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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

कांग्रेस का बेअसर नेतृत्व

congress imageमोदी सरकार के विरूद्घ कांग्रेस ने मोर्चा खोल रखा है। विरोध लोकतंत्र में आवश्यक होता है पर उसकी अपनी सीमाएं हैं। सकारात्मक विरोध सरकार के लिए नकेल का काम करता है, और उसे स्वेच्छाचारी बनने से रोकता है। स्वेच्छाचारिता लोकतंत्र को प्रतिबंधित और संकीर्ण करती है। लोकतंत्र में यह दुर्गुण प्रविष्ट न होने पाये, इसलिए लोकतंत्र में ‘आवाज उठाने’ को व्यक्ति का और राजनीतिक दलों का मौलिक अधिकार माना गया है। जिससे कि समय रहते आवाज उठे और सरकार सचेत हो जाए।

कांगे्रस ने अपने इस मौलिक अधिकार का कुछ अधिक प्रयोग कर लिया है। इसलिए देश के 56 प्रतिशत लोग उसके इस अधिकार को अब ‘दुरूपयोग’ में परिवर्तित होते देख रहे हैं। दुरूपयोग का परिणाम कांग्रेस भोग रही है, तभी तो उसके 25 सांसद लोकसभा से निलंबित चल रहे हैं। संसद का बहुत ही मूल्यवान समय नष्ट हो रहा है, देश अपने जनप्रतिनिधियों को विधायी कार्य निस्तारित करने के लिए वहां भेजता है। परंतु हम देख रहे हैं कि संसद में विधायी कार्य न होकर ‘विदाई कार्य’ (किसी का निलंबन तो किसी के त्यागपत्र की मांग) होने लगा है।

अब मोदी सरकार ने नागा शांति समझौते को संपन्न किया है, जिस पर उनके धुर विरोधियों ने उसकी सराहना की है। इस समझौते के होने से उन विदेशी शक्तियों को भी झटका लगा है जो भारत की एकता और अखण्डता को समाप्त करने के षडय़ंत्रों में सम्मिलित रहती है।

कांग्रेस नेतृत्व का निर्णय इस पर देशवासियों को स्तब्ध करने वाला रहा है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस शांति समझौते का भी विरोध किया है। सारा देश मां बेटों को इस शांति समझौते के विरोध में खड़ा देखकर स्तब्ध रह गया। लोगों को लगा कि कांग्रेसी नेतृत्व इस समय मानसिक दीवालियेपन से ग्रस्त है। इसका अतार्किक स्वरूप देश की मान मर्यादा और गौरवमयी लोकतांत्रिक परंपराओं के विरूद्घ है। राहुल गांधी की अपरिपक्वता और निर्णय लेने में दिखायी देने वाली शीघ्रता की प्रवृत्ति उनकी वाणी को असंतुलित और बुद्घि को अतार्किक बना रही है, जिससे उनके निर्णयों में कोई गंभीरता नही होती। यदि ऐसा व्यक्ति देश के ‘छाया-मंत्रिमंडल’ में प्रधानमंत्री है तो इसे देश के लिए अच्छा नही कहा जा सकता।

नागा शांति समझौते के विरोध में खड़ी कांग्रेस से भाजपा ने उचित ही पूछा है कि इस समझौते का विरोध करके कांग्रेस अंतत: किसके हितों का पक्षपोषण कर रही है? सोनिया गांधी पर उनके विरोधी आरोप लगाते रहे हैं कि पूर्वोत्तर भारत में लोगों का जिस प्रकार तेजी से ईसाईकरण हुआ है उसके मूल में सोनिया गांधी का ‘आशीर्वाद’ है। कांग्रेस के पास इस समय जो नीति निर्धारक मंडल है, वह गंभीर नही है। जहां पूजनीय वृद्घों का अपूजन होता है, वहां मरण, भय और अकाल (वैचारिक चिंतन की उत्कृष्टता का नितांत अभाव) उत्पन्न हो ही जाता है। कांग्रेस आज अपने किये का फल भोग रही है और लगता है कि उसने अभी अपने अतीत से कोई शिक्षा नही ली है।

कांग्रेस देखे कि उसके अपरिपक्व, अतार्किक और असंतुलित नेतृत्व का जनता पर क्या प्रभाव पड़ रहा है? नकारात्मक सोच से देश की ऊर्जा और समय का कांग्रेस नकारात्मक दिशा में प्रयोग करा रही है। जिससे लोगों में निराशा उत्पन्न हो रही है।

जहां तक कांग्रेस के पच्चीस सांसदों के निलंबन की बात है तो लोकसभा अध्यक्ष सदन की गरिमा और अपने सम्मान के दृष्टिगत ऐसे निर्णय पूर्व में भी लेते रहे हैं। ऐसा कांग्रेसी शासनकाल में भी हुआ है। सोनिया के पति और राहुल के पिता राजीव गांधी के शासन काल में तो एक सरकारी प्रस्ताव के माध्यम से एक साथ 63 सांसदों का निलंबन किया गया था। इतने अधिक सांसदों का एक साथ निलंबन भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में आज तक नही देखा गया। सचमुच भारत के संसदीय लोकतांत्रिक स्वरूप को इन तिरेसठ सांसदों के निलंबन ने विद्रूपित किया था। पर कांग्रेस को उस समय इस कार्य में तनिक भी ‘अनौचित्य’ दिखायी नही दिया था। वही कांग्रेस आज धर्म और नैतिकता की दुहाई दे रही है तो लोगों को उसका कार्य अच्छा नही लग रहा है।

कांग्रेस को अपनी पराजय के पश्चात अपना अंतरावलोकन करना चाहिए था कि कमी कहां रही और हमें अपने आपको कहां से सुधार लेना चाहिए? पिछले साल तक सोनिया राहुल एक ‘बेअसरदार सरदार’ के कंधों पर बंदूक रखकर उसे चलाते रहे, जिससे लोगों को भी अनेकों बार घायल होना पड़ा। अति तो उस समय हो गयी थी जब अपने ‘बेअसरदार सरदार’  के ही एक विधेयक को कांग्रेस के ‘युवराज’ ने फाडक़र फेंक दिया था। यह थी लोकतंत्र की हत्या और यह था लोकतांत्रिक संस्थानों के साथ किया जाने वाला ‘क्रूर उपहास’। ‘बेअसरदार सरदार’  का उस समय स्वाभिमान मर चुका था, अन्यथा उसे उसी समय त्यागपत्र देकर सत्ता ‘मां बेटों’ को सौंप देनी चाहिए थी। यदि वह ऐसा कर देते तो कांग्रेस के युवराज को ज्ञात हो जाता कि ‘अलोकतांत्रिक और अपरिपक्व’ निर्णयों का परिणाम क्या होता है? देश को सही दिशा देने में कांग्रेस की आज भी महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। आज उसकी सदस्य संख्या लोकसभा में चाहे 44 है, पर यह डबल ‘चौका’ का अंक है, जिसे कतई ‘बेअसरदार’   नही माना जा सकता, पर पिछले दस वर्षों में (2004 से 2014 तक) वह ‘बेअसरदार’ निर्णयों की शिकार रही है, इसलिए बेअसरदारी को लगता है कांग्रेस ने अपनी नियति मान लिया है, या चरित्र में सम्मिलित कर लिया है। कांग्रेस के गंभीर नेता सामने आयें,  और नेतृत्व को गंभीर बनायें।

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