लाल बहादुर शास्त्री की हत्या का प्रश्न

shashtri jiपूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री को ताशकंद में जाकर हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने श्रद्घांजलि अर्पित की है। जब वह यह कार्य कर रहे थे तो टी.वी. चैनलों के माध्यम से उन्हें देखने वाले करोड़ों भारतीयों को गौरवानुभूति हो रही थी। बहुत ही अच्छा लग रहा था।

अब पूर्व प्रधानमंत्री के पुत्र सुनील शास्त्री ने उनकी 11 जनवरी 1966 को ताशकंद में हुई मृत्यु को ‘हत्या’ कहकर एक नई बात सामने ला दी है। वैसे ‘हत्या’ के विषय में कई लोगों ने पूर्व में भी आशंकाएं व्यक्त की हैं।

डा. विद्याप्रकाश ने अपनी पुस्तक ‘शांतिदूत लालबहादुर शास्त्री’ में उन आशंकाओं को बड़े मर्यादित शब्दों में प्रकट करने का प्रयास किया है। उनके अनुसार शास्त्री जी ताशकंद के जिस भवन में टिके थे, उसमें 10 जनवरी की रात को भोजन लेने के उपरांत वह थोड़ा टहल रहे थे, कड़ाके की ठंड पड़ रही थी, तापमान शून्य से 12 डिग्री नीचे था। शास्त्री जी का निजी सचिव उनसे टोपी पहनने का निवेदन करता है, क्योंकि कोई छायाकार उनसे मिलने आने वाला था। शास्त्रीजी ने थोड़ा खीजकर कहा था कि ‘फोटो की क्या आवश्यकता है’? फिर भी फोटो खींचने का कार्य पूर्ण हुआ।

इसी समय उनका रसोइया जान मोहम्मद चुपके से शास्त्री जी का दूध का गिलास रख गया। जबकि शास्त्री जी के लिए रात्रि का दूध आदि देने का कार्य उनके निजी रसोइए का होता था। कमरे में उपस्थित लोग फोटो कराने में व्यस्त थे और जान मौहम्मद उसी व्यस्तता में अपना कार्य कर गया।

शास्त्रीजी पूर्णत: शाकाहारी थे। उनके साथ मांसाहारी जान मौहम्मद को रखने वाले लोग कौन थे? और जान मौहम्मद ने शास्त्री जी के लिए रात्रि का दूध उसी समय उनकी मेज पर क्यों रखा जिस समय अन्य लोगों के साथ वह फोटो करा रहे थे? इसके अतिरिक्त दूध का गिलास अकेले शास्त्रीजी के लिए ही क्यों आया? ये सारे प्रश्न अनुत्तरित ही रह गये। किसी ने भी इनकी ओर ध्यान नही दिया था।

जिस समय लालबहादुर शास्त्री ताशकंद गये थे, उस समय मास्को में भारत के राजदूत टी.एन. कौल थे, वे नेहरू परिवार के बहुत निकट थे। श्रीमति गांधी ने बाद में उन्हें अपने अत्यंत विश्वसनीय लोगों में स्थान दिया था। जब शास्त्री जी ताशकंद के लिए नई दिल्ली से जाने की तैयारी कर रहे थे, तभी से टी.एन.कौल को ताशकंद प्रवास के समय उनके रहने-सहने की सारी व्यवस्था देखने का दायित्व सौंप दिया गया था। जब शास्त्री जी ताशकंद जाने के लिए तैयार थे, तब उनके जाने से पूर्व सी.बी.आई के एक उपनिदेशक (जो कि बंगाली थे) ने नई दिल्ली के लिए अपनी रिपोर्ट भेजी थी कि टी.एन.कौल ने मास्को में शास्त्रीजी के प्रवास स्थल में अचानक परिवर्तन कर दिया था।

जब शास्त्रीजी की कथित मृत्यु का समाचार रूस के प्रधानमंत्री कोसीगिन को मिला तो वह तुरंत दौडक़र उनके प्रवास स्थल पर पहुंचने वाले प्रथम व्यक्ति थे। कोसीगिन की सहृदयता की सभी लोगों ने प्रशंसा की है। वह शास्त्रीजी का बड़ा सम्मान करते थे। उनके लिए यह घटना अत्यंत दु:खद और लज्जास्पद थी कि उनका एक मित्र और विदेशी अतिथि उनकी भूमि पर प्राण त्याग दे। इसलिए कोसीगिन ने अपने चिकित्सकों की टीम को जो निर्देश दिया और चिकित्सकों ने जो उन्हें उत्तर दिया वह भी शास्त्री जी ‘हत्या’ को स्पष्टï करता है।

कोडेसिया नामक लेखक ने लिखा है-‘‘शास्त्रीजी के निधन के पश्चात वहां पहुंचने वालों में रूस के प्रधानमंत्री श्री कोसीगिन प्रथम व्यक्ति थे। आते ही उन्होंने डॉक्टरों से कहा था-‘‘हमारे किसी व्यक्ति का दिल निकालकर उनके शरीर में लगा दो। एक मिनट के लिए मैं इन्हें जीवित देखना चाहता हूं। अगर आपने ऐसा कर दिखाया तो वैज्ञानिक जगत में आप भी प्रसिद्घि प्राप्त कर लेंगे, आपका भी सम्मान बढ़ेगा।’’

वहां पर उपस्थित एक महिला चिकित्सक जो वहां की इंचार्ज थी, ने कोसीगिन से तुरंत कहा-‘‘सर यह संभव है, बशर्ते इनकी मृत्यु दिल के दौरे से हुई होगी। हमें आशंका है कि इनकी मृत्यु के पीछे किसी का हाथ है। इसे दिल का दौरा तो किसी भी हालत में नही कहा जा सकता।’’

शास्त्रीजी की अंतिम यात्रा से पूर्व जब उनके निकटवर्ती लोग पार्थिव शरीर को नहला धुला रहे थे, तब देखा गया था कि शास्त्रीजी की गर्दन के पीछे एक स्थान पर खून की नली को काटकर प्लास्टर से चिपकाया हुआ था। इसके बावजूद वहां से काफी खून रिस गया था। जिससे उनका कपड़ा भीग चुका था। इतना ही नही, उनके उदर में भी लगभग चार इंच का एक घाव सा था, जिससे बहे खून से कपड़ा गीला हो गया था। यह देखकर वे निकटवर्ती लोग सकते में आ गये।  उन लोगों ने तत्काल गुलजारीलाल नंदा को वह सरदार स्वर्णसिंह को यह बात बताई तथा शास्त्रीजी का ‘पोस्टमार्टम’ करवाने का अनुरोध किया था। मगर उन दोनों ने इस अनुरोध को यह कहकर अमान्य कर दिया था कि अभी ये सब करने से नाहक एक विवाद खड़ा हो जाएगा।

इस प्रकार शास्त्री जी के साथ उनकी चिता में उनकी कथित हत्या की कहानी और उसके साथ खड़े कई प्रश्न धू-धू करके जल गये। आज सुनील शास्त्री अपने पिता की कथित हत्या का प्रश्न उठा रहे हैं, तो उनकी बात में बल है, उनकी पीड़ा अकेले की नही है। इस देश के कोटिजन आज भी शास्त्रीजी का सम्मान करते हैं, इसलिए नेहरू परिवार के ‘उपकारों’ से पर्दा उठना ही चाहिए, नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पश्चात शास्त्री जी देश में बहुत सम्मानित व्यक्तित्व हैं। जिनके प्रति अपने ‘कत्र्तव्य का निर्वाह’ प्रधानमंत्री मोदी को करना ही चाहिए।

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