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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

गीता प्रेस के लिए प्राणसंकट?

विश्व को ज्ञान विज्ञान का मार्ग दिखाने वाले ‘विश्वगुरू’ भारत के विषय में आज का सच यह है कि यहां हिंदी पुस्तकों के पाठक अन्य देशों की अपेक्षा बहुत कम हैं। देहात में अशिक्षा अधिक है, जो लोगों को पुस्तकों से दूर करती है तो शहरों में हर वस्तु के प्रति व्यक्ति के दृष्टिकोण में व्यावसायीकरण की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गयी है-इसलिए वहां वह चीज ही पसंद की जाती है जिससे ‘अर्थलाभ’ मिले। अर्थलाभ पुस्तकों से तो मिलता नही और जो आध्यात्मिक ज्ञान लाभ इनसे मिलता है उसे ‘व्यर्थलाभ’ माना जाने लगा है। ऐसी परिस्थितियों के निर्माण में वर्तमान शिक्षा प्रणाली का सबसे अधिक योगदान है।

भारत में ‘गीता प्रेस गोरखपुर’ सबसे सस्ता साहित्य उपलब्ध कराने वाला प्रकाशन है। इस प्रकाशन ने अब तक 55 करोड़ पुस्तकें प्रकाशित की हैं। 92 वर्ष के अपने गौरवपूर्ण इतिहास में इतनी बड़ी उपलब्धि प्राप्त करना अपने आप में एक कीर्तिमान है। इस प्रकाशन ने स्वतंत्रता संग्राम के काल में भी एक से बढक़र एक ऐसी पुस्तकें लोगों को उपलब्ध करनयी जिसने स्वतंत्रता संग्राम को अग्नि को तेज करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। आज भी इस प्रकाशन के ‘बलिदान अंक’ और ‘फांसी अंक’ लोगों में रोमांच उत्पन्न कर देते हैं। बड़े अध्यवसाय और विशेष प्रयत्नों से ऐसी सामग्री तैयार हो पाती है, जो लोगों का मार्गदर्शन कर सके, और देशभक्ति की भावना उत्पन्न कर उन्हें देश और समाज के प्रति गंभीर और उत्तरदायी बना सके। इस क्षेत्र में ‘गीता प्रेस’ ने सराहनीय भूमिका निभाई।

आज जब लोगों का दृष्टिकोण पूर्णत: व्यावसायिक होकर रह गया है तब कहीं ऐसा प्रकाशन खोजना कि जो आज भी नि:स्वार्थ भाव से देश सेवा कर रहा हो बड़ा कठिन है। पर ‘गीताप्रेस’ इस कठिनता को सरल करता रहा है। देश के बहुत बड़े क्षेत्र में पाठकों को सस्ता साहित्य उपलब्ध कराकर ‘गीताप्रेस’ लोगों में अपने धर्म, अपनी संस्कृति और अपने बलिदानी इतिहास के प्रति गौरव का भाव उत्पन्न करती रही है। इस देश के सांस्कृतिक जागरण की जब भी बातें की जाएंगी तो उस समय ‘गीताप्रेस’ का नाम अवश्य लिया जाएगा। जब-जब देश में स्वधर्म स्वसंस्कृति स्वदेश, स्वराष्ट्र, स्वराज्य इत्यादि ‘स्व’ के तेज: पुंज शब्दों-शब्दार्थों और देश को झकझोर देने वाले इन संस्थात्मक शब्दों की व्याख्या परिभाषा और गरिमा पर विचार किया जाएगा तो उस समय भी ‘गीताप्रेस’ का नाम बड़े सम्मान से लिया जाएगा। आज भारत में परिवर्तन की लहर चल रही है। भारत युवाओं का देश है।

इस देश में विश्व के किसी देश की अपेक्षा अधिकतम जनसंख्या ऐसी है जो युवा है। युवा सदा ‘परिवर्तन’ का नाम रहा है, क्रांति नाम रहा है। युवा हो और क्रांति ना करे यह असंभव है। हर घर में नई पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के विचारों में जो टकराव चलता है वह भी युवा पीढ़ी के द्वारा क्रांति की चाह रखने के कारण ही चलता है।

यह अलग बात है कि आज की युवा पीढ़ी कई बार आधुनिकता के फूहड़पन के नाम पर बीते हुए कल की चीजों को बदल देना चाहती है। उसकी यह सोच संस्कारों में आ रही गिरावट का परिणाम है। इस गिरावट को भी रोकने का काम ‘गीताप्रेस’ करती रही है।

इस प्रकाशन का उद्देश्य रहा है कि शिक्षा को संस्कारप्रद बनाया जाए। संस्कारप्रद शिक्षा मनुष्य को पहले मनुष्य बनाती है। फिर उसे किसी का पुत्र, किसी का, पति किसी का भाई, किसी का पिता इत्यादि बनाती है। जब वह यह सब कुछ बना चुका होता और पुत्र पति पिता आदि की भूमिकाओं के भ्रमजाल में से भी निकल आता है तो उस समय उसे इन संबंधों से संबंध-विच्छेद कराके उसे इन सबके प्रति सहज और सरल बनाती है। संबंध विच्छेद का अभिप्राय संबंधों के प्रति उदासीन हो जाना नही है अपितु निरपेक्षभाव बरतना है। समभाव बरतना है। ‘गीताप्रेस’ ऐसी ही संस्कार प्रद शिक्षा व्यवस्था को लागू करने का एक ‘आंदोलन’ रहा है।

आज यह प्रकाशन अभूतपूर्व संकट से गुजर रहा है। वेतनवृद्घि की मांग को लेकर कर्मचारी हड़ताल पर चल रहे हैं। सहायक प्रबंधक के साथ कुछ कर्मचारियों ने अभद्रता की तो प्रबंधन ने 17 कर्मचारियों को निलंबित कर दिया। अब वेतन वृद्घि और इन निलंबित कर्मचारियों की बहाली को लेकर कर्मचारी हड़ताल हैं। इस हड़ताल का अभी कोई अंत होता नही दिख रहा है।  प्रकरण का पेंच फंसता जा रहा है। जिससे हड़ताल की अवधि बढ़ती जा रही है। अब देश में ‘गीताप्रेस’ के शुभचिंतकों की चिंताएं बढ़ती जा रही हैं। सबको भय है कि कहीं ऐसा न हो कि ‘गीताप्रेस’ को बंद करना पड़ जाए।

हमारा भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से निवेदन है कि वह इस प्रकरण में अपने स्तर से हस्तक्षेप करें। इस प्रकाशन को चालू रखा जाए। यदि इसे कहीं कलकत्ता के किसी संपन्न परिवार से ही आर्थिक सहायता मिलती रही है, तो इसे किसी अन्य संस्थान अथवा व्यक्ति से भी आर्थिक सहायता उपलब्ध कराने का प्रबंध किया जाए। भारत के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के माध्यम से भारतीय संस्कृति के पुरोधा और प्रस्तोता इस प्रकाशन को करने से बचाने के लिए विशेष सहायता उपलब्ध करायी जाए। ‘सांस्कृतिक राष्ट्रवाद’ के लिए काम करने वाले संस्थानों, संस्थाओं व्यक्तियों और व्यक्ति समूहों को बचाने की दिशा में हम सजग सावधान और जागरूक होंगे।

ऐसे ट्रस्ट और स्मृति संस्थान इस देश में पर्याप्त हैं जो किसी व्यक्ति विशेष के नाम पर चलाये जा रहे हैं और वे देश के लिए कुछ भी नही कर पा रहे हैं। उनका करोड़ों का बजट रहता है पर उसे कुछ संचालक लोग ही बांटकर खा लेते हैं। जब उनका बोझ हम झेल सकते हैं तो देश और धर्म की सेवा में लगे ‘गीताप्रेस’ जैसे पवित्र संस्थान को बचाने के लिए उसका कुछ बोझ झेल लेना तो हमारे लिए एक पवित्र कार्य ही होगा। वैसे यह अच्छी बात है कि ‘गीताप्रेस’ के उच्चाधिकारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि ‘गीताप्रेस’ को बंद करने का उनका कोई उद्देश्य नही है। हां, प्रेस के कर्मचारियों द्वारा की गयी हड़ताल के कारण गतिरोध अवश्य है। यह गतिरोध जितना शीघ्र समाप्त हो जाए उतना ही अच्छा रहेगा। ‘गीताप्रेस’ प्रबंधन भी इस ओर ध्यान दे।

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