जब चित्त चैतन्य से जुड़ता है

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जब चित्त चैतन्य से जुड़ता है

चित्त जुड़े चैतन्य से,
भासै दिव्य – प्रकाश।
वाणी और व्यवहार में,
ऋजुता भरी मिठास॥1613॥

व्याख्या:- ध्यान देने वाली विशेष बात यह है कि जो जितना जड़ता (अज्ञान और अहंकार) में है वह उतना ही चैतन्य (परमपिता परमात्मा) से दूर है। प्रभु कृपा से यदि किसी के चित्त की सायुज्यता परमपिता परमात्मा के साथ बनी हुई है, उसका चित्त परमपिता परमात्मा में रमण करता है,उससे ऊर्जान्वित होता है, सदैव बह्मभाव में रहता है,तो उसमें दैवीय गुण (ईश्वरीय गुण) भासने लगते हैं।उसका आभामण्डल दिव्य प्रकाश से आलोकित होता है।उसका आध्यात्मिक तेजपुँज लोगों के मानस-पटल पर चिरस्थायी प्रभाव डालता है।ऐसे सत्पुरुष युगप्रवर्तक कहलाते हैं, जैसे ‘महर्षि देवदयानन्द सरस्वती’, ‘गुरु नानक देव’ इत्यादि।प्रभु से सायुज्यता होने के कारण ऐसे सत्पुरुष पुण्यशील आत्मा होते हैं, जो प्रभु-प्रदत अप्रतिम प्रतिभा के धनी होते हैं, विलक्षण होते हैं। संसार में महान – कार्यों के जनक होते हैं, सर्जक होते हैं।
याद रखो, आत्मा परमात्मा का अंश है, जो आनन्दांश है,जबकि परमात्मा आनन्द का विराट सागर है। जिसमें मिठास ही मिठास है। इस विराट आनन्द के सागर से अवर्चनीय मिठास का रसास्वादन वही करते हैं, जिनकी परमपिता परमात्मा से निरंतर सायुज्यता होती है।काश!यह मिठास हमारे जीवन में भी आ जाय।यदि ऐसा हो जाए तो,वाणी-वाणी नहीं रहती,वाक बन जाती है, कोयल की वाणी तरह रसीली, गण्या, प्रशस्या और प्रभावी बन जाती है, ओजस्वी बन जाती है। टूटे दिलों को जोड़ने वाली बन जाती है, प्राणी मात्र को एकता के सूत्र में पिरोने वाली बन जाती है, यहां तक कि परमपिता परमात्मा को रिझाने वाली बन जाती है। वाणी व्यवहार का आधार होती है।इसमें मिठास ठगों अथवा धोखेबाज, बेईमान, छलिया, कपटी, विश्वासघाती जैसी नहीं अपितु ऋजुता (सरलता, कुटिलतारहित) से भरी होनी चाहिए।जब यह मिठास कर्म के धरातल पर उतरती है, तो व्यक्ति का व्यवहार सामान्य व्यक्ति के लिए जीवनादर्श बन जाती हैं।
जब ॠजुता भारी मिठास – जब दृष्टि में उतरती है,तो दृष्टि कृपा- दृष्टि बन जाती है तो दृष्टि कृपा- दृष्टि बन जाती है,जब यह मिठास हाथों में उतरती है, तो यह सेवा बन जाती है। यहां तक कि मानवता का ही नहीं अपितु प्राणीमात्र का कल्याण करने वाली शक्ति बन जाती है। जब यह मिठास बुद्धि में उतरती है, तो बुद्धि मेधा बन जाती है, पुण्य मे रत रहने वाली प्रज्ञा बन जाती है। जो परमपिता परमात्मा की सत्प्रेरणाओं से प्रेरित होने वाली और मनुष्य को महानता की ओर ले जाने वाली ऋतम्भरा बन जाती है।जो मन मस्तिष्क का अज्ञान और अहंकर समाप्त कर धरती की प्यास बुझाने के लिए झुककर बरसने वाली बदली बन जाती है। ऐसी शख्सियत बन जाती है जो अपना नाम इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित कर जाती है।
यह मिठास यदि मन में उतरती है, तो राग और द्वेष के भयंकर दुष्परिणामों से बचाती है, मन को समता में रखती है, मन को निर्विकारिता में रखती है, उसे शान्ति, प्रेम, आनन्द से ओत-प्रोत रखती है। यह मिठास जब अहंकार में उतरती है, तो उसे गला देती है फलस्वरूप व्यक्ति के व्यक्तित्व में अहंकारशून्यता आती है,विनम्रता आती है, आर्जवता (सरलता) आती है जिसके कारण यह शिष्टता की लघुता मनुष्य को प्रभुता प्राप्त कराती है, उसे प्रभु- कृपा का पात्र बनाती है।
क्रमशः

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