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पृथ्वी पर बना हुआ है आसमानी महाविनाश का खतरा

प्रदीप

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गर्भ में सुरक्षित जीवाश्मों के अध्ययन से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला है कि हमारी पृथ्वी कभी खतरों से खाली नहीं रही और इसने अनेक संकटों को झेला है. बीसवीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह पर रह रहे हैं, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है. मानव जाति के लुप्त होने के कई खतरे हैं. कुछ खतरे मानव निर्मित हैं, जैसे- जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, जैव विविधता का विनाश, ओज़ोन की परत में सुराख, वहीं कुछ आसमानी खतरे भी हैं, जैसे- किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु से टकरा जाने के खतरा. आइए, एक निगाह डालते हैं इन्हीं आसमानी खतरों पर।

चीजें अक्सर वैसी नहीं होतीं, जैसी वे दिखाई पड़ती हैं।अपने स्मार्टफोन या लैपटॉप पर शांतिपूर्वक यह ब्लॉग पढ़ते हुए संभव है कि आप खुद को स्थिर मानकर चल रहे हों, जबकि असल में ऐसा नहीं है।हम जिस पृथ्वी पर शांतिपूर्वक और स्थिरता से रह रहें हैं, वह अंतरिक्ष के घुप अंधेरे में 107,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से सूर्य की परिक्रमा कर रही है. इसी के साथ पृथ्वी अपनी धुरी पर तकरीबन 1600 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से घूर्णन कर रही है। यही नहीं, सूर्य समेत हमारा पूरा सौरमंडल भी 792,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है. यह सिलसिला आगे भी जारी है…
उपर्युक्त पैरा को पढ़ने में आपको लगभग 30 सेकंड लगे होंगे, उतने वक्त में आप हजारों किलोमीटर का फ़ासला तय कर चुके होंगे, जिसका आपको अंदाजा भी नहीं होगा! अंतरिक्ष में हमारा यह यात्रा पथ तरह-तरह के खतरों से खाली नहीं है।हमारा ब्रह्मांड उग्र हलचलों से भरा पड़ा है, जिसमें तारे ग्रहों को निगल जाते हैं, आकाशगंगाओं का एक-दूसरे में विलय हो जाता है, ब्लैक होल आपस में टकरा जाते हैं तथा सुपरनोवा और अन्य खगोलीय पिंड घातक रेडिएशन छोड़ते हैं। कुल मिलाकर ब्रह्मांड एक बेहद हिंसक स्थान है और अंतरिक्ष के अनगिनत खगोलीय संरचनाओं की तुलना में हमारी पृथ्वी की हैसियत नाजुक, कमजोर और खतरों भरी है।

वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के गर्भ में सुरक्षित जीवाश्मों के अध्ययन से यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला है कि हमारी पृथ्वी कभी खतरों से खाली नहीं रही और इसने अनेक संकटों को झेला है।बीसवीं शताब्दी तक हम सोचते थे कि हम बहुत सुरक्षित जगह पर रह रहे हैं, लेकिन अब स्थिति पूरी तरह से बदल चुकी है।मानव जाति के लुप्त होने के कई खतरे हैं. कुछ खतरे मानव निर्मित हैं, जैसे- जलवायु परिवर्तन, परमाणु युद्ध, जैव विविधता का विनाश, ओज़ोन की परत में सुराख, वहीं कुछ आसमानी खतरे भी हैं, जैसे- किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु से टकरा जाने के खतरा।आइए, एक निगाह डालते हैं इन्हीं आसमानी खतरों पर।
क्षुद्रग्रहों या धूमकेतुओं के पृथ्वी से टकराने की संभावना में कितना दम?
हमने स्कूलों में जुरासिक काल का इतिहास पढ़ा है कि करोड़ों साल पहले पृथ्वी पर डायनासोर और बड़े-बड़े प्राणियों का राज था। उनका क्या हुआ? ऐसी कौन सी घटना घटी जिसने पृथ्वी पर से डायनासोर और अन्य विशालकाय जीव-जंतुओं का नामोनिशान ही मिटा दिया?
डायनासोर पृथ्वी से कैसे विलुप्त हो गए, इसकी कई वजहें बताईं जाती हैं, लेकिन इसका सर्वाधिक मान्यता प्राप्त सिद्धांत यह है कि आज से तकरीबन 6.5 करोड़ साल पहले किसी बड़े क्षुद्रग्रह के टकराने से मची तबाही ने डायनासोर समेत पृथ्वी पर रहने वाले लगभग 75% जीव-जंतुओं का हमेशा-हमेशा के लिए सफाया कर दिया।जिस जगह ये टक्कर हुई उसे आज दक्षिणपूर्वी मेक्सिको का युकातन प्रायद्वीप (युकाटन पेनिनसुला) कहा जाता है।
इस टक्कर की वजह से बेहद गर्म तरंगें पैदा हुईं और उन्होंने आकाश को ठोस और तरल कणों वाली गैस के बादल से भर दिया। इसकी वजह से सूर्य के सामने कई महीनों के लिए एक काला धब्बा आ गया और नतीजन सूर्य की रोशनी पर निर्भर पेड़-पौधे और जीव-जंतु मर गए।इसी प्रलय के चलते विशालकाय डायनासोर की तमाम प्रजातियाँ भी खत्म हो गईं।इस विनाश-लीला को वैज्ञानिकों ने क्रेटेशियस-पेलोजीन एक्सटिंक्सन (केपीजीई) नाम दिया है।

लोग क्षुद्रग्रहों से इसी वजह से खौफ खाते हैं कि जब यह करोड़ों वर्षों तक धरती पर राज करने वाले डायनासोर जैसे विशाल प्राणियों का नामोनिशान मिटा सकता है तो हम मामूली इंसान किस खेत की मूली हैं।इसलिए आए दिन आपको समाचार पत्रों, इंटरनेट या न्यूज चैनलों में इस तरह की सनसनीखेज हेडलाइंस देखने को मिल ही जाती हैं: ‘फलां तारीख़ को फलां क्षुद्रग्रह के पृथ्वी से टकराने की आशंका, हो जाएं अलर्ट!’ वास्तविकता में ऐसे ज़्यादातर हेडलाइंस ज्यादा व्यूज (दर्शक/पाठक) पाने के हथकंडे भर होते हैं।

यह एक सुपरिचित वैज्ञानिक तथ्य है कि हमारी पृथ्वी जिस पथ पर गतिमान है, वहाँ निर्वात या शून्य है. इस वजह से किसी अन्य खगोलीय पिंड से पृथ्वी के टकराने की गुंजाइश कम है। लेकिन आए दिन किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु के पृथ्वी के आसपास से गुजरने की खबरें आती रहती हैं. इसकी क्या सच्चाई है? इस सवाल को लेकर आगे बढ़ने से पहले आइए, क्षुद्रग्रह और धूमकेतु के बारे में कुछ बुनियादी बातें जान लेते हैं।
क्षुद्रग्रह चट्टानों और धातुओं से बने ऐसे पिंड हैं जो मुख्यत: मंगल और बृहस्पति के बीच की एस्टेरॉइड बेल्ट में पाए जाते हैं। इनका आकार 100 मीटर से लेकर 1000 किलोमीटर तक हो सकता है।छोटे आकार के क्षुद्रग्रह को उल्कापिंड कहा जाता है. वहीं धूमकेतु हमारे सौरमंडल की बाहरी सीमा जिसे ओर्ट क्लाउड कहा जाता है, में अरबों की संख्या में पाए जाते हैं।हमारे सौरमंडल के बाकी सदस्यों की तरह क्षुद्रग्रह और धूमकेतु भी सूर्य के गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव में सूर्य की परिक्रमा करते हैं।
जैसाकि ब्लॉग के शुरुआत में ही हमने बताया है कि हमारा सूर्य स्वयं 792,000 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आकाशगंगा के केंद्र की परिक्रमा कर रहा है. ऐसे में कई बार नजदीक से गुजरते किसी आकाशीय पिंड या तारे की वजह से ऐसी स्थिति बनती है कि उस तारे और सूर्य की साझा गुरुत्वाकर्षण शक्ति क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं को उनके पथ से विचलित कर देती है, जिससे ये छिटक कर सौरमंडल के भीतर 4.5 करोड़ किलोमीटर तक पहुँच जाते हैं और पृथ्वी के लिए खतरा बन जाते हैं।
हालांकि खतरा सिर्फ 30 मीटर से ज्यादा आकार के पिंड से होता है. रोजाना 30 मीटर से कम आकार के उल्कापिंडों और धूमकेतुओं के 100 मीट्रिक टन टुकड़े पृथ्वी पर गिरते हैं, जिनसे कोई खतरा नहीं होता क्योंकि ये पृथ्वी के वायुमंडल में दाखिल होते ही घर्षण की वजह से जलकर ख़ाक हो जाते हैं।
किसी अंतरिक्षीय विनाशदूत के पृथ्वी से टकराने की गुंजाइश बहुत कम, लेकिन इसकी संभावना से भी नहीं किया जा सकता इन्कार!
निश्चित रूप से किसी बड़े क्षुद्रग्रह या धूमकेतु का पृथ्वी से टकराना मानव सभ्यता के अस्तित्व के लिए एक बड़ा खतरा है।ऐसे बड़े आकाशीय आक्रांताओं को ध्यान में रखते हुए अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1999 में ‘सेंटर फॉर नीयर अर्थ ओब्जेक्ट्स स्टडीज़’ (सीएनईओएस) नामक एक अलग विभाग की स्थापना की, जिसका काम है- पृथ्वी से पांच करोड़ किलोमीटर के दायरे में मौजूद खगोलीय पिंडों की निगरानी करना।नासा का यह विभाग संभावित रूप से खतरनाक पिंडों को ‘पोटेंशियली हज़ार्डस ऑब्जेक्ट्स’ (पीएचओएस) के रूप में वर्गीकृत करता है.
जनवरी 2018 तक तकरीबन 1885 पोटेंशियली हज़ार्डस ऑब्जेक्ट्स को खोजा जा चुका है. इनमें से 157 ऐसे पीएचओएस जिनका आकार 1 किलोमीटर से अधिक है जबकि 1601 अपोलो वर्ग के हैं बाकी एटेन वर्ग के ओब्जेक्ट्स हैं।इन सभी पीएचओएस में से 99% पिंडों से आगामी 100 सालों में पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है, क्योकि इनका यात्रा पथ भलीभाँति निर्धारित किया जा चुका है. लेकिन कुछ ऐसे भी क्षुद्रग्रह और धूमकेतु हैं जो अगले 100 सालों में पृथ्वी के लिए खतरनाक साबित हो सकते हैं। तमाम निगरानी के भी बावजूद यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता कि कब, कौन-सा अंतरिक्षीय विनाशदूत पृथ्वी की तरफ आता हुआ प्रकट हो जाए। और ऐसा बीते तीन दशकों में 20-25 बार हो चुका है, जब किसी बड़े धूमकेतु या क्षुद्रग्रह के पृथ्वी के करीब से गुजरने का पता हमें काफी बाद में चला।

धरती के दामन पर लगे 200 से अधिक दाग (क्रेटर्स) इस बात के साक्षी हैं कि अंतरिक्ष के विनाशदूत यायावरों ने एक नहीं कई बार पृथ्वी से जैव प्रजातियों का नामोनिशान मिटाया है। भूगर्भिक साक्ष्यों से वैज्ञानिकों को यह पता चला है कि हर 260 लाख साल के अंतराल पर हमारी पृथ्वी किसी छोटे या बड़े प्रलय का सामना जरूर करती है। कई खगोल विज्ञानियों का मानना है कि हर 2 करोड़ 60 लाख साल में हमारे सौरमंडल में ऐसी परिस्थितियाँ (चरम गुरुत्वीय उथल-पुथल) बनती हैं, जो क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं को सौरमंडल के भीतर की ओर मोड़ देती हैं।

वैज्ञानिकों के मुताबिक अगर 60 मीटर आकार का भी कोई पिंड पृथ्वी से टकरा जाए तो उससे 6 मेगाटन हाइड्रोजन बम की ऊर्जा के बराबर ऊर्जा पैदा होगी और इससे उत्पन्न प्रभाव हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम जैसे 500 बमों के बराबर होगा! सोचिए अगर 10 किलोमीटर का कोई क्षुद्रग्रह पृथ्वी पर आ धमके तो क्या होगा? इससे कितनी ऊर्जा पैदा होगी? जवाब है- हिरोशिमा पर गिराए गए परमाणु बम जैसे एक अरब बमों जितना! इससे न सिर्फ जिस स्थान पर क्षुद्रग्रह गिरेगा उसका विनाश हो जाएगा बल्कि इस टकराव से आपदाओं की एक ऐसी शृंखला शुरू होगी जिससे इंसान सहित समस्त जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों का हश्र डायनासोरों जैसा हो जाएगा.
डायनासोरों का खात्मा इसलिए हुआ क्योंकि उनका कोई ‘स्पेस प्रोग्राम‘ नहीं था!
हॉलीवुड फिल्मों और टेलीविज़न सीरिजों, जैसे कि डीप इम्पैक्ट, एस्टेरॉइड, आर्मागेडान आदि में पृथ्वी पर मंडराते आसमानी खतरे से समस्त मानव जाति पर आए अस्तित्व के संकट को बखूबी प्रदर्शित किया गया है। इन फंतासी फिल्मों में पृथ्वी को बचाने में खगोल विज्ञान और स्पेस प्रोग्राम्स की अहमियत को भी दर्शाया गया है।अपनी तमाम कमियों के बावजूद ये फिल्में यह बताती हैं कि अंतरिक्ष अनुसंधान महज रहस्य, जिज्ञासा और रोमांच का विषय नहीं है, इससे मानव जाति के अस्तित्व की भी रक्षा हो सकती है।
सवाल उठता है कि वास्तव में अगर ऐसी कोई घटना भविष्य में हो तो मानवता अपनी रक्षा के लिए क्या कदम उठाएगी? डीप इम्पैक्ट और आर्मागेडान की तरह संभावित खतरे (क्षुद्रग्रह या धूमकेतु) पर परमाणु बम विस्फोट? किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु पर परमाणु विस्फोट समस्या का सही समाधान नहीं है, इससे पृथ्वी पर संकट और भी बढ़ जाएगा. दूसरा, किसी क्षुद्रग्रह या धूमकेतु पर गहरा गढ्ढा खोद कर परमाणु बम प्लांट करना व्यवहारिक रूप से बड़ी टेढ़ी खीर है।

खगोल विज्ञानियों के मुताबिक इस संकट का एक व्यवहारिक समाधान किसी अंतरिक्षयान (स्पेसक्राफ्ट) द्वारा क्षुद्रग्रह या धूमकेतु को उसके यात्रा पथ से विचलित यानि डिफ्लेक्ट कर देना हो सकता है। इसमें एक तकनीक यह है कि अंतरिक्षयान अपनी गुरुत्वाकर्षण शक्ति से क्षुद्रग्रह या धूमकेतु को धीरे-धीरे उसके रास्ते से भटका देगा।हमारे स्पेसक्राफ्ट को करना कुछ नही है, बस उसे संभावित खतरे के आसपास मंडराना है, बाकी का काम स्पेसक्राफ्ट और धूमकेतु/क्षुद्रग्रह के बीच मौजूद गुरुत्व क्षेत्र कर देगा. इस अवधारणा को सैद्धांतिक रूप से ‘ग्रेविटी ट्रैक्टर’ नाम दिया गया है।

दूसरा तरीका है- अंतरिक्षयान और धूमकेतु/क्षुद्रग्रह का टक्कर। ऐसा किया जा सकता है कि एक अंतरिक्षयान को क्षुद्रग्रह से इस तरह से टक्कर कराया जाए कि उसका पथ पृथ्वी से बहुत दूर छिटक जाए. इसी महीने की आगामी 24 तारीख को नासा कैलिफोर्निया के वांडेनबर्ग स्पेस फोर्स बेस से एक मिशन को लांच करेगा, जिसका उद्देश्य क्षुद्रग्रहों को पथ से डिफ्लेक्ट करने की इसी तकनीक का परीक्षण करना है।
दुनिया को महाविनाश से बचाने का ‘नासा का मास्टर प्लान’
नासा क्षुद्रग्रहों से पृथ्वी को बचाने की तकनीक के परीक्षण के लिए 24 नवंबर को डीएआरटी (डबल एस्टेरॉइड रिडाइरैक्शन टेस्ट) मिशन को लांच करने जा रहा है. योजना के मुताबिक 24 हजार किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से एक अंतरिक्षयान 2 अक्टूबर, 2022 को डिडीमॉस नामक क्षुद्रग्रह टकराएगा और उसके रास्ते को बदलने की कोशिश करेगा। अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने इसे प्लानेट्री डिफेंस नाम दिया है।यह प्रयोग इसलिए किया जा रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि अगर भविष्य में कोई क्षुद्रग्रह पृथ्वी की ओर आता हुआ दिखाई देता है तो क्या उसे उसके यात्रा पथ से विचलित करने में यह तकनीक कारगर साबित हो सकती है या नहीं।पृथ्वी की रक्षा के लिए इस तरह की तकनीक का यह पहला प्रदर्शन होगा।
नासा के प्लानेट्री डिफेंस ऑफिसर लिंडले जॉनसन के मुताबिक, ‘हालांकि अभी तक ऐसे किसी क्षुद्रग्रह के बारे में जानकारी नहीं मिली है जिससे निकट भविष्य में पृथ्वी को नुकसान पहुंचने वाला हो, लेकिन धरती के आसपास अंतरिक्ष में बड़ी संख्या में क्षुद्रग्रह हैं।नासा का प्रयास ऐसी तकनीक विकसित करना है जिससे कि भविष्य में पृथ्वी को खतरा पैदा होने की स्थिति में समय रहते कार्रवाई की जा सके।’
जॉनसन के मुताबिक डिडिमॉस एक ऐसा क्षुद्रग्रह है जिससे पृथ्वी को कोई खतरा नहीं है, इसलिए इसे परीक्षण के लिए चुना गया है। इस पूरी घटना को पृथ्वी से दूरबीन के जरिए देखा जा सकेगा। इस टक्कर की मिनिएचर कैमरा से तस्वीरे भी ली जा सकेंगी।

अंतरिक्ष विशेषज्ञों के मुताबिक निकट भविष्य में क्षुद्रग्रहों या धूमकेतुओं के पृथ्वी से टकराने की कोई आशंका नहीं है, मगर खगोल विज्ञानियों को पृथ्वी के नजदीक मंडराने वाले आकाशीय चट्टानों से हर पल चौकन्ना रहना पड़ेगा और पहले से अपनी तैयारियां दुरुस्त रखनी होंगी. दुर्भाग्य से, आसमानी खतरों पर नज़र रखना और उन्हें मोड़ने के लिए एक बेहतरीन तकनीक खोजना ही हमारी एकमात्र चुनौती नहीं है।हम राष्ट्र, धर्म, अमीर-गरीब आदि की सीमाओं में बंटे हुए हैं और हमारी अपनी अर्थव्यवस्थाएं, कानून और प्राथमिकताएं हैं।

ग्रह सुरक्षा मिशन की फंडिंग कौन करेगा और उसका प्रबंधन कौन करेगा? यदि हम एक ऐसे निर्णय का सामना करते हैं जो एक देश के साथ टकराव को रोक सकता है, लेकिन दूसरे को ज्यादा खतरे में डाल सकता है, तो हम क्या करेंगे? क्या होगा अगर हमने गलती की? हमें अपने वजूद को बचाने के लिए आपसी मतभेदों को भूलकर एक साथ आना ही होगा और इन सवालों के जवाब तलाशने होंगे। बहरहाल, हम इस ब्लॉग का समापन खगोल विज्ञानी लेरी नेविल की इस समझाइश से कर रहे हैं:
‘करोड़ों साल पहले डायनासोरों का अंत इसलिए हुआ क्योंकि उनका कोई ‘स्पेस प्रोग्राम’ नहीं था. हमारे पास स्पेस प्रोग्राम है, इसलिए हम  विलुप्त होने से बच सकते हैं।

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