अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को अपने साहस से झकझोर दिया था शहीद भगत सिंह ने

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युद्धवीर सिंह लांबा 

शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को फैसलाबाद जिले के जरांवाला तहसील स्थित बंगा गांव में हुआ था। भगत सिंह पंजाब के लायलपुर के जिस बंगा गांव में पैदा हुए वह अब पाकिस्तान में है, जो अब फैसलाबाद कहलाता है।

‘शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरने वालों का यही बाक़ी निशाँ होगा।।
कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे।
जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा’।।

1916 में कवि जगदंबा प्रसाद मिश्र द्वारा देशभक्ति की लिखी कविता की ये पंक्तियां देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते अपना सर्वस्व न्यौछावर करने खासकर भगत सिंह और उनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरु के लिए बेमानी साबित हो रही हैं। 

अंग्रेजी हुकूमत की जड़ों को अपने साहस से झकझोर देने वाले शहीद-ए-आजम भगत सिंह का जन्म 28 सितंबर, 1907 को फैसलाबाद जिले के जरांवाला तहसील स्थित बंगा गांव में हुआ था। भगत सिंह पंजाब के लायलपुर के जिस बंगा गांव में पैदा हुए वह अब पाकिस्तान में है, जो अब फैसलाबाद कहलाता है। 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में प्रदर्शन करने वालों पर अंग्रेज सरकार ने लाठीचार्ज करवा दिया था, जिसमें लाला लाजपत राय की मौत हो गई। इस लाठीचार्ज के जिम्मेदार पुलिस अफसर जॉन सांडर्स को 17 दिसंबर 1928 को राजगुरु, सुखदेव और भगत सिंह ने गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया था। 
अंग्रेजी हुकूमत को अपनी आवाज सुनाने और अंग्रेजों की नीतियों के प्रति विरोध प्रदर्शन के लिए 8 अप्रैल, 1929 को सेंट्रल असेंबली नई दिल्ली में पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिसप्यूट बिल पेश होने के दौरान भगत सिंह और बीके दत्त ने बम फेंका था। दोनों चाहते तो भाग सकते थे, लेकिन दोनों ने हंसत-हंसते आत्मसमर्पण कर दिया। अपनी फांसी से एक दिन पहले 22 मार्च 1931 को भगत सिंह ने अपने साथियों को एक आखिरी खत भी लिखा था कि ‘मुझे फांसी होने के बाद देश की खातिर कुर्बानी देने वालों की तादाद बढ़ जाएगी’।
23 मार्च 1931 को शाम 7 बजकर 33 मिनट पर ब्रिटिश सरकार ने भारत के तीन सपूतों भगत सिंह और उनके दो साथियों सुखदेव व राजगुरू को फांसी पर लटका दिया था। देश में तीनों की फांसी को लेकर जिस तरह से लोग विरोध और प्रदर्शन कर रहे थे, उससे अंग्रेज सरकार डर गई थी। तीनों सपूतों को फांसी 24 मार्च 1931 की सुबह दी जानी थी, लेकिन ब्रिटिश सरकार को माहौल बिगड़ने का डर था, इसलिए नियमों को दरकिनार कर एक रात पहले ही तीनों क्रांतिकारियों को चुपचाप लाहौर सेंट्रल जेल में फांसी पर चढ़ा दिया गया।

देश की आजादी के लिए मर मिटने वाले सरदार भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की शहादत को कभी भी नहीं भुलाया जा सकता है। ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा बुलंद करके नौजवानों के दिलों में आजादी का जुनून भरने वाले भगत सिंह का नाम इतिहास के पन्नों में अमर है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि आजादी मिलने के बाद भगत सिंह के साथ-साथ सुखदेव और राजगुरु को भी शहीद घोषित करने से सरकारें परहेज कर रही हैं।  शहीद भगत सिंह का कहना था कि –

‘ज़िन्दगी तो अपने दम पर ही जी जाती है दूसरों के कन्धों पर तो सिर्फ जनाजे उठाये जाते हैं।’

भारत सरकार को अब चाहिए कि वह अविलंब सरकारी रिकॉर्ड में वतन पर अपनी जान न्योछावर करने वाले भगत सिंह के साथ साथ सुखदेव और राजगुरु को भी शहीद का दर्जा दे।

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