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दूसरी आकाशगंगाओं पर भी हो सकती है जीवन की उम्मीद


मुकुल व्यास

हमारा ब्रह्मांड अनंत रहस्यों से भरपूर है। वैज्ञानिक एक-एक करके इन रहस्यों का अनावरण करने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ वैज्ञानिक हमारे सौरमंडल से बाहर की दुनिया की छानबीन कर रहे हैं तो कुछ दूसरी आकाशगंगाओं को टटोल रहे हैं। इस खोजबीन के नतीजे दिलचस्प और चौंकाने वाले हैं। खगोल वैज्ञानिकों ने पृथ्वी से करीब 12.8 अरब प्रकाश वर्ष दूर एक विशाल आकाशगंगा में पानी की मौजूदगी के प्रमाण खोजे हैं। यह पहला अवसर है जब ब्रह्मांड में इतनी अधिक दूरी पर पानी पाए जाने के संकेत मिले हैं।

खगोल वैज्ञानिकों के एक दल को दूसरी आकाशगंगा में एक तारे के इर्दगिर्द एक ग्रह के विद्यमान होने के संकेत मिले हैं। अमेरिका में इलिनॉयस विश्वविद्यालय की खगोल वैज्ञानिक श्रीवाणी जरुगुला ने कहा कि विशाल आकाशगंगा में पानी के अलावा कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति का भी पता चला है। उन्होंने कहा कि सुदूर आकाशगंगा में इन दोनों यौगिकों की उपस्थिति यह दर्शाती है कि बिग बैंग अथवा ब्रह्मांडीय विस्फोट से ब्रह्मांड के विस्तार के बाद आणविक जीवन के प्रकट होने में बहुत समय नहीं लगा। ब्रह्मांड की आयु 13.8 अरब वर्ष मानी जाती है।

खगोल वैज्ञानिकों के दूसरे दल को हमारी मिल्की वे आकाशगंगा के बाहर एक तारे के इर्दगिर्द एक ग्रह के अस्तित्व का पता चला है। इस संभावित बाहरी ग्रह की खोज नासा की चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी ने वर्लपूल गैलेक्सी में की है। इस आकाशगंगा को मेसियर 51 भी कहा जाता है। हम अपने सौरमंडल के बाहर किसी तारे की परिक्रमा करने वाले ग्रह को बाहरी ग्रह या एक्सोप्लेनेट कहते हैं।

वैज्ञानिकों द्वारा अभी तक खोजे गए सारे बाहरी ग्रह मिल्की वे आकाशगंगा में विद्यमान हैं। इनमें अधिकांश ग्रह पृथ्वी से करीब 3000 प्रकाश वर्ष के दायरे में हैं। वर्लपूल गैलेक्सी में खोजा गया नया बाहरी ग्रह पृथ्वी से करीब 2.8 करोड़ प्रकाश वर्ष दूर होगा। यानी कि यह ग्रह हमारी आकाशगंगा में मिले ग्रहों से हजारों गुणा अधिक दूर है। अमेरिका में मैसाचुसेट्स स्थित हार्वर्ड-स्मिथसोनियन सेंटर फॉर एस्ट्रोफीजिक्स की खगोल वैज्ञानिक रोजेन डि स्टेफानो ने कहा कि हम एक्स-रे वेवलेंथ पर बाहरी ग्रहों को खोजने की रणनीति अपना रहे हैं। इस रणनीति से दूसरी आकाशगंगाओं में भी ग्रह खोजना मुमकिन है।

डि स्टेफानो ने इस अध्ययन का नेतृत्व किया है। उनके दल ने एक्स-रे बाइनरी सिस्टम से एक्स-रे की चमक में गिरावट की तलाश की। एक्स-रे बाइनरी सिस्टम के तारे एक्स-रे में चमकते हैं। बाइनरी सिस्टम में दो तारे होते हैं। एक्स-रे उस समय उत्पन्न होती है जब इस सिस्टम के एक सामान्य तारे का पदार्थ दूसरे तारे पर गिरता है। इस सिस्टम का दूसरा तारा एक न्यूट्रॉन तारा या ब्लैक होल होता है। न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल की उत्पत्ति सुपरनोवा से होती है। मरणासन्न तारे में प्रचंड विस्फोट को सुपरनोवा कहते हैं। ब्लैकहोल और न्यूट्रॉन तारे ब्रह्मांड के सबसे सघन पदार्थ हैं। न्यूट्रॉन तारा न्यूट्रॉन कणों से भरपूर होता है। इसकी उत्पत्ति उस समय होती है जब एक विशाल तारा अपना ईंधन खत्म होने के बाद खुद अपने ऊपर ढह जाता है।

नए अध्ययन में शामिल शोधकर्ताओं के अनुसार एक्स-रे की चमक उत्पन्न करने वाला क्षेत्र छोटा होता है। यदि कोई ग्रह वहां से गुजरता है तो उसे आसानी से खोजा जा सकता है क्योंकि वह सारी या अधिकांश एक्स-रे को अवरुद्ध कर देगा। इस विधि से अंतरिक्ष में लंबी दूरियों पर भी बाहरी ग्रह खोजे जा सकते हैं। बहरहाल दूसरी आकाशगंगा में बाहरी ग्रह की खोज की पुष्टि के लिए शोधकर्ताओं को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ेगा। बहुत बड़ी कक्षा होने के कारण इस ग्रह को अपने बाइनरी तारे के समक्ष गुजरने में 70 वर्ष लगेंगे।

इसका अर्थ यह हुआ कि इस ग्रह की पुष्टि करने में कई दशक लग जाएंगे। यह अध्ययन नेचर एस्ट्रोनॉमी पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ता अब दूसरी आकाशगंगाओं में नए संभावित ग्रहों की खोजबीन के लिए चंद्र एक्स-रे ऑब्जर्वेटरी और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के एक्सएमएम-न्यूटन उपग्रह द्वारा एकत्र आंकड़ों की छानबीन करेंगे। शोधकर्ता इस विधि से हमारी मिल्की वे आकाशगंगा में भी नए बाहरी ग्रहों की तलाश के लिए एक्स-रे स्रोतों में ग्रहों के पारगमन की खोज करेंगे। चंद्र ऑब्जर्वेटरी के पास करीब 20 आकाशगंगाओं के आंकड़े हैं। ध्यान रहे कि इस अंतरिक्ष दूरबीन को 1999 में कोलंबिया स्पेस शटल द्वारा अंतरिक्ष में स्थापित किया गया था।

इस बीच, खगोल वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ग्रह खोजा हैं जहां आसमान से लोहा बारिश की तरह गिरता है। इस बाहरी ग्रह का नाम वास्प 76बी है। यह ग्रह गर्म बृहस्पतियों की श्रेणी में आता हैं। ऐसे ग्रहों को ‘हॉट जुपिटर’ भी कहते हैं। अपने मेजबान तारों के बहुत नजदीक होने की वजह से इनका तापमान बहुत ज्यादा होता है। वास्प 76बी ग्रह आग की भट्टी की तरह है। इसकी सतह इतनी आग उगलती है कि लोहा वाष्प बन कर उड़ जाता है। यह वाष्प ग्रह के रात वाले हिस्से में ठंडी हो कर बारिश की तरह गिरने लगती है।

वैज्ञानिकों के एक अंतरराष्ट्रीय दल ने इस ग्रह पर मुक्त कैल्शियम की उपस्थिति का पता लगाया है, जिससे संकेत मिलता है कि वहां वायुमंडलीय तापमान पहले लगाए गए अनुमानों से कहीं बहुत अधिक है। यह खोज हवाई में मौना किया पर्वत की चोटी के निकट तैनात जैमिनी नॉर्थ टेलीस्कोप द्वारा एकत्र आंकड़ों के आधार पर की गई। वास्प 76बी ग्रह की खोज 2016 में हुई थी। यह पृथ्वी से 640 प्रकाश वर्ष दूर है। यह विशाल ग्रह अपने मेजबान तारे के इतना ज्यादा करीब है कि इसे अपने तारे का चक्कर पूरा करने में सिर्फ 1.8 दिन लगते हैं। इसका तारा एफ श्रेणी का तारा है जो हमारे सूरज से थोड़ा सा ज्यादा गर्म है।

इस अध्ययन में शामिल अमेरिका के कॉर्नवेल विश्वविद्यालय के खगोल वैज्ञानिक रे जयवर्धन और हेरॉल्ड टैनर ने कहा कि जैसे-जैसे हम विविध द्रव्यमानों और तापमानों वाले बाहरी ग्रहों का दूर-संवेदी अध्ययन करेंगे, वैसे-वैसे हम बाहरी ग्रहों की विविधता की एक संपूर्ण तस्वीर विकसित कर सकेंगे। इन विविध ग्रहों में लोहे की बारिश वाले गर्म ग्रहों से लेकर मध्यम जलवायु वाले ग्रह शामिल हैं। कुछ ग्रह बृहस्पति की तरह भारी भरकम हैं जबकि कुछ पृथ्वी से ज्यादा बड़े नहीं हैं। इस समय उपलब्ध टेलीस्कोपों और उपकरणों की मदद से हमें बाहरी ग्रहों के वायुमंडलों के बारे में बहुत कुछ जानकारी मिल चुकी है।

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