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हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

कालापानी जाने के कारण

लेखक – आचार्य भगवानदेव गुरुकुल झज्जर
पुस्तक – कालापानी यात्रा 1966
प्रस्तुतकर्ता – अमित सिवाहा

       विरक्त और वीरपुरुषों के प्रति मेरी बाल्यकाल से ही श्रद्धा और भक्ति रही । कारण भी मैं यही समझता हूं कि मेरे माता - पिता ने शूरवीर और साधु - संन्यासियों है अतः उनके विषय में मुझे लिखना और पढ़ना बहुत भाता है । इसका मुख्य की कथा कहानियां सुनाकर मुझे अल्पायु में ही इस रंग में रंग दिया था । उपरोक्त प्रकार की शिक्षा और दीक्षा ने मुझे इतिहास का विद्यार्थी बना दिया । इसी कारण मैंने अपने स्कूल और कालिज के जीवन में ही अनेक साधु - संन्यासियों और देशभक्तों के जीवन - चरित पढ़ डाले और यह रुचि उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली गई । इसी भावना के अनुरूप २०१५ वि ० की दीपमाला पर गुरुकुल झज्जर की मासिक पत्रिका " सुधारक ” का बलिदानाङ्क तथा “ बलिदान " पुस्तक प्रकाशित की गई भारत की स्वतन्त्रता की एक शताब्दी की गौरवगाथा ही कहनी चाहिये । इस विषय में लिखने से पूर्व वीरभूमि हरयाणा के वीरों ने १८५७ के प्रथम स्वातन्त्र्ययुद्ध में क्या भाग लिया ? इसकी खोज के लिये मुझे हरयाणा के अनेक वीरप्रसूत ग्रामों की यात्रा करनी पड़ी । लिबासपुर , कूण्डली , भालगढ़ , खामपुर और अलीपुर ग्रामों में मैं इसी कार्य के लिये अनेक बार गया । इन वीरों की क्रीड़ास्थलीवाले ग्रामों के बलिदान की कहानी " बलिदान " पुस्तक में प्रकाशित होचुकी है । 

        प्रथम स्वातन्त्र्यसंग्राम के विफल होने के पश्चात् अंग्रेजों ने भारतीय देशभक्त जनता पर जो भयंकर अत्याचार किये वे इतिहासप्रसिद्ध हैं । हरयाणा प्रान्त में अंग्रेजों ने अत्याचारों की पराकाष्ठा करडाली । सैकड़ों ग्रामों को जी भरकर लूटा । सभी ग्रामों से धन - धान्य , मूल्यवान् सामान से गाड़ियां भरकर देहली भेज दीगई । सभी स्त्री और बच्चों के आभूषण बलपूर्वक छीनलिये । किसी व्यक्ति के पास कुछ भी नहीं रहने दिया । कितने ही देशभक्त तो लड़ते - लड़ते देश के लिये अपने प्राणों की भेंट चढ़ागये । बड़ी भारी संख्या में बहुतसे वीरों को गिरफ्तार करके तोपों के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया । कितनों को सड़कर पर लिटाकर सड़क कूटनेवाले भारी पत्थर के कोल्हुओं के द्वारा चकनाचूर कर डाला । उपरोक्त प्रकार के कोल्हुओं में से दो कोल्हू अब भी लाहौरवाली लम्बी सड़क के २२ वें मील के दूसरे फर्लांग पर पड़े हुये हैं । इन ग्रामों के जो उस समय देशभक्त नेता थे उनको बहुत बुरी तरह सुताकर अंग्रेजों ने मारा । उस लोमहर्षक अत्याचार का लिबासपुर निवासी वीरयोद्धा श्री उदमीराम जी एक सच्चा उदाहरण है । राई के पड़ाव के पास जितने भी वृक्ष थे उन सबसे शूली या फांसी का काम अंग्रेजों ने लिया । वहीं एक पीपल के वृक्ष पर इस वीर को बांध दिया गया । दोनों हाथों में लोहे की कील मारकर वृक्ष के तने में गाड़ दीगई और उनको सर्वथा भूखा - प्यासा रखा गया । उन्होंने पीने का जल मांगा तो उनके मुख में बलपूर्वक मनुष्य का मूत्र डाल दिया गया । अंग्रेजों का चौबीस घण्टे सख्त पहरा रहता था । यह भारत मां का शूरवीर सपूत ३५ दिन तक इसी प्रकार वृक्ष पर बंधा हुआ तड़पता रहा और देश के लिये अपने प्राणों की आहुति देकर अपने ग्राम और वीरभूमि हरयाणे का नाम अमर कर गया । उसका शव भी कहीं छिपा दिया गया । इसी प्रकार हरयाणे के सहस्रों वीर रणबांकुरों ने उस समय अपने प्राण न्यौछावर किये । हजारों गांव अग्रि से भस्मसात् करडाले । सहस्रों वीर ग्रामों को छोड़ - छोड़कर प्राण बचाने के लिये दूर - दूर भाग गये । सारा प्रान्त एक प्रकार से उस समय उजाड़ दिया गया । विक्टोरिया महारानी की ओर से शान्ति होने के पश्चात् भी अनेक अंग्रेज अधिकारियों की इस प्रान्त पर क्रूर दृष्टि बनी रही । इसलिये हरयाणे के सहस्रों वीरों को गिरफ्तार करके बन्दी बनाकर जेल में डाल दिया गया । हरयाणे में यह अत्याचार एक अंग्रेज अधिकारी " मिटकाफ " , जो इस प्रान्त में " काणे साहब " के नाम से प्रसिद्ध है , के द्वारा किये गये । 

      जब अंग्रेजों की यह योजना बनी कि जो देशभक्त बन्दी के रूप में उनकी जेलों में हैं उनको आजीवन कारावास का दण्ड देकर अण्डमान या कालापानी भेजाजाये तो हरयाणे के सहस्रों वीरों को अण्डमान ( कालेपानी ) भेज दिया गया । उनमें से लौटकर कोई भी नहीं आया । जैसे कूण्डली ( रोहतक ) को ही लें , वहां के नम्बरदार ' सूरतराम ' और उनके पुत्र ' जवाहरा ' तथा नम्बरदार ' बाजा ' को अण्डमान द्वीप में भेजा गया । उनमें से कोई लौटकर नहीं आया । ये तीनों वहीं समाप्त होगये । इसी प्रकार कालेपानी भेजे जानेवाले सभी वीर शहीद होगये । किसी को पुनः भारतभूमि के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त नहीं हुआ । यह आभास इन वीरों को पहले ही मिल गया था । जब कूण्डली ग्राम के ये तीनों वीर गिरफ्तार हुये , उस समय बाजा नम्बरदार ने सूरता नम्बरदार से कहा कि “ हम तो अब लौटकर आते नहीं , परमात्मा की कृपा से यह ग्राम सुख से बसे । " किन्तु सूरता ने बाजा नम्बरदार से उस समय कहा- “ तूं यूंही घबराता है । हम भाग्यवान् हैं अलीपुर वा देहली से ही छूटकर घर पर आजायेंगे । हमारा दोष ही क्या है ? " बाजा ने उत्तर दिया- “ सूरता ! जिनके ढौर , पशु धनादि सब कुछ लूटलिये हों वे लौटकर कैसे आयेंगे ? " हुआ भी यही । अभियोग में सर्वथा निर्दोष सिद्ध होने पर भी इनको कालेपानी भेज दिया गया और ये वहीं स्वतन्त्रता की बलिवेदी पर प्राणों की भेंट चढ़ा गए । हरयाणे के हजारों वीरों की यही गति हुई ।

       मैं अनेक वर्षों से हरयाणे के इतिहास की खोज कर रहा हूं । मेरी तीव्र इच्छा थी कि मैं स्वयं अण्डमान ( कालेपानी ) जाकर अपने इन वीर पूर्वजों के विषय में ठीक ज्ञान प्राप्त करने का यत्न करूं । एतदर्थ अनेक बार वहां जाने का निश्चय भी किया किन्तु सदैव कोई न कोई बाधा मार्ग में आखड़ी होती थी । इस बार जब हमारी सरकार ने हरयाणाप्रान्त बनाने की घोषणा की तो उसी समय मैंने अपने इष्टमित्रों से विचार करके यह निश्चय कर ही लिया कि मुझे तुरन्त ही इस समय अण्डमान चला जाना चाहिये । न जाने फिर कोई और बाधा आखड़ी होगी । दो चार दिन वहां जाने के विषय में पूछताछ करनी पड़ी । इस यात्रा का मुख्य श्रेय तो श्री ईश्वरसिंह आर्य बाजीदपुर ( दिल्ली ) निवासी , जो कि ओवरसीयर हैं , को है । वे कई वर्ष तक अण्डमान निकोबार आदि द्वीप - समूह में भारत सरकार की ओर से सेवाकार्य करते रहे हैं । वे अपने बाल्यकाल से ही मेरे से स्नेह करते हैं । इस सम्बन्ध को उन्होंने वहां जाने पर भी नहीं भुलाया । गुरुकुल झज्जर की सुधारक पत्रिका उन दिनों भी उनके पास अण्डमान पहुंचती थी । सुधारक का ' बलिदानाङ्क ' भी उनके पास था और उन्होंने इसका भलीभांति अध्ययन भी किया था । वे मुझे अण्डमान यात्रा करने के लिए बार - बार पत्र लिखते रहते थे किन्तु बाधायें भी मार्ग घेरे खड़ी रहती थीं । इस वर्ष मैं उनसे उन्हीं के गांव में मिला । वे स्वयं भी गुरुकुल की जयन्ती पर गुरुकुल पधारे और मुझे इस वर्ष भी वे अण्डमान जाने के लिये प्रेरणा करते रहे । उन्होंने मेरे लिए एक विशेष सुविधा की बात बताई , वह यह कि इस समय अण्डमान निकोबार के डिप्टी कमिश्नर चौ ० हरिसिंह जी ममताज हैं । मैं उनसे पहले से ही परिचित था । वे स्व ० चौ ० भोलाराम जी आर्य औचन्दी ( दिल्ली ) निवासी के सुपुत्र हैं । उनसे भी मेरा पुराना सम्बन्ध था । 

      अपरिचित स्थान पर किसी अपने परिचित व्यक्ति से बहुत बड़ी सहायता की आशा होती है । इसी धारणा को हृदय में धर मैं ब्र ० योगानन्द जी को साथ ले कलकत्ता के लिये चल पड़ा । श्री माननीय पं ० जगदेवसिंह जी सिद्धांती संसद् सदस्य की कृपा से रेलगाड़ी में दो सोने के स्थान मिल गये और श्री माननीय जगन्नाथ जी बी० ए० , एल० एल० बी० नरेलानिवासी , जोकि भारत सरकार के कृषि विभाग में सैक्सन आफिसर हैं और बाल्यकाल से ही आर्यसमाज के रंग में रंगे हु हैं और विशेष बात यह है कि मेरे सुख दुःख का वे सदा ध्यान रखते हैं , उनकी भागदौड़ से अण्डमान जाने के सब कागज ठीक - ठाक होगये । हमें अण्डमान में किसी प्रकार का कष्ट न हो , इसके लिये श्री जगन्नाथ जी ने श्री मनोहरलाल जी पुरी , जोकि अण्डमान में पी ० डब्ल्यू० डी० में अफसर हैं , को उनके पिता द्वारा एक पत्र लिखवा भेजा तथा एक पत्र वनविभाग के सबसे बड़े अधिकारी श्री हरिसिंह जी ( दिल्ली ) का भी अण्डमान में वनविभाग के अधिकारी श्री जगदीशचन्द्र जी वर्मा के नाम भी लिखवा दिया । इन दोनों पत्रों में भी हमें अण्डमान में निवास भोजनादि की पर्याप्त सुविधायें रहीं । इस प्रकार हम सम्पूर्ण तैयारी कर १२ अप्रैल को सायं दिल्ली के बड़े रेलवे स्टेशन पर पहुंचगये । हमें विदाई देने के लिये ब्र ० दयानन्द जी , जोकि हमारा आवश्यक सामान लेकर गुरुकुल से आये थे , ब्र ० देशपाल जी , वैद्य कर्मवीर ज आर्य ( नरेला ) उनकी धर्मपत्नी श्रीमती सत्यवती जी आदि रेलवे स्टेशन तक पहुंचे । वैद्य कर्मवीर जी तो हामरे लिये उस समय का भोजन , दूधादि भी लेगये तथा मार्ग के भोजनार्थ भी सामान लेकर पहुंचे थे ।

      इस प्रकार हम विदा ले १२ अप्रैल की रात्रि को ९ -१० बजे हावड़ा एक्सप्रेस में सवार हो १४ अप्रैल को प्रातः ७ बजे कलकत्ता पहुंच गये तथा राजेन्द्र जी मलिक के पास जा ठहरे । क्योंकि १५ अप्रैल को प्रातः ७ बजे “ डाकोटा " ५-६ सवारियों को लेकर अण्डमान के लिये उड़ रहा था अतः प्रतीक्षासूची में हमारा नाम होने के कारण हम उसकी टिकट लेने गये परन्तु पता लगा कि सीटें पूरी होचुकी हैं । दूसरी बार एक सप्ताह बाद २२ को जाना था उसके लिये भी प्रयत्न किया परन्तु सब व्यर्थ । पुनः तीसरे सप्ताह २ ९ अप्रैल को वायुयान से जाने के लिये कोशिश की तो पता लगा कि प्रतीक्षा सूची में हमारा नाम बहुत नीचे है अतः कई सप्ताह और यहीं कलकत्ता ठहरना होगा अतः विवश हो हमने २८ अप्रैल को जानेवाले " अण्डमान " नामक जलयान की टिकटें लेलीं ।

-भगवान्देव आचार्य
आश्विन २०२३ वि ०
अक्तूबर १९६६ ई ०

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