दुनिया के बाजार में बदलावों का दौर

डॉ. भरत झुनझुनवाला

विश्व अर्थव्यवस्था के मंदी में प्रवेश करने के संकेत मिल रहे हैं। चीन ने अपनी मुद्रा युआन का हाल में अवमूल्यन किया है चूंकि उस देश द्वारा बनाए गए माल की विश्व बाजार में बिक्री नहीं हो रही थी। युआन का मूल्य कम होने से अमेरिकी खरीदार के लिए चीन का माल सस्ता पड़ेगा। चीन को आशा है कि उसका माल सस्ता होने से बिक्री बढ़ेगी और वह मंदी से बच सकेगा। मंडी में खरीदार न हो तो सब्जी विक्रेता द्वारा आलू के दाम घटा दिए जाते हैं। युआन के टूटने के साथ अमेरिका में भारत का माल महंगा पड़ेगा। एक सब्जी वाले द्वारा आलू के दाम घटाने पर अन्य सब्जी वालों को भी दाम कम करना पड़ता है। अत: भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपए को भी टूटने दिया है। आने वाले समय में इस क्रम में विएतनाम, बंगलादेश और ब्राजील जैसे दूसरे देशों को भी अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना होगा।

समस्या का मूल कारण विश्व बाजार में मांग का अभाव है। इस अभाव का कारण अमेरिका तथा इंग्लैंड की प्रतिस्पर्धा शक्ति में कमी है। पचास के दशक में अमेरिका तथा इंग्लैंड में बनी शेवरले और मॉरिस गाडिय़ां भारत में बिक रही थीं। भारत में इनका उत्पादन नहीं होता था। शेवरले बनाने वाली जनरल मोटर्स द्वारा कार का ऊंचा दाम वसूल किया जा रहा था, चूंकि भारत में कार बनती ही नहीं थी। इन ऊंचे मूल्यों का एक हिस्सा अमेरिकी श्रमिकों को मिल रहा था। फलस्वरूप अमेरिका में वेतन ऊंचे थे। इन ऊंचे वेतन के दम पर अमेरिकी नागरिक चीन के माल की खपत कर रहे थे।

ग्लोबलाइजेशन ने इस तस्वीर को पलट दिया है। आज भारत में निर्मित कारों का निर्यात अमेरिका और इंग्लैंड को हो रहा है। अमेरिका में मैन्यूफैक्चरिंग में कार्यरत श्रमिक बेरोजगार हो रहे हैं। उनके वेतन में कटौती की जा रही है। विकसित देशों के श्रमिकों के पास भारत और चीन में बने माल को खरीदने की क्रयशक्ति नहीं है। नतीजतन इन देशों का माल नहीं बिक रहा है अतएव चीन को अपनी मुद्रा का दाम घटाना पड़ा है। चीन के इस कदम की सफलता के आसार कम हैं, चूंकि अन्य देश भी अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करेंगे। मंडी में सभी विक्रेता आलू का दाम कम कर दें तो किसी की भी बिक्री में वृद्धि नहीं होगी। दूसरा कारण है कि क्रयशक्ति के अभाव में अमेरिकी खरीदार चीनी माल खरीदने में असमर्थ हैं। जेब में पैसा न हो तो शोकेस में टंगे कपड़े के मूल्य में गिरावट का कोई अर्थ नहीं रह जाता।

विकसित देशों की यह स्थिति 2008 के संकट के पूर्व पैदा हो गई थी। इस बीमारी को कुछ दिनों के लिए दबा दिया गया था, जैसे पेन किलर देकर रोगी के दर्द को भुला दिया जाता है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने 2008 के बाद भारी मात्रा में डॉलर छापे। अमेरिकी सरकार ने भारी मात्रा में कर्ज लिए। इस धन से अमेरिकी उपभोक्ताओं को सस्ते कर्ज उपलब्ध कराए गए। प्रमाण है कि के्रडिट कार्डधारकों द्वारा लिए गए उधार में पिछले दिनों भारी वृद्धि हुई है। आज अमेरिकी अर्थव्यवस्था उस जमींदार सरीखी है जिसकी जमींदारी समाप्त हो गई है और अपने ठिकाने को गिरवी रखकर वह चीन में बने सस्ते माल की खपत कर रहा है। कर्ज के बल पर खपत करने की एक सीमा है। अब यह सीमा दिखने लगी है। नतीजतन अब अमेरिकी क्रेडिट कार्डधारक और कर्ज लेकर चीन के माल को खरीदने के लिए तैयार नहीं हैं। इसलिए चीन का माल नहीं बिक रहा है और चीन को अपनी मुद्रा का अवमूल्यन करना पड़ा है।

मौजूदा मंदी का भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि विश्व अर्थव्यवस्थाओं में विशेषकर विकसित देशों में नई मांग पुन: उत्पन्न् होती है या नहीं। इस मुद्दे का एक पक्ष है कि नए माल के आविष्कार से मांग पुन उत्पन्न् होगी। 1995 के बाद ऐसी मंदी उपजी थी जिसकी चपेट में पूर्वी एशिया के टाइगर देश आ गए थे। वह मंदी वर्ष 2000 के बाद छूमंतर हो गई। उस समय कंप्यूटर और इंटरनेट का तीव्र विकास हुआ। कंप्यूटर और मोबाइल फोन की मांग पैदा हुई। दूसरी तरफ मशीनों के बढ़ते उपयोग के कारण रोजगार के अवसर कम हो रहे हैं। आज तमाम एटीएम लग गए हैं, जहां आप मनचाहे समय पर अपने खाते से कैश निकाल सकते हैं। बैंक में कैशियर के रोजगार में कमी आई है। पूर्व में सैकड़ों टैक्सी और ऑटो रिक्शों से लोग गंतव्य स्थान को जाते थे। आज एक मेट्रो ट्रेन से यह काम हो जाता है।

इस प्रकार मांग पर दो परस्पर विरोधी प्रभाव पड़ रहे हैं। नए उत्पादों से माल की मांग बढ़ रही है, जबकि ऑटोमेटिक मशीनों के कारण रोजगार घट रहे हैं और तदनुसार मांग घट रही है। इन दोनों प्रभावों में नए उत्पादों का आविष्कार अनिश्चित रहेगा जबकि ऑटोमेटिक मशीनों के कारण रोजगार का घटना निश्चित रहेगा। वर्तमान में मोबाइल सरीखे नए आविष्कार नहीं दिख रहे हैं, इसलिए मेरे आकलन में मंदी का दौर गहराएगा, न कि घटेगा।

इस परिदृश्य में सरकार को अपनी आर्थिक नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। सरकार का प्रयास है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित कर विश्व बाजार के लिए भारत में माल का उत्पादन किया जाए। यह सफल नहीं होगा। इस प्रयास की सफलता में संदेह इसलिए है कि जब मंडी में खरीदार नहीं होता तो किसान आलू की बुआई नहीं करता। इसी क्रम में विश्व बाजार में मांग के अभाव में बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत में बड़ा निवेश नहीं करेंगी। इसलिए मेक इन इंडिया पर पुनर्विचार करना चाहिए। सरकार को घरेलू बाजार में मांग बढ़ाने के उपाय खोजने चाहिए। ऑटोमेटिक मशीनों पर प्रतिबंध लगाते हुए रोजगार सृजन के उपाय लागू करना चाहिए। ऐसा करने से विश्व बाजार में मंदी गहराई, तो भी घरेलू बाजार में मांग बनी रहेगी और हम मंदी की मार से बच सकेंगे।

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