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आर्य समाज हमारे क्रांतिकारी / महापुरुष

ऋषि दयानन्द के तप, त्याग व भावनाओं को ध्यान में रखकर हमें उनके वेद-भाष्य सहित सभी ग्रन्थों का स्वाध्याय व आचरण करना चाहिये

– मनमोहन कुमार आर्य

ऋषि दयानन्द संसार के महापुरुषों में अन्यतम थे। उन्होंने जो कार्य किया वह अन्य महापुरुषों ने नहीं किया। उन्होंने ही हमें ईश्वर के सत्यस्वरूप से परिचित कराया है। उनसे पूर्व ईश्वर का सत्यस्वरूप वेद, उपनिषद आदि ग्रन्थों में उपलब्ध था परन्तु देश के न केवल सामान्य जन अपितु विद्वानों को भी उसका ज्ञान नहीं था। आज उनकी कृपा से ईश्वर के सत्यस्वरूप, उसके कार्यों एवं उपासना पद्धति का हमें यथावत् ज्ञान है परन्तु आज भी अधिकांश लोग उसको जानकर उसका लाभ लेना नहीं चाहते। ऐसा करना लोगों की अविद्या के कारण है। मत सम्प्रदायों के आचार्य भी अपने हित व अहित अथवा स्वार्थों सहित अविद्या ही के कारण लोगों का उचित मार्गदर्शन करने में सहयोग व योगदान नही कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में वेदों के जन-जन में प्रचार की प्रतिनिधि संस्था आर्य समाज व इसके विद्वानों को ही वेदों को जन-जन तक पहुंचाने और अविद्या को दूर करने के प्रयत्न करने चाहियें। ऐसा किया भी जा रहा है परन्तु जो हो रहा है उसका परिमाण आवश्यकता से कहीं कम है। इसमें वृद्धि की जानी चाहिये और कम महत्व के कार्यों को सीमित कर ऋषि दयानन्द की इच्छा व भावनाओं के अनुरूप वेदों का प्रचार व प्रसार किया जाना चाहिये। ऐसा करना ही हमारा पुनीत कर्तव्य है। इसी उद्देश्य से ईश्वर ने सृष्टि के आरम्भ में वेदों का ज्ञान दिया था और उसके बाद महाभारत तक वेद प्रचार की अटूट परम्परा रही जिसमें वेदज्ञानी ऋषि-मुनियों ने वेदाध्ययन एवं वेद प्रचार को ही अपने सभी कर्तव्यों में सबसे अधिक महत्व दिया। ऋषि दयानन्द ने तो इस कार्य में अपना पूरा जीवन ही समर्पित किया। यदि वह ऐसा न करते तो आज देश में कोई वेद प्रचार वा धर्म प्रचार की बात न कर रहा होता। आज से भी अधिक अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों का बोलबाला होता। ज्ञान व विज्ञान की अवहेलना अब से अधिक होती। वेद प्रचार से ही अविद्या एवं सभी प्रकार के अज्ञान, अन्धविश्वास, पाखण्ड, कुरीतियों एवं सामाजिक बुराईयों का अन्त किया जा सकता है तथा ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के महान् लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।

ऋषि दयानन्द (1825-1883) के समय में संसार में अविद्या फैली हुई थी। ऋषि दयानन्द भारत में जन्में थे अतः उनका कर्तव्य था कि पहले वह भारत से अविद्या को दूर करें। उन्होंने इस उद्देश्य की पूर्ति के लिये सद्ज्ञान को प्राप्त होने के लिये अपूर्व तप व पुरुषार्थ किया। उन्होंने अपने महान तप से उस वेदज्ञान को प्राप्त किया था जो विगत लगभग पांच हजार वर्षों से विद्वानों के आलस्य व प्रमाद के कारण विलुप्त हो गया था। उनके समय में वेदों के मिथ्या व कल्पित अर्थ प्रचलित थे। ऋषि दयानन्द ने देश के धार्मिक विद्वानों की शरण में जाकर उनसे अपनी शंकाओं का समाधान करने का प्रयत्न किया था। इस प्रयास में वह एक सफल योगी बने थे जो समाधि अवस्था में ईश्वर के साक्षात्कार को प्राप्त होता है। इसके बाद भी वह परा तथा अपरा विद्या की प्राप्ति के लिये प्रयत्नरत थे। उनकी इच्छा वेद-वेदांग के शीर्ष विद्वान दण्डी स्वामी प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द सरस्वती जी को प्राप्त कर पूरी हुई। ऋषि दयानन्द ने स्वामी विरजानन्द जी से तीन वर्ष 1860-1863 तक वेद-वेदांगों का अध्ययन किया था। इस अध्ययन, योग में उनकी उच्च स्थिति तथा पवित्र धार्मिक जीवन से उन्हें वेदों को प्राप्त कर वेदांगों की सहायता से वेदों के सत्य वेदार्थ को जानने की योग्यता प्राप्त हुई थी। उन्होंने अपनी योग्यता का लाभ अपने निजी जीवन में लाभ तक ही सीमित नहीं रखा अपितु अपने गुरु स्वामी विरजानन्द सरस्वती की प्रेरणा व अपने सत्संकल्पों से वेदविद्या के प्रकाश से संसार को आलोकित करने का पुरुषार्थ किया। उनके प्रयत्न बड़ी मात्रा में सफल हुए। यदि अविद्यायुक्त मत-मतान्तरों के उनके विरोधी आचार्य व अनुयायी उनका विरोध न करते तथा उनकी जीवन हानि न होती तो वह कहीं अधिक कार्य करते जिससे संसार से अज्ञान का नाश तथा ज्ञान व विद्या का पूर्ण प्रकाश हो जाता। उन्होंने जो कार्य किया वह संसार से अज्ञान को दूर करने में समर्थ व प्रायः पर्याप्त है।

ऋषि दयानन्द ने अपने जीवन काल में सृष्टि की आदि में परमात्मा से उत्पन्न चार वेद ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद पर भाष्य करना आरम्भ किया था। उन्होंने ऋग्वेद आंशिक तथा यजुर्वेद का सम्पूर्ण भाष्य किया है। उनका किया हुआ संस्कृत व हिन्दी का वेदभाष्य अर्थात् वेदार्थ अपूर्व एवं अन्यतम है। ऋषि दयानन्द के अनुयायियों ने वेदों के शेष भाग का हिन्दी भाष्य पूरा किया है। सामवेद का संस्कृत व हिन्दी दोनों ही भाषाओं में ऋषितुल्य आचार्य डा. रामनाथ वेदालंकार जी का भाष्य उपलब्ध है। आज हमें ऋषि के अनुयायी विद्वानों के किए अनेक वेदभाष्य प्राप्त हैं जिससे हम वेदों के बीस हजार से अधिक मन्त्रों में से प्रत्येक मन्त्र का वेदांगों की सहायता से किया गया सत्य भाष्य व वेदार्थ जान सकते हैं। यह ऋषि दयानन्द जी की बहुत बड़ी देन है। वेदभाष्य से इतर ऋषि दयानन्द ने आर्यभाषा हिन्दी मंक अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे हैं। सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, आर्याभिविनय, संस्कारविधि, पंचमहायज्ञविधि, गोकरुणानिधि, व्यवहारभानु आदि उनके प्रमुख ग्रन्थ हैं। उनका पत्रव्यवहार एवं जीवन-चरित भी अध्ययन व स्वाध्याय के लिये उत्तम कोटि के ग्रन्थ हैं। इनका अध्ययन कर मनुष्य अपने जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य को जान सकता है तथा उन्हें प्राप्त करने के साधन, उपाय व विधि भी उसे ऋषि के ग्रन्थों से विदित होती है। उसी को धर्म पालन भी कहा जाता है। मनुष्य को पंच महायज्ञ करने होते हैं। इनको करके मनुष्य धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त होता है। मनुष्य की आत्मा का जन्म व पुनर्जन्म जिसे आवागमन कहते हैं, इस आवागमन से छूट कर मोक्ष प्राप्ति के लिये ही वेदों में धर्म पालन का विधान है। यह पूरा विधान ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों मुख्यतः सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं वेदभाष्य आदि को पढ़कर ज्ञात होता है। ऋषि के ग्रन्थों के साथ उपनिषद, दर्शन, ब्राह्मण आदि ग्रन्थों के अध्ययन से भी ज्ञान की वृद्धि एवं ईश्वर प्राप्ति की प्रेरणा मिलती है व ईश्वर प्राप्त भी होता है। अतः सभी मनुष्यों को अपने मनुष्य जीवन को सफल करने के लिये ऋषि दयानन्द के ग्रन्थों का आश्रय लेना चाहिये। उन्हें मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त मान्यताओं को अपनाकर अपना दुर्लभ मनुष्य-जीवन व्यर्थ नहीं करना चाहिये। ऐसा नहीं करेंगे तो मनुष्य जीवन सफल नहीं होगा, ऐसा हमें वैदिक साहित्य के अध्ययन से स्पष्ट प्रतीत होता है।

ऋषि दयानन्द के जीवन चरितों को पढ़कर उनके तप, त्याग तथा पुरुषार्थ का ज्ञान मिलता है। उन्होंने अप्राप्त ज्ञान को प्राप्त कर उसे जनसामान्य को सुलभ कराया। यदि वह ऐसा न करते तो आज सम्पूर्ण मनुष्य जाति वेद विषयक उस ज्ञान से अपरिचित होती जिससे वह अब ऋषि दयानन्द के कारण परिचित है। ऋषि दयानन्द की एक मुख्य देन यह भी है कि उन्होंने अपने सभी ग्रन्थों का हिन्दी में प्रणयन किया है। उनके सभी ग्रन्थों के अंग्रेजी व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुए हैं। अतः ऋषि दयानन्द द्वारा प्रदत्त ज्ञान का सभी मनुष्य अध्ययन कर लाभ उठा सकते हैं। ईश्वर का सत्यस्वरूप तथा उसके गुण, कर्म व स्वभाव का जैसा ज्ञान उनके ग्रन्थों में प्राप्त होता है वैसा विश्व साहित्य में प्राप्त नहीं होता। ईश्वर की प्राप्ति ईश्वर के ध्यान, चिन्तन-मनन व समाधि द्वारा होती है। इसका पूरा विज्ञान हमें ऋषि के ग्रन्थों व वैदिक साहित्य में प्राप्त होता है। ईश्वर को जानना व उसे योग विधि से प्राप्त करना ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है। यह अन्यथा प्राप्त नहीं होता। इसके लिये वेदज्ञान को प्राप्त होकर उसके अनुरूप कर्म व उपासना करना ही मुख्य साधन होता है। ऐसा ही हमारे पूर्वज सभी ऋषि, मुनि, विद्वान व आचार्य किया करते थे। हमें भी ऋषि के जीवन तथा वैदिक साहित्य के सत्य सिद्वान्तों का अनुसरण करना है तथा मत-मतान्तरों की अविद्यायुक्त शिक्षाओं से बचना है। यदि हम मत-मतान्तरों से जुड़ते हैं तो हम अविद्या से दूर नहीं हो सकते। आर्यसमाज कोई मत व सम्प्रदाय नहीं है अपितु यह वेद प्रचार, विद्या प्राप्ति, धर्म एवं देश रक्षा, समाज सुधार तथा श्रेष्ठ समाज के निर्माण का एक आन्दोलन है। अतः आर्यसमाज से जुड़ कर ही हम अपने जीवन को सफल कर सकते हैं तथा मोक्षगामी हो सकते हैं।

ऋषि दयानन्द ने विद्या प्राप्त करने के लिये जो पुरुषार्थ किया उसे जानकर उनके प्रति श्रद्धा से सिर झुकता है। इतना पुरुषार्थ, तप व त्याग शायद ही जीवन में किसी महापुरुष ने किया हो। उन्होंने अपने जीवन में अप्राप्त व विलुप्त सत्य ज्ञान की प्राप्ति के असम्भव कार्य को सम्भव किया और उसे सभी मनुष्यों तक पहुंचाने के भी अपूर्व कार्य किये। हमें ऋषि दयानन्द की भावनाओं को समझना व अनुभव करना चाहिये। वह सारे संसार को अविद्या से मुक्त तथा विद्या से युक्त कर मनुष्य को परम पद मोक्ष प्रदान कराना चाहते थे। हम भी उनके साहित्य का अध्ययन व आचरण कर परम पद के पथिक बन सकते हैं। हमारा कर्तव्य है कि हम ऋषि दयानन्द के सभी साहित्य व ग्रन्थों सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका, संस्कारविधि, आर्याभिविनय, पंचमहायज्ञविधि सहित उनके वेदभाष्य, जीवनचरित आदि का अध्ययन करें। ऐसा करके हम अपनी आत्मा की उन्नति करने में सफल होंगे और साथ ही हम ऋषि दयानन्द के प्रति कृतघ्नता के दोष से भी मुक्त होंगे। सभी मनुष्यों को मत-मतान्तरों से ऊपर उठकर ऋषि ग्रन्थों का अध्ययन कर अपने जीवन की उन्नति करने सहित उनके ऋण से उऋण होना चाहिये। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो विश्व की श्रेष्ठतम वैदिक धर्म व संस्कृति की रक्षा नहीं हो सकेगी। हमें ऋषि दयानन्द के तप, त्याग व भावनाओं को समझना चाहिये और उनकी सभी हितकर बातों को आचरण में लाकर उनके प्रति कृतज्ञ व नतमस्तक होना चाहिये। ओ३म् शम्।

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