समाजवाद के असली अवरोधक तो समाजवादी ही हैं !

श्रीराम तिवारी

वेशक यूपीए और कांग्रेस बहुत बदनाम हो चुके थे ,इसलिए देश की जनता ने उन्हें सत्ता से उतारना ही बेहतर समझा। वेशक एनडीए और मोदी सरकार भी हर मोर्चे पर असफल होते जा रहे हैं ! वेशक झूंठ -कपट छल और पाखंड का प्रचलन पूँजीवादी और साम्प्रदायिक सत्ता में सर्वत्र व्याप्त हो चुका है। किन्तु जो लोग अन्ना हजारे – रामदेव आंदोलन से पैदा हुए ,वे भी इस व्यवस्था के हम्माम में नंगे होते जा रहे हैं। ‘आप’का संभावित स्खलन भी स्पष्ट दिख रहा है। जनता परिवार वाले – लोहिया -जयप्रकाशनारायण और आपातकाल की पुण्याई लूटने वाले निर्लज्ज जातीयतावादी कितनी ही कोशिश कर लें -कितने ही महागठबंधन बना लें वे इस वर्तमान पूँजीवादी -सम्प्रदायिक गठजोड़ की व्यवस्था का विकल्प बिहार में भी नहीं बन सकते ! इनसे सम्पूर्ण भारत राष्ट्र को एक बेहतरीन राजनैतिक विकल्प प्रदान करने लायक क्षमता की उम्मीद करना मूर्खता ही होगी !

तीसरे मोर्चे और क्षेत्रीय दलों का पराभव बहुत स्पष्ट दिख रहा है। किन्तु जो क्रांतिपथ के अलम्बरदार हैं ,वे इस भरम में न रहें कि जनता उन्हें शीघ्र ही राज्य सत्ता सौंपने को लालायित है। वेशक वामपंथ ने देश की जनता के सवालों पर बहुत संघर्ष किये हैं। जनता के सरोकारों को लेकर तथा शासक वर्ग की प्रतिगामी नीतियों के खिलाफ शानदार हड़तालें भी कीं हैं ,किन्तु जनता को वामपंथ की यह अनवरत संघर्षों की -हड़तालों की – क्रांतिकारी भाषा ही पल्ले नहीं पड़ रही है ! यदि इस संघर्ष का मकसद केवल निष्काम भाव से निरंतर संघर्ष ही करते रहना है तो इस पर कोई निषेध नहीं हो सकता ! किन्तु यदि लोगों अभिलाषाओं के मद्दे नजर कुछ असर होता तो सभी प्रकार के चुनावों में -केरल बंगाल में अपनी पुरानी ताकत तो वाम को अवश्य वापिस मिलती। किन्तु लगता है कि बंगाल की जनता को क्षेत्रीय ‘ममता ‘ अधिक प्रिय है। वामपंथ जिनके लिए कुर्बानी दे रहा है उन्ही को ‘अधिनायकवाद’ बहुत जल्दी लुभा रहा है। वेशक इसके लिए भी जनता नहीं, बल्कि प्रगतिशील बुद्धिजीवी वर्ग की सोच और वामपंथ के जूने -पुराने सिद्धांत ही जिम्मेदार हैं ! उनका वैयक्तिक आचरण भले ही देवतुल्य हो [माणिक सरकार जैसा ] किन्तु उनके सनातन संघर्ष की फसल कभी कांग्रेस और कभी भाजपा चरती रहे , तो इस के लिए वामपंथी नेतत्व की रणनीतिक असफलता ही कसूरवार हैं।

वे यह मानने के लिए तैयार ही नहीं कि जिस पतनशील समाज – व्यवस्था में वे पैदा हुए हैं , पले -बढे हैं ,उस समाज के अवगुणों से वे भी अछूते नहीं रह सकते। स्पष्ट शब्दों में कहा जाये तो परिकल्पना यह भी बनती है कि ‘प्रगतिशील -जनवादी और वामपंथी लोग ओरों से बेहतर इंसान तो अवश्य होते हैं ,किन्तु वे भी सापेक्ष रूप से प्रगतिशील होने के वावजूद हर दौर में हर मोर्चे पर पिछड़ रहे हैं ! वैसे तो सिद्धांत; आत्मालोचना का स्वागत है, किन्तु व्यवहार में अपने आपको आलोचना से परे मानते रहने की आत्ममुग्धता से भी वामपंथी नेतत्व आक्रांत है। जबकि बौद्धिक नॉस्टेलजिया से ग्रस्त व्यक्ति प्रगतिशील हो ही नहीं सकता ! इस दौर में बहुत कुछ ऐंसा ही घटित हो रहा है। कई संदर्भो पर प्रगतिशील -जनवादियों की कुछ स्थापनाएं आलोच्य हैं। इस दौर में कुछ स्थापनाएं – माक्र्सवाद – लेनिनवाद – सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयता के अनुकूल नहीं हैं ! यदि वे वर्तमान आर्थिक नीतियों की आलोचना कर सत्ता में आ भी गए तो बंगाल ,केरल की तरह किसी तरह का न तो कोई विकास कर पाएंगे और आरएसएस -कार्पोरेट नियंत्रित मीडिया के दुष्प्रचार का मुकाबला भी नहीं कर पाएंगे। तब यही कहावत चरितार्थ होगी कि ‘अंधे -पीसें कुत्ते खाएं ‘!

तब जन-आकांक्षा को पूरा करने में सफल नहीं हो पाने के कारण सत्ता से बाहर होना ही पड़ेगा। कहने का तातपर्य यह है कि वामपंथ को अपने ‘वैकल्पिक ‘प्रारूप को तेजी से अपडेट करते रहना चाहिए ! पचास साल पुराने नारों से अब कोई काम नहीं सधने वाला। बाजारबाद, भूमंडलीकरण, निजीकरण , जातीयता, संचार-क्रांति और सम्प्रदायिकता की अनदेखी कर जो भी नीतियाँ और कार्यक्रम बनाये गए हैं , वे कारगर कैसे हो सकते हैं वेशक पूंजीवाद का विकल्प ‘समाजवाद’ ही हो सकता है, किन्तु जब मुलायम ,लालू ,पप्पू यादव के गिरोह समाजवाद का ठप्पा लगाकर उसे बदनाम आकर चुके हों ,जब वे इसे पारिवारिक ,और सजातीय घान में सेंक चुकें हों तो फिर ‘वामपंथ’ को क्यों नहीं बिहार में सभी सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े करने चाहिए ? भले ही सब हर जाएँ ! वेशक आगामी विधान सभा चुनाव में , बिहार में नागनाथ या सांपनाथ में से ही कोई जीतेगा ! अभी असली लोकतंत्र तो यूपी बिहार से कोसों दूर है। भारत में समाजवाद के असली अवरोधक कौन हैं ? कांग्रेस और भाजपा कदापि नहीं है ! बल्कि तीसरे मोर्चे और जनता परिवार वाले ही समाजवाद और साम्यवाद के असली दुश्मन हैं। यही जनता के भी असली दुश्मन है ! कांग्रेस ,भाजपा और वामपंथ के अलावा किसी को भी भारतीय अस्मिता -अखंडता और नवनिर्माण की फि़क्र नहीं है। ममता ,सपा ,वसपा राजद ,जदयू लोजद ,बीजद अकाली इत्यादि को देश की नहीं अपनी -अपनी ,जाति ,खाप ,समाज और गिरोहबंदी की फि़क्र है। वामपंथ को कांग्रेस या भाजपा से इतर अन्य सभी -अराजक दलों को कोई तरजीह नहीं देना चाहिए ! तीसरे विकल्प के रूप में देश के हर चुनाव में हर सीट पर वामपंथ का प्रत्याशी खड़ा क्यों नहीं किया जाना चाहिए ? यदि नहीं जीत पाये तो वास्तविक वोट प्रतिशत तो बढ़ेगा ! जनता के बीच कार्यक्रम और नीतियां तो पहुंचेंगी ! हो सकता है तब मीडिया और सूचना संचार तंत्र से लेस युवा शक्ति भी वामपंथ का साथ देने लगे !

विभिन्न चुनावों के माफऱ्त देश की जनता को यह भी बताया जाए कि बाकई सोवियत संघ की महान क्रांति को पूँजीवाद ने खत्म किया है ? यह भी स्वीकारना होगा कि ग्रीस का आर्थिक संकट यूरोप -अमेरिका की देन नहीं है बल्कि समग्र भूमंडलीकरण का प्रतिषाद है। यूनान की की वर्तमान वामपंथी सरकार जब उन्ही पूँजीवादी राष्ट्रों से ‘उधार’ ले रही हो तो उसके आर्थिक संकट से निजात कैसे मिल पाएगी? यदि ब्राजील , बेनेजुएला लडख़ड़ा रहे हैं ,तो क्या उसकी पूरी जिम्मेदारी अमेरिका की ही है ? केवल ओरों की आलोचना करने से साम्यवादी आंदोलन शसक्त नहीं होगा बल्कि पूँजीवाद का विकल्प बनने के लिए उसे व्यवाहरिक वैज्ञानिकता अपनानी होगी।

चूँकि भारतीय वामपंथ के लिए यूनिफॉर्म लेविल प्लेयिंग फील्ड मौजूद नहीं है। इसलिए कुछ प्रगतिशील लेखक ,कवि और विचारक -भाई लोग बड़े ही ज्ञानवान अर्थात मेधाशक्ति से ओत -प्रोत हैं। उनकी विध्वंशक क्रान्तिकारी सोच ये है कि उन्हें जो कुछ भी अतीत में रटा दिया गया है वे उससे आगे कुछ भी कहना -सुनना कुफ्र समझते हैं ! स्वर्गीय राजेन्द्र यादव की तरह महावज्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का सनातन विरोध किस प्रगतिशीलता का द्वेतक है ? बल्कि इस तरह की घोर ‘अराष्ट्रवादी’ चेतना ने भारतीय जन-मानस को वामपंथ से दूर कर दिया है। यही वजह है कि केरल में चर्च , मंदिर और मस्जिद से वामपंथ को हारना पड़ रहा है। यही वजह है कि बंगाल में ज्योति वसु और कॉम प्रमोददास जैसे कर्मठ ईमानदार नेताओं की पुण्यायी को ममता बेनर्जी जैसी ‘उजबक ‘ महिला हजम कर गयी है। यही वजह है भारत में पहले तो केवल भूस्वामियों-पूँजीपतियों का ही वर्चस्व था ,किन्तु अब तो भारत में साम्प्रदायिकता और क्रोनी पूँजीवाद दोनों की जुगलबंदी मजबूत हो चुकी है। जो लोग यूपी -बिहार में समाजवाद का मुखौटा लगाकर जातीयता की राजनीति कर रहे हैं वे भी इस भृष्ट सिस्टम के ही बगलगीर हो चुके हैं।

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