपूर्ण लगी। क्योंकि मुझे पता था कि न तो रोम का इतिहास कभी भी उनके समय के किसी व्यक्ति ने लिखा, ना ही ईसा का चरित्र उनके समय के किसी व्यक्ति ने या किसी प्रत्यक्षदर्शी ने लिखा और ना ही मुहम्मद साहब का इतिहास उनके समय में उपस्थित किसी भी व्यक्ति ने लिखा। जबकि रामायण की कथा रचने वाले महर्षि वाल्मीकि स्वयं भगवान राम के समय उपस्थित हैं और महाभारत के रचयिता महर्षि वेदव्यास स्वयं महाभारत के समय उपस्थित हैं। यह तो नितान्त विलक्षण बात है। क्योंकि दुनिया के अभी उपलब्ध इतिहासों में से कोई भी इतिहास उससे जुड़ी घटनाओं के घटित होते समय उपस्थित व्यक्तियों के द्वारा नहीं लिखा गया है। सिवाय भारत में रामायण और महाभारत के। इतनी महत्वपूर्ण बात पर सामान्यतः लोगों का ध्यान नहीं जाता, यह स्वयं में आश्चर्य का विषय है।
महाभारत के आदिपर्व के प्रथम अध्याय में ही कहा है कि महाभारत की तीनों लोकों में एक महान ज्ञान के रूप में प्रतिष्ठा है और शिक्षा-दीक्षा के द्वारा मानों दूसरा जन्म पाने वाले सभी द्विज संक्षेप और विस्तार दोनों ही रूपों में इसका अध्ययन एवं अध्यापन करते-कराते हुये इसे अपने हृदय में धारण करते हैं, यह परम्परा है। यह ग्रंथ विद्वानों को बहुत प्रिय है। यह प्राचीन इतिहास है और यह संहिता पुण्यस्वरूपा है तथा पाप और भय का नाश करने वाली है। यह महाभारत ज्ञान के अंजन से उन सब लोगों की आंखे खोल देता है जो अज्ञान रूपी अंधकार से अंधे हो रहे हैं। यह सूर्य के प्रकाश के समान है और समस्त अज्ञान अधंकार को नष्ट कर देता है। यह इतिहास एक प्रदीप्त दीपक की तरह है जो मोह का अध्ंाकार मिटा कर लोकमानस के अंतरंग चित्त को जो कि अंतरंग गर्भगृह के समान है, अपने ज्ञान के प्रकाश से प्रकाशित कर देता है और धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – इन चारों पुरूषार्थों का ज्ञान कराता है। राजनीतिशास्त्र का ज्ञान कराने के कारण यह महाभारत एक महान अर्थशास्त्र है और धर्म का ज्ञान कराने के कारण यह धर्मशास्त्र है तथा परम पुरूषार्थ का बोध देने वाला यह मोक्षशास्त्र है और सभी वर्णों तथा सभी आश्रमों के लोगों की कामनाओं की धर्ममय पूर्ति का मार्ग बताने के कारण यह महान कामशास्त्र भी है। यह पढ़कर भी मैं विस्मय से भर गई क्योंकि आधुनिक शिक्षा में ‘इॅकानामिक्स’ को अर्थशास्त्र कहकर गलत अनुवाद द्वारा भ्रम फैलाया गया है और कामशास्त्र के नाम से भी उसे केवल नर-नारी के रतिमूलक संबंधों से जुड़ा शास्त्र बता देने का एक चलन चल गया है। महाभारत इन दोनों ही मूढ़ताओं का निवारण करता है।
महाभारत में इसके नित्य पाठ की महिमा प्रतिपादित है और यह भी कहा है कि इसका नित्य पाठ करने से महान फल प्राप्त होते हैं। यह पढ़ते हुये मुझे स्पष्ट हुआ कि ब्रिटिश प्रभाव वाले समय में ब्रिटिश शिक्षा से प्रभावित लोगों ने यह भीषण झूठ क्यों फैलाया कि महाभारत को घर में नहीं रखना चाहिये, क्योंकि वस्तुतः इसके नियमित अध्ययन से लोगों में भय और अज्ञान का नाश होगा तथा जीवन में श्रेष्ठ व्यवहार का ज्ञान प्राप्त होगा और वीर तथा तेजस्वी धर्ममय जीवन जीने का मार्ग दिखेगा। स्वयं ब्रह्मजी ने श्री वेदव्यास जी को यह आशीर्वाद दिया है कि तुम्हारी ब्रह्मवादिनी वाणी काव्य के नाम से प्रसिद्ध होगी।
महाभारत का आदिपर्व पढ़ते हुये सर्वप्रथम तो महर्षि वेदव्यास की आज्ञा के अनुसार नारायण को, नर को अर्थात अर्जुन को और भगवती सरस्वती को प्रणाम करके ही कथा का आरंभ करना चाहिये। इसीलिये परंपरा से प्रारंभ में इन सब को तथा स्वयं वेदव्यास को प्रणाम किया जाता है। पहले और दूसरे ही श्लोक को पढ़ते हुये ही मन विस्मय से भर जाता है और अनेक रोमांचकारी तथ्य सामने आ जाते हैं। सर्वप्रथम तो कहा गया है कि नैमिष अरण्य में यह कथा हो रही है। उस अरण्य में 12 वर्षों तक निरंतर चलने वाला एक ज्ञानसत्र चल रहा है और वहां ऋषि लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा पधारते हैं जिन्हें सभी तपस्वी घेर लेते हैं और उनका अभिवादन स्वीकार करने के बाद दिये गये आसन को ग्रहण कर बैठते हैं। तब कुशलक्षेम के बाद वे उनसे महाभारत की कथा सुनाने का अनुरोध करते हैं।
प्रथम दो श्लोक हैं –
लोमहर्षणपुत्र उग्रश्रवाः सौतिः पौराणिको
नैमिषारण्ये शौनकस्य कुलपतेः द्वादशवार्षिके सत्रे।। 1।।
सुखासीनानभ्यगच्छद् ब्रह्मर्षीन् संशितव्रतान्।
विनयावनतो भूत्वा कदाचित् सूतनन्दनः।।2।।
यहां हर शब्द चौंकाने वाला है। नैमिष एक अरण्य है जहां 12 वर्षों से ज्ञानसत्र चल रहा है। इससे पता चलता है कि अरण्य नगर के समीप ही विद्यमान एक ऐसा विशाल परिसर है जहां बड़ी संख्या में उत्तम और कठोर ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का पालन करने वाले ऋषि और ब्रहर्षि ज्ञान की साधना करते हैं। इस अरण्य के कुलपति महर्षि शौनक हैं। गीताप्रेस में पादटिप्पणी में बताया गया है कि ‘जो विद्वान ब्राह्मण अकेला ही दस सहस्र जिज्ञासु व्यक्तियों का अन्न, दान आदि के द्वारा भरण-पोषण करता है, उसे कुलपति कहते हैं।’ स्पष्ट है कि ऐसे सहस्रों कुलपति तत्कालीन भारत में रहे होंगे। इससे ज्ञान के वैभव का अनुमान होता है।
दस हजार विद्वान वहां विद्या अभ्यास कर रहे थे तो स्पष्ट है कि कम से कम पांच हजार लोग उनके भोजन एवं आवास आदि की व्यवस्थाओं के लिये भी रहे ही होंगे। इस तरह पन्द्रह हजार लोग इस सत्र में 12 वर्ष निरन्तर उपस्थित हैं। यूरोप में मध्यकाल में तो 15000 की आबादी वाले शहर हैं ही नहीं। हेनरी पिरेन की पुस्तक ‘मेडिवल सिटीज’ (प्रिन्सटन, न्यूयार्क 1969, पेपरबैक) में यूरोप के तत्कालीन शहरों का विवरण दिया हुआ है और उनमें से किसी की भी जनसंख्या 15000 नहीं है।
उक्त प्रथम श्लोक में ही ‘12 वर्षीय सत्र’ की बात कही गई है। पादटिप्पणी में बताया गया है कि ‘जो कार्य अनेक व्यक्तियों के सहयोग से किया जाए और जिसमें बहुतों को ज्ञान, सदाचार आदि की शिक्षा तथा अन्न-वस्त्र आदि वस्तुयें दी जाती हों, जो बहुतों के लिये तृप्तिकारक एवं उपयेागी हो, उसे सत्र कहते हैं। बताया गया है कि चारों वर्णों की सहायता और सहभागिता से ही ऐसे सत्र चलते हैं।
इस तरह पहले ही श्लोक में आये हुये तीन पद अरण्य, कुलपति और सत्र बहुत सा अर्थ खोलते हैं। वर्तमान 21वीं शताब्दी ईस्वी में भी ना तो भारत में और ना ही संयुक्त राज्य अमेरिका या रूस या इंग्लैंड या जर्मनी कहीं भी ना तो कोई ऐसा कुलपति है और ना ही 12 वर्षों तक इतने श्रेष्ठ ज्ञानियों को ज्ञान देने वाला निरंतर चल रहा कोई सत्र संभव है और ना ही नगर के पास ही ऐसे कोई अरण्य कहीं हैं। यूरोप में तो वन का अर्थ भय देने वाली जगह ही है, जहां सामान्यतः मानव प्रवेश दुर्गम और कठिन है। समाज के द्वारा दिये गये दान से या दक्षिणा से समृद्ध ऐसे कुलपति भी, जो हजारों विद्वानों को भोजन और वस्त्र तथा दान से सम्मानित करते हुये शिक्षा दे सकें, आज कहीं नहीं हैं।
साथ ही, विस्मय की बात यह है कि ब्रह्मर्षिगण वहां स्वाध्याय के बाद सुखपूर्वक बैठे हैं, तभी वहां लोमहर्षण के पुत्र उग्रश्रवा पधारते हैं। वे सूतकुल को आनन्दित करने वाले हैं। सर्वविदित है कि सूत शूद्रवर्ण है। आधुनिक विद्वान द्रौपदी की इस बात पर ही चीख-पुकार मचाते रहते हैं कि उसने कर्ण से कहा कि मैं सूतपुत्र का वरण नहीं करूंगी। यहां एक अभिजात, सुसंस्कृत विदुषी, तेजस्वी युवती का अपने अनुकूल वर चुनने का अधिकार भी इन आधुनिक विद्वानों के लिये भारत में व्यर्थ हो जाता है क्योंकि उन्हें मुख्य चिन्ता जाति प्रथा के सम्पूर्ण विनाश की है, इतिहास के तथ्य को जानने और बताने की नहीं। द्रौपदी के उतने से कथन के आधार पर उन्हें शूद्रों के विरूद्ध भेदभाव और पक्षपात का महाभारत में अकाट्य प्रमाण मिल जाता है। पंरतु उसी महाभारत के बिलकुल प्रारंभ में एक सूत पुत्र को सभी ब्रह्मर्षि स्वागत के साथ बैठाते हैं और सत्कार करते हैं तथा कुशलक्षेम के बाद उनसे कथा सुनाने कहते हैं, यह इन कथित विद्वानों को नजर नहीं आता है। परंतु सम्पूर्ण महाभारत में बारम्बार इसका प्रमाण उपस्थित है कि सभी वर्णों के लोग विद्या के अधिकारी हैं और अपने ज्ञान तथा तप के लिये पूजित होते हैं तथा ऋषि और ब्रहर्षि की उपाधि भी उन्हें प्राप्त होती है।
सूतपुत्र उग्रश्रवा उन ब्रह्मर्षियों से पूछते हैं कि इस समय आप स्नान, संध्या वन्दन, जप और अग्निहोत्र के बाद शुद्ध होकर अपने-अपने आसन पर विराजमान हैं, मुझे आज्ञा कीजिये कि मैं आप लोगों को भिन्न-भिन्न पुराणों की कथा सुनाऊं अथवा उदारचरित्र महान ऋषियों एवं महात्मा सम्राटों के पवित्र इतिहास सुनाऊं? इस पर ऋषियों ने कहा कि आप तो वह इतिहास ही सुनाईये जिसका वर्णन वेदव्यास जी ने किया है और जो जनमेजय के नागयज्ञ में सुनाई गई कथा है। यह कथा पाप और भय का नाश करती है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि महात्मा शब्द महाभारत में केवल ऋषियों के लिये नहीं आया है अपितु सम्राटों के लिये भी आया है।
इस प्रकार इतिहास का कितना अधिक महत्व हमारे यहां रहा है और कितने प्राचीनकाल से यहां इतिहास लिखा जा रहा है, यह वे अपठित लोग नहीं याद रख पाते जो यूरोपीय ईसाइयों के प्रचार से प्रभावित होकर बिना तथ्यों की जांच किये यह रटते रहते हैं कि यहां वाचिक परंपरा ही प्राचीनकाल में थी। जिसका आशय होता है कि लेखन परंपरा बाद में आई। जबकि तथ्य यह है कि भारत अत्यन्त प्राचीन काल से दुनिया का सबसे बड़ा लिक्खाड़ समाज है। यहां लेखन की प्राचीनतम परंपरा रही है। इतिहास लेखन की भी यहां प्राचीनतम परंपरा है जैसी उपलब्ध साक्ष्यों के अनुसार विश्व में और कहीं नहीं मिलती है।
इस तरह, महाभारत के प्रारंभ के ही दो श्लोक अभी की प्रचारित अनेक असत्य मान्यताओं का झूठ उघाड़ देते हैं। वर्ण व्यवस्था के बारे में, विद्या की परंपरा के बारे में, वैभव के बारे में और अरण्यों की सुव्यवस्था तथा समृद्धि के बारे में एवं ज्ञान के विस्तार के बारे में भारत को लेकर फैलाये गये झूठ प्रथम दो श्लोकों से ही उघड़ जाते हैं और सत्य सामने आ जाता है। जिससे श्री वेदव्यास का यह कथन आरंभ में ही प्रमाणित हो जाता है कि यह इतिहास कथा अज्ञान के अंधकार को नष्ट करने वाला ज्ञानांजन है और लोकमानस के मन में छाये अंधेरे को हटाकर उसे प्रकाशित करने वाला ज्ञान का दीपक है।
✍🏻प्रो. कुसुमलता केडिया

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
kolaybet giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking giriş
meritking güncel giriş
betnano güncel giriş
betnano güncel giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
betpark giriş
meybet giriş
meybet giriş
betnano giriş
meritking giriş
meritking giriş
hititbet giriş
meybet
meybet
orisbet giriş
orisbet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
bettilt giriş
hititbet giriş
bettilt giriş
bettilt giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
vdcasino giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
hititbet giriş
milanobet giriş
hiltonbet giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hiltonbet giriş
milanobet giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betbox giriş
betbox giriş
vaycasino giriş
betbox giriş
betsilin giriş
betsilin giriş
hititbet
hititbet
vaycasino giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş