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इतिहास के पन्नों से हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

गुरु पर्व और देव दीपावली का रहस्य

आज हम अपने साथियों को देव दीपावली की  हृदय से शुभकामनाएं प्रेषित करते हैं। आज  ही सिक्खों के प्रथम गुरु नानक जी का प्रकटउत्सव है। निश्चित रूप से गुरु नानक देव जी पूरे हिंदू समाज के लिए गौरव प्रदान करने वाले हैं। क्योंकि उनके शिष्यों ने आगे चलकर धर्म की रक्षा के लिए अप्रतिम कार्य किया। उनके उस अप्रतिम योगदान को इतिहास कभी भुला नहीं सकता । संपूर्ण हिंदू समाज जिसमें सिख समाज भी सम्मिलित है, अपने गुरु और उसके शिष्यों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता है।
अब प्रश्न उठता है कि क्या है देव दीपावली?

महाभारत के युद्ध के पश्चात जब युधिष्ठिर नेम राज्य सिंहासन प्राप्त करने से इंकार कर दिया और कह दिया कि जितने भर भी लोग इस युद्ध में मरे हैं उन सब की मृत्यु के पाप का भागी मैं हूं, इसलिए मैं अब राज नहीं करूंगा ।तब हस्तिनापुर जाकर श्री कृष्ण जी ने उन्हें परामर्श दिया कि  युद्ध में जितने योद्धा, विद्वान, प्रकांड पंडित, अपनी अपनी कलाओं के धुरंधर , योगी,और पुरोधा वीरगति को प्राप्त हुए हैं, उन सबकी आत्मा की शांति के लिए गंगा के किनारे  वन में जाकर के शांत और एकांत स्थान पर शांति यज्ञ करना चाहिए। श्री कृष्ण जी के इस विचार का समर्थन वेदव्यास जी ने भी किया । तब युधिष्ठिर ने कहा कि इस बड़े आयोजन के लिए वह अपने राजकोष से कोई भी धन देने की स्थिति में नहीं है और जनता पर वह किसी भी प्रकार का कर नहीं लगाएंगे। इस पर वेदव्यास ने उन्हें बताया कि हिमालय के अमुक स्थान पर अमुक राजा का खजाना दबा हुआ है , यदि उसको वहां से मंगवा लिया जाए तो आपका काम आसान हो जाएगा। तब ऐसा ही पुरुषार्थ किया गया।
ऐसे बहुत बड़े जन समुदाय की आत्मा की शांति के लिए जिस स्थान को चुना गया था और जहां पर यज्ञ का आयोजन किया गया था, वह आज का गढ़मुक्तेश्वर रहा है।
यह स्थान जो  गढ मुक्तेश्वर कहा जाता है ,उस समय इसको  गण -मुक्तेश्वर कहा गया था। क्योंकि गण अर्थात समुदाय,समूह के मुक्त होने की ईश्वर से प्रार्थना की गई थी।
जब राजा युधिष्ठिर अपने राजसी ठाट – बाट के साथ सभी भाई बहनों , संबंधियों, श्री कृष्ण जी के साथ अपने अंग रक्षकों, सेनापतियों के साथ यहां पर आए थे तो कई दिन तक यज्ञ का आयोजन चलता रहा था।
यहां पर उनके शिविरों में जो दीप जलाए गए थे वह दीपावली की तरह गंगा किनारे पानी में दिखाई देते थे।धीरे-धीरे समय गुजरता गया और यह एक प्रथा के रूप में कार्तिक माह की पूर्णमासी को प्रत्येक वर्ष मनाया जाने लगा और एक रूढी के रूप में प्रचलित हुआ। उस समय जलते हुए दीपों को सुदूरस्थ लोगों ने ऐसा मानकर सम्मान दिया था कि यह मरने वाले लोगों की आत्मा की शांति के लिए जलाए जा रहे हैं। तब से इस पर्व पर उस स्थान पर जा कर दीये देने की परंपरा भी रूढ हो गई। जिससे लोग यह मानने लगे कि 1 वर्ष के अंतराल में जो भी लोग उनके परिवार से गए हैं यहां जा कर दीये देने से उनकी भी आत्मा को शांति मिलेगी।
तत्कालीन राजा एवं श्री कृष्ण जी के द्वारा यज्ञ करने के उपरांत जनसाधारण भी यह मानने लगा तथा उसको विश्वास करने लगा कि जब राजा युधिष्ठिर श्री कृष्ण जी के साथ यहां पर आत्माओं की शांति के लिए आ सकते हैं तो यह मृतक की आत्मा की शांति के लिए दीपक जलाने के बाद एक महत्वपूर्ण स्थान होना समझा गया।
आज इसी को लोग देव दीपावली कहते हैं।जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रूढी एवं गलत परंपरा है,  जो आज समाज में प्रचलित है। इस प्रकार से दीपक जलाने से मृतक आत्मा को शांति नहीं मिलती है। मृतक आत्मा को शांति उसके कर्मों के अनुसार ही प्राप्त होती है।
प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कर्म प्रधान है, क्योंकि कर्म के आधार पर ही योनि, आयु और भोग सर्व नियंता परमात्मा के द्वारा निर्धारित किए जाते हैं। इसलिए दीप जलाने की प्रक्रिया, रूढी और परंपरा बंद करके अपने कर्मों को सत कर्मों की तरफ प्रेरित करते हुए ईश्वर से जुड़ने का अभ्यास करें तभी शांति जीवन में एवं जीवन के पश्चात भी प्राप्त हो सकती है।
गुरु नानक जी का आज 552 वाँ प्रकट उत्सव है। गुरु नानक जी का जिस समय प्रादुर्भाव हुआ उस समय भारतवर्ष पर चारों तरफ से आक्रमणकारियों का ,लुटेरों का,  का  शोषण और दलन चल रहा था ,जिसको प्रथम गुरु ने बहुत ही शिद्दत से महसूस किया था ।
इसलिए गुरु नानक ने सिख पंथ की नींव डाली थी। गुरु नानक ने हिंदुत्व की रक्षा के लिए, राष्ट्र के गौरव और अस्मिता को अक्षुण बनाए रखने के लिए अपने शिष्य बनाए थे ,उन्हीं  को आज सिख कहते हैं।
   अब कुछ फिरकापरस्ती लोग सिक्कों को हिंदुओं से अलग धर्म कहने लगे हैं जिससे हिंदुओं को बांटा जा सके । वास्तव में सिख कौम हो गई है परंतु गुरु गोविंद सिंह तक सिखों ने भारत और हिंदुत्व की रक्षा के लिए कार्य किया है।  इसके पश्चात भी अनेक महत्वपूर्ण वीर और महापुरुष इस शिष्य समाज में पैदा होते रहे हैं, जिन्होंने भारत की अस्मिता को बचाए रखने में अपना सर्वोत्तम बलिदान दिया है। हम सभी ऐसे राष्ट्र के तपपूत के लिए हृदय से श्रद्धा पूर्वक कोटि-कोटि नमन करते हैं।

देवेंद्र सिंह आर्य एडवोकेट
चेयरमैन : उगता भारत समाचार पत्र

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