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आओ कुछ जाने

*अक्ल की नकल के लिए मिला भौतिकी का नोबेल*

लेखक आर्य सागर खारी 🖋️।

आज स्वीडेन में वर्ष 2024 के भौतिक शास्त्र के नोबेल पुरस्कार की घोषणा हो गई । जॉन हॉपफील्ड और ज्योफ्री हिंटन को यह पुरस्कार मिला है । यह दोनों वैज्ञानिक वर्ष 1980 से आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क अर्थात आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काम कर रहे थे। वैज्ञानिक बिरादरी में इन दोनों को एआई का गॉडफादर कहा जाता है।

यूं तो यह दोनों भौतिक शास्त्री थे लेकिन इन्होंने इंसानी मस्तिष्क को समझने के लिए न्यूरो साइंस के विशेषज्ञो के बहुत से शोध कार्य साइंटिफिक लिटरेचर को पढ़ा।

इंसानी मस्तिष्क दुनिया की सबसे जटिल मशीन है ब्रिटिश भौतिक शास्त्री रोजर पेनरोज ने इसे मांस से बना कंप्यूटर कहा था। मानव मस्तिष्क समस्त जीवधारियों में सर्वाधिक उन्नत है यह 100 अरब न्यूरॉन्स कोशिकाओं से मिलकर बना है प्रत्येक कोशिका न्यूरॉन्स 10000 कोशिकाओं से कनेक्ट रहती है जो सर्वाधिक जटिल नेटवर्क बनाती है। दिमाग के सोचने विचारने प्रत्येक प्रकार की अनुभूति के लिए सुगंध दुर्गंध या मनोरम या विभत्स दृश्य को देखने के दौरान न्यूरॉन्स का खास नेटवर्क एक दूसरे से मजबूत संबंध बनाता है साथ ही इसके विपरीत न्यूरोन्स का एक नेटवर्क कमजोर पड़ जाता है जो जो विषय फिफ्थ सेंस इंद्रिय मन आदि के माध्यम से मस्तिष्क को मिलता है उस विषय से संबंधित न्यूरोन मजबूत नेटवर्क बनाते हैं।

इंसानी मस्तिष्क के इसी न्यूरल नेटवर्क को समझते हुए इन दोनों भौतिक शास्त्रियों ने भौतिक शास्त्र की सांख्यिकीय भौतिकी के सिद्धांतों का प्रयोग मशीन लर्निंग के लिए किया।

अपने इलेक्ट्रॉनिक कृत्रिम मस्तिष्क में उन्होंने न्यूरॉन्स के स्थान पर नोड्स को स्थापित किया प्रत्येक नोडस को खास गणितीय संख्या की वैल्यू दी फिर इंसानी मस्तिष्क की मिमिक्री करते हुए उन नोडस को किसी विषय पर प्रतिक्रिया देने के लिए सीखने स्मरण करने के लिए प्रशिक्षित किया गया। यहां इसका यह कदापि नही लेना चाहिए कि उन्होंने किसी चेतना को विकसित कर दिया आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस में कोई भी मशीन आज तक सोच नहीं सकती हां लेकिन मशीन इंसानों की तरह सीख व स्मरण जरूर कर सकती है।

कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क में इतना अंतर है कंप्यूटर सॉफ्टवेयर को जितना बताया जाएगा वह उतना ही कार्य करेगा कंप्यूटर सॉफ्टवेयर एक रेसिपी की तरह काम करता है जहां पानी नींबू चीनी अआपने दे दिया तो वह शिकंजी बना देगा उससे अलग वह कुछ नहीं करेगा लेकिन आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क या मशीन लर्निंग इससे अधिक विकसित चरण है इसमें कोई आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क अपने पास उपस्थित सूचनाओं में से भी सूचनाओं को खंगाल सकता है सूचनाओं में छुपे पैटर्न को पहचान सकता है भविष्य में उसे प्रस्तुत कर सकता है ।

इन दो वैज्ञानिकों में से एक ज्योफ्री हिटन ने गूगल की एआई लैब में काम किया था वहां इन्होंने पूरी दुनिया को चोकाते हुए यह कहते हुए इस्तीफा दिया था कि—“AI मानवता के लिए खतरा है”।

इतना ही नही उन्होंने न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए इंटरव्यू में कहा था-

“AI से बड़ी संख्या में नौकरियां खत्म हो जाएंगी। समाज में गलत सूचनाएं तेजी से फैलेंगी, जिसे रोक पाना संभव नहीं होगा।जैफ्री ने AI के लिए खुद को जिम्मेदार मानते हुए अफसोस जताया था”।

यह सब कुछ कितना विरोधाभासी है। आज पुरस्कारों की घोषणा करते समय नोबेल कमेटी ने भी यह चिंता व्यक्त की है एआई मानवीय नैतिकता के लिए भिन्न किस्म का खतरा है।

दुनिया में इंसान ने प्रत्येक चीज का दुरुपयोग व सदुपयोग किया है।एआई मशीन लर्निंग का सदुपयोग खुद वैज्ञानिकों ने भौतिक शास्त्र में किया है जिस भौतिक शास्त्र के सिद्धांतों का सहारा लेकर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का भवन खड़ा हुआ है वही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज भौतिक शास्त्र के बहुत से प्रयोग में सटीक सार्थक शीघ्र गणना करने में सहयोगी बना है। चाहे सर्न की प्रयोगशाला में हिग्स बोसोन के आंकड़े का विश्लेषण हो उसमें मशीन लर्निंग का प्रयोग हुआ है। अंतरिक्ष की गुरुत्वीय तरंगों के सटीक मापन में भी इस तकनीक का प्रयोग हुआ है। विज्ञान से विकसित तकनीक विज्ञान को ही पुष्ट कर रही है ,यह एक सुखद पक्ष है।

इन वैज्ञानिकों का परिश्रम सराहनीय है। बहरहाल स्थिति कुछ भी हो हम मनुष्य के लिए संतोष दायक बात यह है मशीन लर्निंग या आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसी तकनीक कभी भी सोचने की क्षमता विकसित नहीं कर पाएगी यह कोई अति विश्वास में भरा हुआ कथन नहीं है खुद यह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के शीर्ष वैज्ञानिकों की आम सहमति स्वीकारोक्ति है।

जिस मेमोरी के आधार पर मशीन लर्निंग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस विकसित हुआ है यह चेतन आत्मा का भी एक मुख्य गुण धर्म है । गौतम ऋषि के न्याय दर्शन में इसे प्रातभिज्ञा कहा गया है। वहां इसे ऐसे समझाया गया है आपने अतीत में किसी आम को खाया जिव्हा ने उसका स्वाद लिया कालांतर में आम के किसी बाग में आपकी आंखों ने पक्के हुए आम के दर्शन किए आम के दर्शन मात्र से आपके मुंह में पानी आ गया आम के देखने से मुंह में पानी कैसे आया उससे यह निष्कर्ष निकाला गया है कोई ऐसा आत्मा तत्व है जो जिव्हा में आंख दोनों के ही विषयों ग्रहण करता है उसका सेवक हमारा मन एसोसिएटिव मेमोरी विकसित कर लेता है।

इसी दार्शनिक सिद्धांत का प्रयोग करते हुए इन दोनों वैज्ञानिकों ने मशीन लर्निंग में आर्टिफिशियल न्यूरल नेटवर्क बनाया। यह विषय अलग है कि भौतिक शास्त्री आत्मा के स्थान पर तंत्रिका तंत्र को लाकर बिठा देते हैं।

जय विज्ञान ,जय दर्शन।

लेखक आर्य सागर खारी

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