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इतिहास के पन्नों से

रावलपिंडी में ऐसे होता रहा था हिंदुओं का उत्पीड़न , कांग्रेस रही थी मौन

रावलपिंडी के समीप हिन्दुओं का एक छोटा सा गांव था। 500 के लगभग वयस्क होंगे।बाकि बच्चे,बुड्ढे। गांव के सरपंच रामलाल एक विशाल बरगद के नीचे बैठे थे। तभी मोहन भागता हुआ आया। बोला सरपंच जी,सरपंच जी। सरपंच जी ने कहा”क्या हुआ मोहन ? ” सरपंच जी मुझे पता लगा है यहाँ से 8 कोस दूर हिन्दुओं ने अपना गांव खाली करना शुरू कर दिया है। सिख भाई भी उनके साथ अमृतसर जाने की तैयारी कर रहे है। सरपंच जी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” मैंने कल ही रेडियो पर सुना था। महात्मा गाँधी ने कहा है कि “भारत-पाकिस्तान का विभाजन मेरी लाश पर होगा।” क्या तुम्हें उनकी बात पर भरोसा नहीं है?”

मोहन बोला,” सुना तो मैंने भी है कि जवाहर लाल नेहरू ने कहा है कि हिन्दुओं आश्वस्त रहो। भारत के कभी टुकड़े नहीं होंगे। तुम लोग लाहौर और रावलपिंडी में आराम से रहो। पर जिस गांव की मैं बात कर रहा हूँ। उस गांव पर पिछली रात को चारों और के मुसलमान दंगाइयों ने इकट्ठे होकर हमला कर दिया। उनकी संपत्ति लूट ली। दुकानों में आग लगा दी। मैंने तो यह भी सुना की किसी गरीब हिन्दू की लड़की को भी उठा कर ले गए। भय के कारण उन्होंने आज ही पलायन करना शुरू कर दिया हैं।” सरपंचजी बोले,”देखो मोहन। हम यहाँ पर सदियों से रहते आये हैं। एक साथ ईद और दिवाली बनाते आये है। नवरात्र के व्रत और रोज़े रखते आये है। हमें डरने की कोई जरुरत नहीं है। तुम आश्वस्त रहो।” मोहन सरपंच जी की बात सुनकर चुप हो गया, मगर उसके मन में रह रहकर यह मलाल आता रहा कि सरपंच जी को कम से कम गांव के हिन्दुओं को इकट्ठा कर सावधान अवश्य करना चाहिए था। अभी दो दिन ही बीते थे।

चारों ओर के गांवों के मुसलमान चौधरी इकट्ठे होकर सरपंच से मिलने आये और बोले। हमें मुस्लिम अमन कमेटी के लिए चंदा भेजना है। आप लोग चंदा दो। न नुकर करते हुए भी सरपंच ने गांव से पचास हज़ार रुपया इकठ्ठा करवा दिया। दो दिन बाद फिर आ गए। बोले कि और दो सरपंच ने कहा कि अभी तो दिया था। बोले की, “कम पड़ गया और दो। तुमने सुना नहीं 8 कोस दूर हिन्दुओं के गांव का क्या हश्र हुआ है। तुम्हें अपनी सुरक्षा चाहिए या नहीं?” सरपंच ने इस बार भय से सत्तर हज़ार इकट्ठे कर के दिए। दो दिन बाद बलूच रेजिमेंट की लोरी आई और हिन्दुओं कक इक्कट्ठा कर सभी हथियार यहाँ तक की लाठी, तलवार सब जमा कर ले गई। बोली की यह दंगों से बचाने के लिए किया है। क़ुराने पाक की कसम खाकर रक्षा का वायदा भी कर गई। नवें दिन गांव को मुसलमान दंगाइयों ने घेर लिया। सरपंच को अचरज हुआ जब उसने देखा कि जो हथियार बलूच रेजिमेंट उनके गांव से जब्त कर ले गयी थी. वही हथियार उन दंगाइयों के हाथ में हैं।

दंगाइयों ने घरों में आग लगा दी।संपत्ति लूट ली।अनेकों को मौत के घाट उतार दिया गया। हिन्दुओं की माताओं और बहनों की उन्हीं की आँखों के सामने बेइज्जती की गई। सैकड़ों हिन्दू औरतों को नंगा कर उनका जुलुस निकाला गया।हिन्दू पुरुष मन मन में यही विनती कर रहे थे कि ऐसा देखने से पहले उन्हें मौत क्यों न आ गई… पर बेचारे क्या करते। गाँधी और नेहरू ने जूठे आश्वासन जो दिए थे। गांव के कुछ बचे लोग अँधेरे का लाभ उठाकर खेतों में भाग कर छुप गए। न जाने कैसे वह रात बिताई। अगले दिन अपने ही घर वालों की लाशे कुएं में डाल कर अटारी के लिए रेल पकड़नी थी। इसलिए किसी को सुध न थी। आगे क्या होगा? कैसे जियेंगे? कहाँ रहेंगे? यह कहानी कोई एक घर की नहीं थी। यह तो लाहौर, डेरा गाजी खां, झेलम, सियालकोट, कोहाट, मुलतान हर जगह एक ही कहानी थी। कहानी क्या साक्षात् नर पिशाचों का नंगा नाच था।

तत्कालीन कांग्रेस के अध्यक्ष आचार्य कृपलानी के शब्दों में इस कहानी को पढ़िए

“आठ मास हुए आपने मुझे कांग्रेस का अध्यक्ष चुना था। महात्मा गाँधी ने एक प्रार्थना सभा के भाषण में कहा था कि मुझे फूलों का मुकुट नहीं पहनाया जा रहा है। बल्कि काँटों की सेज पर सुलाया जा रहा है। उनका कहना बिलकुल ठीक है। उनकी घोषणा होने के दो दिन बाद मुझे नोआखली जाना पड़ा। वहां से बिहार और अभी मैं पंजाब होकर आया हूँ। नोआखली में जो देखा वह मेरे लिए नया अनुभव था। लेकिन बिहार में जो मैंने देखा वह और भी नया और पंजाब में जो देखा वह और भी अधिक था। मनुष्य मनुष्य नहीं रहा। स्त्रियां बच्चों को साथ लेकर इज्जत बचाने के लिए कुओं में कूद पड़ीं। उनको बाद में उससे बचाया गया। पूजा के एक स्थान में पचास स्त्रियों को इकठ्ठा करके उनके घर के लोगों ने उनको मार दिया। एक स्थान में 370 स्त्रियों और बच्चों ने अपने को आग को भेंट कर दिया है।- आचार्य कृपलानी”

(सन्दर्भ- श्यामजी पराशर, पाकिस्तान का विष वृक्ष, नवंबर,1947 संस्करण, राष्ट्रनिर्माण ग्रन्थ माला, दिल्ली, पृष्ठ 42)

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