Categories
इतिहास के पन्नों से

50 हजार हिन्दी सत्याग्रहियों को कोटी कोटी नमन हरियाणे को बनाने वाला आर्यसमाज है ———

हरियाणा दिवस की हार्दिक बधाई

(हिंदी रक्षा आंदोलन ओर स्वामी ओमानंद सरस्वती)
………………… (1957)
हरियाणा निर्माता स्वामी ओमानंद जी महाराज को शत शत नमन

आचार्य जी का जीवन यौवनकाल से ही संघर्षपूर्ण रहा है । वैसे तो आज के युग में गुरुकुलों का संचालन और वह भी आर्ष पाठविधि से, अपने आप में समय और प्रतिकूल परिस्थितियों के साथ एक बड़ा संघर्ष है । किन्तु इस रचनात्मक कार्य और आर्यसमाज के प्रचार-कार्य के अतिरिक्त भी समय-समय पर इनके सम्मुख बड़ी-बड़ी चुनौतियां व संघर्ष आये हैं और उस प्रत्येक संघर्ष में आचार्य जी और अधिक तेजोमय होकर निकले हैं । इनका जीवन संघर्षमय है, यह कहना संभवतः उतना सार्थक नहीं होगा जितना कि यह कहना कि संघर्ष ही इनका जीवन है अथवा इनका जीवन ही संघर्ष है । पंजाब का हिन्दी-रक्षा आन्दोलन भी इस जीवन की लम्बी दुर्धर्ष घटना है जिसने आचार्यप्रवर को जन-जन का नेता बनाया ।

आर्यसमाज अपने प्रारम्भिक काल से ही एक प्रमुख राष्ट्रवादी संस्था रहा है । इसी कारण इसने अपने कार्यक्रम में राष्ट्रभाषा हिन्दी के प्रचार और प्रसार को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया । स्वयं इसके संस्थापक महर्षि दयानन्द ने अपनी मातृभाषा गुजराती को छोड़ अपने सब ग्रन्थ हिन्दी और संस्कृत में ही लिखे । पंजाब में आर्यसमाज का प्रचार सर्वाधिक हुआ । इसलिए वहां हिन्दी के प्रति अनुराग स्वाभाविक था । अंग्रेजी शासनकाल में लगभग सारा कामकाज उर्दू में होता था परन्तु आर्यसमाजी व्यक्ति व संस्थायें सब काम हिन्दी भाषा में ही करती थीं । पंजाब विश्वविद्यालय में भी बहुत पहले से ही हिन्दी की रत्‍न, भूषण तथा प्रभाकर परीक्षायें होतीं थीं । इनमें प्रतिवर्ष हजारों छात्र बैठते थे । यह आर्यसमाज के प्रभाव का ही परिणाम था । स्वतन्त्रता-प्राप्‍ति तथा पंजाब विभाजन के उपरान्त उर्दू का स्थान हिन्दी को लेना चाहिये था परन्तु सिख-नेता पंजाबी को राज्य की राजकीय भाषा बनाना चाहते थे और उसके लिये ही कार्य कर रहे थे । इससे पंजाब के सिखेतर, हिन्दू और हरयाणा की जनता बहुत रुष्‍ट थी । क्योंकि वर्तमान हरयाणा जो उस समय पंजाब का ही एक भाग था, विशुद्ध हिन्दी-भाषी क्षेत्र था । इस तरह स्वतन्त्रता के तत्काल उपरान्त पंजाब में भाषा सम्बन्धी विवाद उठ खड़ा हुआ ।

इस भाषा विवाद को सुलझाने के लिये एक फार्मूला बनाया गया जो ‘सच्चर फार्मूला’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ । इस समय श्री भीमसेन सच्चर पंजाब के मुख्यमन्त्री और गोपीचन्द भार्गव शिक्षा मन्त्री थे । इस फार्मूले के अनुसार हिन्दी पढ़ने वाले प्रत्येक बालक को पांचवीं कक्षा से पंजाबी पढ़ने और पंजाबी के छात्र को पांचवीं से हिन्दी पढ़ने की व्यवस्था की गई थी परन्तु इस पर अमल नहीं हो सका और विवाद चलता रहा । फिर पंजाब के तीन रीजनों (प्रादेशिक इकाइयों) की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुये एक ‘रीजनल फार्मूला’ बनाया गया । पंजाब के तीन रीजन थे – १. जालंधर डिवीजन २. अम्बाला डिवीजन और ३. पेप्सू – इसमें जीन्द, नाभा, पटियाला तथा फरीदकोट आदि पुरानी रियासतों के क्षेत्र सम्मिलित थे ।

रीजनल फार्मूले के अनुसार जालन्धर डिवीजन में पंजाबी भाषा प्रथम श्रेणी से ही अनिवार्य कर दी गई । वहां के स्कूलों में यदि किसी श्रेणी में १० या स्कूल में कुल ४० छात्र हिन्दी पढ़ने वाले हों तो उनको हिन्दी पढ़ने की छूट दी गई परन्तु पांचवीं से प्रत्येक छात्र के लिये पंजाबी अनिवार्य कर दी गई । अम्बाला डिवीजन के लिये भी पांचवीं से पंजाबी अनिवार्य और पेप्सू में केवल पंजाबी ही शिक्षा का माध्यम बना दी गई । सरकारी नौकरी के लिये मैट्रिक में पंजाबी अनिवार्य कर दी और राजभाषा भी पंजाबी बना दी गई ।

इस प्रकार ‘रीजनल फार्मूला’ हिन्दी-भाषियों के लिए एक बड़ी चुनौती बनकर आया । हरयाणा वाले भाग पर भी पंजाबी की अनिवार्यता लादना सरासर अन्याय था । जनता ने अनेक प्रकार से रोष प्रकट किया परन्तु सिक्खों के राजनीतिक दबाव के आगे जनता की कौन सुनने वाला था । उधर मास्टर तारासिंह सिक्ख राज्य का राग अलाप रहे थे और निरन्तर धमकियां दे रहे थे । केन्द्रीय सरकार भी उनको सन्तुष्ट रखने की नीति पर चल रही थी । राष्ट्रीय-जन जो कांग्रेसी थे, सरकार पर दबाव डाल रहे थे कि पंजाबी को राजभाषा मान लिया जाये तो मास्टर तारासिंह के विरोध का मुकाबला किया जा सकता है । इस चुनौती का मुकाबला करने के लिए जून १९५६ में जालन्धर के साईंदास कालिज में पंजाब भर के आर्यनेताओं की एक विशेष बैठक हुई । उसमें स्वामी आत्मानन्द जी प्रधान आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, महात्मा आनन्द स्वामी जी, श्री आचार्य भगवानदेव जी, श्री जगदेव सिंह जी सिद्धान्ती मन्त्री आ० प्र० नि० सभा पंजाब, आचार्य रामदेव (स्वामी सत्यमुनि) जी, श्री यश सम्पादक मिलाप दैनिक, श्री वीरेन्द्र संपादक प्रताप दैनिक, लाला जगतनारायण सम्पादक हिन्द केसरी दैनिक, प्रिंसीपल सूरजभान, प्रिंसीपल भगवानदास, कै‍प्‍टन केशवचन्द्र तथा नारायणदास ग्रोवर आदि नेता उपस्थित थे । अन्तिम बैठक चंडीगढ़ में हुई । इसमें भी सभी प्रमुख आर्यनेता तथा सन्यासी उपस्थित थे ।

भाषा विभाग पंजाब के अधिकारियों के साथ आचार्य भगवानदेव जी
इस बैठक में गम्भीरता से विचार हुआ । अब तक पंजाब भर में सरकार की भाषा-नीति के विरुद्ध लाखों लोगों के हस्ताक्षर हो चुके थे । जनता में उग्ररोष व्याप्‍त था । बैठक में पंजाब वाले केवल पंजाबी की जबरदस्ती के खिलाफ प्रस्ताव पास करने के पक्ष में थे । श्री यश इस समय पंजाब के कैरों मंत्रिमंडल में थे । अतः कुछ नेता हिन्दी-रक्षा आन्दोलन चलाने से सहमत नहीं थे किन्तु जनता प्रबल आन्दोलन चाहती थी । आन्दोलन से असहमत नेताओं का समर्थन जब एक प्रसिद्ध सन्यासी भी करने लगे तो आचार्य जी को गुस्सा आ गया और वे कहने लगे – “हम तो समझते थे कि हम आर्य-सन्यासियों के बीच बैठे हैं जो स्वभाव से वीर होते हैं परन्तु यहां तो लगता है कि किसी दुकानदार ने कपड़े रंग लिये हैं । चलो हम हरयाणावासियों को पंजाबी कौन सी पढ़नी है ।” श्री आचार्य जी यह कहकर क्रोधित हो उठने लगे तो अन्य नेताओं ने उनको मनाकर बैठा लिया । परिणामस्वरूप अब सब एकमत होकर इस पक्ष के हो गये कि सत्याग्रह प्रारम्भ किया जाये और उसके लिये एक संचालन समिति गठित कर दी जाये । एक प्रतिनिधि मंडल सरकार से मिले और सरकार को पूरी स्थिति से अवगत करा दे । यदि सरकार न माने तो आंदोलन प्रारम्भ कर दिया जाये । इस निश्‍चयानुसार एक ‘हिन्दी रक्षा समिति’ का गठन हुआ जिसके निम्नलिखित मुख्य पदाधिकारी चुने गये –

प्रधान – स्वामी आत्मानन्द जी महाराज

उप-प्रधान – प्रिंसीपल सूरजभान

प्रधान-मंत्री – श्री जगदेवसिंह सिद्धान्ती

इसके उपरान्त आर्यनेताओं का एक शिष्ट-मण्डल मुख्यमन्त्री सरदार प्रतापसिंह कैरों से मिला । इस समय प्रोफेसर शेरसिंह पंजाब के उप-मुख्यमंत्री थे । सरदार कैरों को मुख्यमंत्री बनवाने में इनका प्रमुख हाथ था । वार्ता में प्रोफेसर साहब भी थे । कैरों ने प्रोफेसर साहब की ओर अभिमुख हो कहा कि मैं हरयाणा पर से तो पंजाबी की अनिवार्यता अवश्य समाप्‍त कर दूंगा । यह बात सितंबर १९५६ की है । इस आश्वासन के कारण आंदोलन कुछ समय के लिए टल गया परन्तु जनवरी १९५७ में कैरों अपने वायदे से मुकर गया । कैरों ने प्रो० साहब से कहा कि आप हरयाणा वालों पर दबाव डालें कि वे आन्दोलन में भाग न लें । प्रो० साहब ने कहा कि आप अपने वचन से हट रहे हैं अतः मैं तो अब इस अवस्था में इन लोगों का साथ दूंगा । आगे चलकर इसी कारण प्रोफेसर साहब ने मंत्रिमंडल से त्यागपत्र दे दिया और वे सत्याग्रह करके जेल चले गये । कई मास जेल में रहे ।

मुख्यमंत्री कैरों द्वारा अपना वायदा भंग किये जाने पर उत्पन्न स्थिति का सामना करने और पूर्व निश्‍चयों का पुनर्वलोकन करने तथा भावी योजना को मूर्तरूप देने के लिये समिति के प्रधान स्वामी आत्मानन्द जी महाराज ने चंडीगढ़ में समिति की बैठक बुलाई । इस बैठक में सभी आर्य-नेताओं ने मिलकर आन्दोलन की रूपरेखा को अन्तिम रूप दिया और चण्डीगढ़ में ही तुरन्त सत्याग्रह करने का निश्‍चय हुआ । तदनुसार ३० जून को स्वामी आत्मानन्द जी महाराज अन्य आर्यनेताओं के साथ सद्‍भावना यात्रा पर चंडीगढ़ पहुंचे । सरदार प्रतापसिंह कैरों ने उनके पैर छुये परन्तु स्वामी जी की सात मांगों में से उन्होंने किसी को न तो माना और न ही अस्वीकार किया । टाल-मटोल कर स्वामी जी को सरकारी गाड़ी से यमुनानगर वापिस भिजवा दिया । ७ जून सन् ५७ ई० तक स्वामी जी ने तीन सद्‍भावना यात्रायें कीं किन्तु परिणाम कुछ न निकलता देख १० जून को आन्दोलन प्रारम्भ करने की घोषणा कर दी । सबसे पहले स्वामी आत्मानन्द जी ने ही सत्याग्रह किया । उनके जत्थे में महात्मा आनन्दभिक्षु जी व स्वामी वेदानन्द जी आदि भी थे । धड़ाधड़ सत्याग्रही जत्थे पहुंचने लगे । सत्याग्रह जोर पकड़ने लगा । सरकार घबराने लगी और सत्याग्रहियों को हतोत्साहित करने के लिये तंग करने और दूर बीहड़ जंगलों में छोड़ने लगी । इधर सत्याग्रह को व्यापक बनाने के लिये आन्दोलन की बागडोर सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा को सौंप दी गई । सभा में ‘भाषा स्वातन्त्र्य समिति’ का गठन हुआ जिसके प्रधान श्री घनश्यामदास गुप्‍त व श्री रघुवीरसिंह शास्‍त्री चुने गये ।

हरयाणा में आन्दोलन की बागडोर श्री आचार्य भगवानदेव जी को सौंपी गई । पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान का उत्तरदायित्व भी इन्हीं पर छोड़ा गया । आचार्य जी ने प्रत्येक जिले का कार्यभार अलग-अलग व्यक्तियों को सौंप दिया । करनाल जिले में स्वामी रामेश्वरानन्द जी, हिसार में स्वामी ईशानन्द जी, रोहतक में स्वामी नित्यानन्द जी, महेन्द्रगढ़ में स्वामी अमरानन्द जी और गुड़गांव जिले में स्वामी सन्तोषानन्द जी को नियुक्त कर दिया और हरयाणा की सर्वोच्च कमान स्वयं सम्भाली । आचार्य जी ने जगह-जगह जलसे करके आन्दोलन को जन-जन तक पहुंचा दिया । पहलवान श्री वैद्य बलवन्तसिंह जी बलियाणा के साथ मोटर-साइकिल पर सवार होकर दिन-रात भाग-दौड़ करके आचार्य जी ने हरयाणा में आन्दोलन की वह अग्नि प्रज्वलित की जिससे पंजाब सरकार कांप उठी । कोने-कोने में सत्याग्रही जत्थे चंडीगढ़ की ओर चल पड़े । शुरू में ये सब जत्थे पैदल चलकर गांव-गांव होते हुये निकले । प्रत्येक गांव में सत्याग्रहियों का भव्य स्वागत हुआ । आचार्य जी आगे जाकर पहले से ही जत्थों की सब व्यवस्था कर देते थे । परिणामस्वरूप हरयाणा के गांव-गांव में सत्याग्रह के लिये भारी उत्साह उमड़ पड़ा । जब सत्याग्रही बहुत अधिक बढ़ गये तो रोहतक में भी सत्याग्रह केन्द्र खोलना पड़ा । २८ जुलाई सन् १९५७ के दिन अनाज मंडी रोहतक में एक विराट् सभा हुई । इसी सभा के बाद स्वामी रामेश्वरानन्द जी को गिरफ्तार कर लिया गया । जनता में भारी उत्साह और रोष की लहर दौड़ गई ।

स्वामी आत्मानन्द जी आदि से परामर्श कर श्री आचार्य जी महाराज ने रोहतक में सत्याग्रह का मोर्चा खोलने के लिये ३० जुलाई की घोषणा कर दी और हरयाणा की जनता से उस दिन भारी संख्या में रोहतक पहुंचने का आह्वान किया । फलस्वरूप यह दिन रोहतक के इतिहास में एक ऐतिहासिक दिन सिद्ध हुआ । इस दिन जिलाधीश की कोठी पर सत्याग्रह किया गया । उस दिन ५० हजार आदमी रोहतक में सत्याग्रह के लिये पहुंचे । लाखों दर्शक अपने घरों से बाहर आकर इस अभूतपूर्व दृश्य को देखने लगे । रोहतक शहर की हर सड़क और गली आदमियों से भरपूर थी । छतों और छज्जों पर भी आदमी लदे थे । भीड़ को पुलिस नियंत्रण में न कर सकी और वह पुलिस की नाकेबन्दी तोड़कर पुलिस लाइन में घुस गई । पुलिस ने लाठीचार्ज कर दिया । इससे ७ सत्याग्रही घायल हो गये । लोगों में रोष हिलोरें मारने लगा परन्तु नेताओं ने भीड़ को अहिंसक बनाये रखा । जिस उत्साह के साथ सत्याग्रही नारे लगाकर आकाश को गुंजा रहे थे वह देखने योग्य था । सरकार के लिए बड़ी ही शर्म और दुविधा की स्थिति थी । हर आदमी उस दिन अपने आपको गिरफ्तार कराना चाहता था किन्तु पुलिस एक को भी गिरफ्तार नहीं करना चाहती थी ।

मुझे अच्छी तरह याद है मैं उस समय भदानी गांव के स्कूल की छठी श्रेणी में पढ़ता था । मैंने देखा उस दिन प्रातः-प्रातः सैंकड़ों आदमी हमारे घर आये और पिता जी से स्वयं सत्याग्रह में चलने का वायदा करने लगे । इनमें अनेक व्यक्ति ऐसे थे जिनका आर्यसमाज या सामाजिकता से किसी प्रकार का कोई नाता नहीं था फिर भी वे अपने आप इस आन्दोलन में कूदने और सत्याग्रह कर जेल जाने को तैयार थे । इसी से अनुमान लगाया जा सकता है कि यह आन्दोलन किस प्रकार घर-घर तक ही नहीं, जन-जन तक पहुंच गया था । उस दिन गिरफ्तार न किये जाने पर घर लौटकर वापिस आये लोगों का पश्चाताप आज भी ज्यों का त्यों मेरी आंखों के सामने है । इस दिन के बाद हरयाणा में और अधिक दमनचक्र प्रारम्भ हुआ । अनेक नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया और वारंट जारी किये गये । ऐसे में सत्याग्रह को चलाना बड़ा कठिन कार्य था परन्तु आचार्य जी की रणनीति ने सरकार के सब हथकंडे विफल कर दिये । उनको ऊपर से यह हिदायत मिली कि वे गिरफ्तार होने से बचें और भूमिगत रहकर सत्याग्रह का संचालन करें । किसी भी सत्याग्रह के सफल संचालन के लिये ऐसे व्यक्तियों का बाहर रहना अत्यावश्यक होता है जिनकी जड़ें जमीन में हों और जिनके इशारे पर लोग आत्मोत्सर्ग के लिये तैयार रहें । ऐसे समय में जबकि सत्याग्रह अपने यौवन पर होता है, प्रत्येक व्यक्ति जेल जाकर जीवित शहीद बनने का प्रयास करता है । वह इस लोभ का संवरण नहीं कर पाता । क्योंकि जेल जाकर आराम से रहा जा सकता है । बाहर रहकर लोहे के चने चबाने पड़ते हैं और आन्दोलन की सफलता के लिये दिन-रात एक करना पड़ता है । पूज्य स्वामी आत्मानन्द जी आदि सभी जानते थे कि आचार्य जी महाराज का बाहर रहना आवश्यक है । इसीलिये उन्होंने आचार्य जी के पास बाहर रहने के लिये बार-बार अपना आदेश भिजवाया ।

कन्या गुरुकुल की कुड़की
आचार्य जी पर अनेक झूठे केस पंजाब सरकार ने बनाये । रोहतक के डिप्टी-कमिश्नर की कोठी पर डाका डालने और उसकी लड़की की चप्पलें चुराने जैसे असत्य, घिनौने और शर्मनाक केस उन पर बना दिये गये जिससे गिरफ्तार होने पर इनको आसानी से मुकदमों में उलझाया जा सके । इसके अतिरिक्त इनकी गिरफ्तारी के लिए कई इनाम घोषित किये गये । कन्या गुरुकुल नरेला की भूमि को कुड़क कराने के आदेश दे दिये गये । २० अगस्त को इनके अपने पैतृक मकान को भी जब्त करने का नोटिस दरवाजे पर चिपका कर मकान को सील (मोहरबन्द) कर दिया । पंजाब, दिल्ली, राजस्थान और उत्तरप्रदेश की पुलिस को आचार्य जी की गिरफ्तारी के लिये सतर्क कर दिया गया ।

आन्दोलन के प्राण

हिन्दी रक्षा सत्याग्रह में आचार्य भगवानदेव भूमिगत रूप में
श्री आचार्य जी ही ऐसे नेता थे जिनसे सरकार सबसे अधिक भयभीत थी । क्योंकि गुप्‍तचर पुलिस की रिपोर्ट से उसको पता चल गया था कि इस आन्दोलन का प्राण कौन है और वह किस प्रकार से आन्दोलन को चला रहा है । परन्तु आचार्य जी महाराज सावधानी से भूमिगत रहकर दिन-रात कार्य में जुटे थे । वे गुरुकुल तथा सम्पत्ति कुड़क किये जाने की बात सुनकर तनिक भी विचलित नहीं हुये । ३० जुलाई को जिस दिन उन्होंने रोहतक में मोर्चे का शुभारम्भ किया उसी दिन दयानन्द मठ में अपने सहयोगी महाशय भरतसिंह आदि के साथ बैठकर आगे के दो मास के सत्याग्रही जत्थों की व्यवस्था उन्होंने पहले ही कर दी थी । इसके अतिरिक्त भी कई-कई नये जत्थे वे प्रतिदिन भेज रहे थे । सत्याग्रही जत्थों के रूप में आचार्य जी के कार्य को देखकर केवल पंजाब पुलिस ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण पंजाब सरकार दंग थी कि यह व्यक्ति कहां से और कैसे यह सब कर रहा है ? सरकार के सामने यह एक बहुत बड़ा प्रश्नचिह्न था जो अन्त तक बरकरार रहा । उन दिनों हरयाणाभर में आबाल वृद्धों में आचार्य जी का नाम चर्चा का विषय था । प्रतिदिन उनके बच निकलने और धुंआंधार कार्य करने की कहानियां सुनी जाती थीं । हम गांव के बच्चों तक में आचार्य जी की चर्चा होती थी । कभी सुनते आचार्य जी आज अमुक वेष बदलकर पुलिस को चकमा देकर निकल गये तो कभी दूसरा वेष बदलने की बात सुनते । एक दिन तो सुना कि वे एक गांव में घिर गये तो उनको हरयाणवी स्त्रियों का घाघरा, कुर्ता और ओढ़ना (पीलिया) पहनकर पुलिस के घेरे से निकलना पड़ा । अब जब हमने उनसे इस संबन्ध में पूछा तो पता चला कि यह तो सत्य है कि अनेक बार पुलिस से बाल-बाल बचे परन्तु बहुत अधिक वेश बदलने की बातें तो अफवाहें थीं । उन दिनों इतना तो अवश्य करना पड़ा कि कटिवस्त्र और ऊपर धारण की जाने वाली चद्दर (उत्तरीय) को छोड़कर वे धोती कुर्ता पहनने लगे । कई बार टोपी भी लगा लेते थे । कभी नंगे सिर तो कभी साफा भी पहन लेते थे । क्योंकि पुलिस के पास आचार्य जी का जो फोटो था वह दाढ़ी वाला था, अतः उन दिनों दाढ़ी भी कटा दी थी । अधिकांशतया साईकल का प्रयोग करते थे क्योंकि अन्य किसी वाहन में बैठने से पकड़े जाने का भय होता था । कई बात तो ५० मील तक साईकल चलानी पड़ती थी । कई बार लगातार जागना तो बहुधा हुआ । अनेक बार भूखे रहकर भी भागते रहते थे परन्तु एक पक्का नियम था – प्रो० शेरसिंह, चौ० देवीलाल आदि को प्रतिदिन के ठिकानों की सूचना करा देते थे और ये दोनों तथा अन्य विशेष व्यक्ति हर दूसरे तीसरे दिन श्री आचार्य जी से मिलकर निर्देश लेते और आगे की योजना बना लेते थे परन्तु यह सब इतना गुप्‍त होता था कि किसी अन्य व्यक्ति को उसकी गन्ध तक नहीं मिल पाती थी ।

एक बार न जाने कैसे पुलिस को पता चल गया कि श्री आचार्य जी रोहणा में हैं । पुलिस ने रोहणा गांव की नाके-बन्दी कर ली और जहां बैठकर आचार्य जी आस-पास के गांवों मे लिये योजना बना रहे थे वे उस घर में भी जा पहुंचे । आचार्य जी को भी पता चल गया । पुलिस के थानेदार का कदम जब घर के बाहर वाले दरवाजे की दहलीज पर था तो आचार्य जी बराबर के दरवाजे से निकल रहे थे । वे महाशय दरियावसिंह रोहणा के साथ बड़ी कठिनाई से उस दिन बच पाये । पुलिस ने उस मकान का घेरा डाल लिया और चप्पा-चप्पा खोज डाला परन्तु आचार्य जी तो निकल चुके थे । वहां से वे कई स्थानों से होते हुए गांव मुखमेलपुर (दिल्ली) पहुंचे । यहां चौ० हीरासिंह जी के यहां रहे । तीन-चार दिन रहकर दिल्ली देहात से जत्थे भेजने की व्यवस्था की । जहां भी वे रुकते वहां शौच स्नानादि के लिये भी सूर्यास्त होने के उपरान्त अंधेरा होने पर ही निकलते थे । बहुत अधिक सावधानी बरतनी पड़ती थी । सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा की ओर से श्री आचार्य जी महाराज को २० साइकलें मिलीं थीं । वे इन्होंने अपने विशेष कार्यकर्त्ताओं को सौंप दीं जो आचार्य जी के आदेशानुसार कार्य कर सत्याग्रह की तैयारी करते थे । उन और उन सरीखे अन्य लोगों के माध्यम से आचार्य जी पूरे आन्दोलन को चला रहे थे । पहले तीन-चार महीने तो स्वयं आचार्य जी भी दौड़ते रहते थे किन्तु ज्यों-ज्यों इनकी गिरफ्तारी के लिये अधिकाधिक सरगर्मियां बढ़ती गईं, इनको अपनी गतिविधियां सीमित कर कार्य की शैली बदलनी पड़ी और उपर्युक्त कार्यकर्त्ता ही कार्य का मुख्य माध्यम बन गये । मुखमेलपुर के बाद श्री आचार्य जी यमुना पार कर उत्तरप्रदेश में चले गये और वहां भी सत्याग्रह की धूम मचा दी । पहले से ही यहां पर आचार्य जी का पर्याप्‍त सम्पर्क बना हुआ था । अतः कार्य में आसानी हुई । यहां भैरा गांव के पास यमुना पर एक कुटिया में कुछ समय रहे । यहां रात्रि में एक दिन श्री जगदेवसिंह जी सिद्धान्ती आचार्य जी से मिलने गये । विस्तार से बातें हुईं और दोनों नेताओं ने भावी योजना की रूपरेखा तैयार की ।

भैरा से श्री आचार्य जी अग्रवाल मंडी (मेरठ जिला) पहुंचे । यहां से ये महाशय प्यारेलाल आर्य सुपुत्र लाला मौजीराम के यहां रहे । वहां से अनेक जत्थे भिजवाये । जहां से भी अधिक जत्थे सत्याग्रह के लिये आने लगते थे, सरकार तुरन्त समझ जाती थी कि आचार्य भगवानदेव जी को उसके आस-पास यहीं होना चाहिये इसलिये वहां पुलिस की सरगर्मी और खुफिया गतिविधियां बढ़ जातीं थीं । यह देख आचार्य जी भी स्थान बदल देते और पुलिस के हाथ नहीं आते थे । ये सरकार के लिये बहुत बड़ा सिरदर्द बन गये थे ।

अग्रवाल मंडी से ये आदर्श नंगला पहुंचे । वहां चौ० मनीराम आर्य मुखिया सुखवीर शास्‍त्री के यहां ठहरे । वहां से सूप गांव, एलम में चौ० रघुवीरसिंह के यहां तथा रसूलपुर में चौ० आशाराम जी के यहां ठहरते हुये सौरों में चौ० कबूलसिंह मन्त्री सर्वखाप पंचायत के पास रुके । वहां से गोहरनी गांव में महाशय कदमसिंह के यहां ठहरते हुये गुरुकुल बणत भी गये । आचार्य जी जहां भी दो-तीन दिन ठहरते वह स्थान सत्याग्रह छावनी का रूप ले लेता और वहीं से जत्थे चंडीगढ़ और रोहतक को चल पड़ते । इन दिनों आचार्य जी रसूलपुर जट्ट (मुजफ्फरनगर) में चौ० आशाराम जी के पास ठहरे हुये थे । उन्होंने आचार्य जी को उड़द की दाल और घी श्रद्धावश पौष्टिक समझकर खिलाया । वह आचार्य जी के अनुकूल नहीं रहा । दिन-रात भाग-दौड़ में निद्रा और विश्राम की कमी तथा प्रतिकूल भोजन के कारण आचार्य जी अस्वस्थ हो गये । ज्वर के साथ खांसी ने दमकसी का रूप धारण कर लिया । आचार्य जी की बीमारी की सूचना पाकर पं० वेदव्रत जी गुरुकुल झज्जर से रसूलपुर जट्ट पहुंचे । विचार-विमर्श के पश्चात् स्वास्थ्य के लिये शुष्क जलवायु वाले स्थान की आवश्यकता अनुभव की गई और वेदव्रत जी आचार्य जी को अपनी जन्मभूमि चिड़ावा (राजस्थान) ले गये ।

मुजफ्फरनगर से मेरठ, दिल्ली, रेवाड़ी, लुहारू होकर चिड़ावा जाने का सीधा और छोटा मार्ग था किन्तु पंजाब सरकार के गिरफ्तारी वारंटों के कारण मुजफ्फरनगर से हाथरस, भरतपुर, जयपुर, सीकर, झूंझनूं होकर लम्बे रेल-मार्ग द्वारा चिड़ावा पहुँचे । वहां पर श्री बृजलाल जी आर्य के पास ठहरे । कुछ दिन पश्चात् उनके गांव घासीकाबास (पो० नूनियां गोठड़ा, जि० झुंझनूं) चले गये और वहां लगभग एक मास ठहरे । पं० वेदव्रत जी उस समय गुरुकुल झज्जर के सहायक मुख्याधिष्ठाता थे । गुरुकुल के संचालन का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व इन्हीं पर था । आचार्य जी की गिरफ्तारी के लिये गुरुकुल झज्जर में भी पुलिस चक्कर लगाती रहती थी । गुरुकुल के मुख्यद्वार पर गिरफ्तारी का नोटिस भी चिपकाया गया था । ऐसे समय में आचार्य भगवानदेव जी के कारण गुरुकुल झज्जर की सम्पत्ति को सरकार की कुड़की आदि से बचाने के लिये आचार्य जी ने विद्यार्य सभा गुरुकुल झज्जर के प्रधान श्री कप्‍तान रामकला को अपना त्याग-पत्र दे दिया था और उन्होंने पं० वेदव्रत जी को गुरुकुल का आचार्य एवं मुख्याधिष्ठाता नियुक्त कर दिया था ।

गोठड़ा में एक विचित्र घटना हुई । श्री बाबू रघुवीरसिंह जी (बहु अकबरपुर) तथा श्री चौ० ओमप्रकाश जी (बलियाणा) आचार्य जी से मिलने नूनियां गोठड़ा पहुँचे । ये मोटर-साइकिल से गये थे किन्तु वह मार्ग में ही खराब हो गई थी अतः इन्होंने उसको पूलियों की एक छ्‍योर में डाल दिया और पैदल ही गोठड़ा पहुँचे । वहां गजाधर जी आदि ने जब इनसे पूछा कि आप कहां से आये हैं तो इन्होंने कह दिया कि हम झज्जर से आये हैं । इनमें से एक ने अपना नाम वेदव्रत बताया । इससे उनको सन्देह हो गया कि ये दोनों अवश्य पंजाब गुप्‍तचर विभाग के हैं और आचार्य जी को गिरफ्तार कराने आये हैं । सन्देह होना इसलिये स्वाभाविक था क्योंकि श्री वेदव्रत जी इनके भाई थे जहां आचार्य जी रुके थे और वे गुरुकुल झज्जर के अधिष्ठाता थे अतः वे समझते थे कि वेदव्रत जी के नाम की सूचना आचार्य जी के पास पहुंचेगी तो वे हमें तुरन्त मिलने के लिये बुला लेंगे । इनको क्या पता था कि नमाज बख्शे जाने पर रोजे भी गले पड़ जायेंगे । जब श्री गजाधर आदि ने सुना कि इन में से एक अपने आपको वेदव्रत बतला रहा है तब उन्हें इन पर पूर्ण सन्देह हो गया । गजाधर आदि ने इनको कहा कि आप बैठें और पड़ोस के अनेक सहयोगियों को बुला लिया । बाबू रघुवीरसिंह जी सरकारी सर्विस में हैं, उन्होंने समझा कि यह राजस्थान की कोई पुलिस चौकी है और यहां फंस गये तो कल ड्यूटी पर जाना कठिन हो जायेगा, अतः वहां से चल पड़े । उनको जाता देखकर गजाधर ने उन्हें पकड़ लिया । जब बाबू जी छुड़ा कर भागने लगे तो उनकी जंघा पर चाकू का वार किया गया । बाबू रघवीरसिंह जी वहां से छुड़ाकर पैदल ही भागते दौड़ते १० किलोमीटर दूर पिलानी पहुंचे । वहां से प्रातःकाल पहली बस द्वारा रोहतक पहुँचकर अपने कार्यालय में जाकर हाजरी लगाई और वेदव्रत जी के पास गुरुकुल झज्जर सूचना भिजवाई । वेदव्रत जी उस दिन गोशाला के लिये चारा संग्रहार्थ मातनहेल गये हुये थे । ब्र० हरिशरण जी ने वहां जाकर उन्हें सूचना दी और वे आचार्य जी के पास राजस्थान गये ।

मिस्‍त्री ओमप्रकाश जी ने अपना नाम गांव आदि बतलाया और अपना ड्राइवरी लाइसेंस भी दिखलाया तब वास्तविकता का ज्ञान हुआ । वहां से एक किलोमीटर दूर घासीकाबास में श्री बृजलाल जी के कुएं पर आचार्य जी के पास उनको ले जाकर मिलाया गया और परस्पर सन्देह के कारण घटी घटना पर पश्‍चाताप किया गया । इससे कम से कम इस बात का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है कि आचार्य जी जहां भी इन दिनों ठहरते थे वहां बड़ी सतर्कता बरती जाती थी और हर आदमी उनसे नहीं मिल सकता था ।

हिन्दी आन्दोलन के काल में पंजाबभर में केवल पूज्य आचार्य जी एक ऐसे नेता थे जो गिरफ्तार नहीं किये जा सके । आपको गिरफ्तार करने के लिये पंजाब सरकार ने सभी उचित अनुचित साधनों का प्रयोग किया । पकड़वाने के लिए पारितोषिक देने की घोषणा से लेकर गोली मार देने तक की धमकियां भी दी गईं । किन्तु सब निष्फल रहीं । जिस प्रकार विदेश जाकर प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सुभाषचन्द्र बोस ने देश की आजादी के लिए आजाद हिन्द फौज का संगठन किया उसी प्रकार परम तपस्वी ब्रह्मचारी आचार्य भगवानदेव ने भी पंजाब से बाहर जाकर सत्याग्रहियों की सेना तैयार की और वहीं से इस सत्याग्रह का सफल संचालन किया । भूखे प्यासे रहकर निरन्तर साइकल द्वारा सफर तथा अत्यधिक श्रम और चिन्ता से आचार्य जी का स्वास्थ्य भी बिगड़ गया परन्तु “कार्यं वा साधयेयं देहं वा पातयेयम्” सदा से आपका जीवनमन्त्र रहा है, अतः कदम पीछे नहीं हटाया । जिस कार्य में आप लग जाते हैं उसमें पूरी शक्ति झोंक देना आपका स्वभाव है । उसके पूरा होते तक दम लेना आपकी आदत में नहीं । गांधी जी के “करो या मरो” सिद्धान्त की आप साक्षात् मूर्ति हैं ।

इस हिन्दी आन्दोलन के समय श्री आचार्य जी के चित्र से युक्त इनकी एक अपील पूरे हरयाणा में बांटी गई थी । उसका एक वाक्य तो आज भी हरयाणा में गुंजायमान है – “हरयाणा के वीर की गर्दन टूट तो सकती है पर झुक नहीं सकती ।” पंजाब सरकार द्वारा हरयाणा के लोगों और सत्याग्रहियों कर किये अत्याचारों के समय इस वाक्य ने संजीवनी का काम किया और अत्याचारों के साथ टकराने का साहस पैदा किया । मैंने यह वाक्य उस समय बालकपन में पढ़ा था परन्तु आज २५ वर्ष बाद भी ज्यों का त्यों याद है ।

१९५७ के शहीद सुमेरसिंह के ग्राम नयावास में
पंजाब सरकार ने इस सत्याग्रह को असफल बनाने के लिये हर प्रकार के हथकंडे अपनाये । प्रारम्भ में सत्याग्रहियों को पकड़-पकड़ कर दूर जंगलों और भयानक स्थानों में छोड़ दिया किन्तु सत्याग्रही दुबारा चण्डीगढ़ पहुँचकर सत्याग्रह करने लगे । तब पुलिस ने सत्याग्रहियों को बुरी तरह मारना पीटना और तपती हुई सड़कों पर घसीटना शुरू कर दिया । नोकदार कीलों वाले बूटों की ठोकर मारना और सत्याग्रहियों को उनसे कुचलना, बाल पकड़कर घसीटना, बलात् मोटरों में ठूंसकर घंटों तक धूप में तपाना, पानी-पानी चिल्लाते हुये सत्याग्रहियों को एक घूंट पानी भी न देना, ओ३म् ध्वज को फाड़ देना और चंडीगढ़ में यज्ञवेदी पर जूतों सहित चढ़कर धार्मिक भावनाओं के साथ खिलवाड़ करना आदि जघन्य कर्म पंजाब पुलिस ने किये । बहु अकबरपुर कांड और फिरोजपुर जेल हत्याकांड ने तो इन अत्याचारों को चरम सीमा तक पहुँचा दिया । इन्हीं अत्याचारों के जवाब में आचार्य जी की उपर्युक्त अपील निकली थी जिससे पंजाब सरकार बौखला उठी थी ।

सत्याग्रह के पश्‍चात् नागरिक अभिनन्दन
वीर शहीद सुमेरसिंह के बलिदान ने तो पूरे आन्दोलन में मानो प्राण फूँक दिये थे । उनका बलिदान साहस, त्याग और आत्मोत्सर्ग का प्रतीक बन गया था । फिर भी आचार्य जी आदि ने इस शहीद की शहादत का जो सम्मान किया उसने तो हर व्यक्ति में बलिदानी भावनायें भर दीं । सत्याग्रह की समाप्‍ति पर रोहतक में जो जलूस निकला उसमें इस शहीद के माता-पिता को हाथी पर बैठाकर शहीद की हजारों-हजारों कंठों ने जो जय-जयकार की वह हरयाणे के इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ बन गई है ।

हिन्दी-रक्षा आन्दोलन देश का एक महत्त्वपूर्ण जन आन्दोलन था । पंजाब के उप-मुख्यमंत्री प्रो० शेरसिंह ने इस आन्दोलन में भाग लेने के लिये अपना पद ठुकराया, हजारों सत्याग्रही जेल गये, जिनमें से प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष रूप में १८ शहीद हुये । अनेक लोगों को चोटें आईं । स्वयं श्री आचार्य जी महाराज का स्वास्थ्य भी उस समय ऐसा बिगड़ा कि फिर सुधर ही नहीं पाया । परन्तु इस आन्दोलन के कारण हरयाणावासियों में नवजीवन का संचार हुआ और आगे चलकर यह आन्दोलन पृथक हरयाणा के निर्माण में सहायक ही नहीं हुआ अपितु आधार बना । इस रूप में यह सत्याग्रह हरयाणा के लिये बहुत बड़ी उपलब्धि सिद्ध हुआ । इस आन्दोलन को चलाने के लिये आर्यजनता ने दान भी बहुत दिया । आन्दोलन की समाप्‍ति पर साढ़े तीन लाख रुपयों से सार्वदेशिक सभा नई दिल्ली का भवन खरीदा । वह भी इसी आन्दोलन की देन है ।

गिरफ्तारी

सब हथकंडों का प्रयोग करके भी सत्याग्रह काल में जब पंजाब पुलिस श्री आचार्य जी को गिरफ्तार नहीं पर पाई तो आन्दोलन की समाप्‍ति पर किसी बहाने से गिरफ्तार करने की योजना बनाई । अन्ततोगत्वा १० फरवरी १९५८ को जालन्धर गोलीकांड के संबन्ध में रोहतक की एक सार्वजनिक सभा में आपत्तिजनक भाषण देने के आरोप में आपको २१ फरवरी को गिरफ्तार कर लिया । तीन-चार दिन जमानत नहीं ली । आचार्य जी की गिरफ्तारी से हरयाणाभर में रोष फैलता देख २४ फरवरी को बीस हजार की जमानत पर आपको छोड़ा गया । इस दिन जब आपको हथकड़ी लगाकर लाया गया तो अदालत के पास दस हजार लोग खड़े आचार्य जी की जयकार और “कैरोंशाही नहीं चलेगी” के नारों से आकाश गुंजा रहे थे । यहां भी पंजाब सरकार ने मुंह की खाई और अपनी झेंप मिटाने के लिये ५ मार्च १९५८ को जुआं ग्राम में आपत्तिजनक भाषण देने का मिथ्या अभियोग लगाकर १२ मार्च को पूर्ववर्ती जमानत कैंसिल करवाकर पुलिस ने आपको पुनः बन्दी बना लिया । २५ मार्च को तीस हजार की जमानत पर पुनः आपको मुक्त कर दिया । ये दोनों अभियोग आप पर लगातार आठ मास चलते रहे और आप इससे हरयाणा की जनता में अधिक लोकप्रिय होते गये । अन्त में सरकार को झुकना पड़ा । ये दोनों केस वापिस ले लिये और पूज्य आचार्य जी को ससम्मान रिहा किया ।

ग्राम नयाबास में हिन्दी सत्याग्रह के बाद भव्य जलूस
सत्याग्रह के लिये किये गये अनवरत कठोर श्रम और भाग-दौड़ से श्री आचार्य जी का स्वास्थ्य बिल्कुल बिगड़ गया । साथ ही गुरुकुल के कार्यभार का उत्तरदायित्व भी वहन करना पड़ता था । गुरुकुल में रहकर ही आपने अपना उपचार प्रारम्भ किया । आचार्य जी स्वयं अच्छे वैद्य हैं । साथ ही वैद्य बलवन्तसिंह भी इनका उपचार करते रहे । उससे लाभ भी हुआ किन्तु पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो पाये । ऐलोपैथिक औषधियों से आपको आरम्भ से ही घृणा रही है, अतः अनेक श्रद्धालु डाक्टरों के कहने पर भी आपने हस्पताल में प्रवेश लेने से निषेध कर दिया । जब बाहर अवस्था का पता चला तो दिल्ली से लाला हंसराज गुप्‍त (भूतपूर्व महापौर दिल्ली) तथा श्री रामनाथ भल्ला कोषाध्यक्ष आर्य प्रतिनिधि सभा पंजाब, गुरुकुल झज्जर आये और आचार्य जी से दिल्ली चलकर नर्सिंग होम में रहकर उपचार कराने का आग्रह करने लगे । आचार्य जी ने अंग्रेजी इलाज कराने से निषेध किया तो इन दोनों सज्जनों ने वचन दिया कि हम आपका इलाज आयुर्वैदिक पद्धति से ही करायेंगे किन्तु सुविधा के लिये नर्सिंग होम में रहना ही अधिक अच्छा रहेगा । बहुत अधिक आग्रह करने पर आचार्य जी तैयार हो गये और दीवानचंद नर्सिंग होम दिल्ली में रखा गया । गुरुकुल से सेवा के लिये पं० ओमप्रकाश कोटवाले (स्वामी यज्ञानन्द) इनके साथ गये । वहां रहते हुये इन्होंने तथा श्री भल्ला जी आदि ने आचार्य जी की बहुत सेवा की । उपचार किया श्री पं० रामगोपाल शास्‍त्री करोलबाग वालों ने । वे आयुर्वेद के सुलझे हुए पंडित और सफल वैद्य थे । अपने उपचार से उन्होंने इनको बहुत शीघ्र ही ठीक कर दिया । लगभग एक मास उपरान्त आचार्य जी गुरुकुल वापिस लौट आये । उसके कुछ समय पश्‍चात् हरयाणा निवासियों पर भयंकर बाढ़ के रूप में एक दैवी विपत्ति आ गई ।

Comment:Cancel reply

Exit mobile version
betbox giriş
betnano giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
rinabet giriş
vaycasino giriş
vdcasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betpark giriş
sekabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
romabet giriş
romabet giriş
betnano giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
nitrobahis giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
yakabet giriş
jojobet giriş
jojobet giriş
batumslot giriş
batumslot
batumslot giriş
galabet giriş
galabet giriş
betplay giriş
betplay giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
galabet giriş
galabet giriş
betamiral giriş
betamiral giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
betpark giriş
betnano giriş
galabet giriş
betnano giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betnano giriş
betasus giriş
norabahis giriş
nitrobahis giriş
betvole giriş
betvole giriş
betkolik güncel giriş
betkolik güncel
betkolik giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betnano giriş
romabet giriş
yakabet giriş
queenbet giriş
queenbet giriş
betnano giriş
winxbet giriş
betamiral giriş
livebahis giriş
grandpashabet giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
grandpashabet giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betbox giriş
betkare giriş
kareasbet giriş
noktabet giriş
extrabet giriş
extrabet giriş
nisanbet giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
betsat giriş
norabahis giriş
norabahis giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betorder giriş
wojobet giriş
wojobet giriş
livebahis giriş
livebahis giriş
nisanbet giriş
nisanbet giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betorder giriş
betsat giriş
betsat giriş
betgaranti giriş
betpark giriş
betyap giriş
betyap giriş
sekabet giriş
sekabet giriş
grandpashabet giriş
betgaranti giriş
galabet giriş
betpark giriş
betpark giriş
galabet giriş
betgaranti giriş
betgaranti giriş
vaycasino giriş
vaycasino giriş
betgaranti giriş
betnano giriş
betnano giriş
holiganbet giriş
holiganbet giriş
maxwin giriş
maxwin giriş
betwoon giriş
betwoon giriş
yakabet giriş
yakabet giriş
betasus giriş
betplay giriş
betplay giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
nitrobahis giriş
noktabet giriş
noktabet giriş
betasus giriş
nitrobahis giriş
winxbet giriş
winxbet giriş
maritbet giriş
maritbet giriş
betkare giriş
betkare giriş
noktabet giriş