कृषकों की आत्महत्त्याएं कैसे रुकेगी?

suicideडॉ. मधुसूदन

1. कृषकों की आत्महत्त्याओं को घटाने के लिए।
प्रायः ६० करोड की कृषक जनसंख्या, सकल घरेलु उत्पाद का केवल १५ % का योगदान करती है। और उसीपर जीविका चलाती है।विचारक विचार करें।अर्थात, भारत की प्रायः आधी जनसंख्या और, केवल १५% सकल घरेलु उत्पाद? बस? जब वर्षा अनियमित होती है, तब इन का उत्पाद घट कर १३% ही हो जाता है।
अब सारे कृषक भी भूमि के स्वामी नहीं होते।
लगभग आधी ५० % जनसंख्या अपने हिस्से का ५० % सकल घरेलु उत्पाद नहीं पर मात्र १५% का उत्पाद ही प्रदान करती है। इसका अर्थ: ३७% की जनसंख्या अपने हिस्सेका उत्पाद कर नहीं रही है।

2.यह कारण है, आत्महत्त्याओं का।
यह समझने के लिए क्या नोबेल विजेता होने की आवश्यकता है। आप लोगों के कारण आत्महत्त्याएं होंगी।
क्या यह बात समझमें आती है? यही कारण है, आत्महत्त्याओं का। मुझे कोई पाठक टिप्पणी में, इस कारण का विश्लेषण कर अन्य कारण दिखाने की कृपा करें। मैं अत्यन्त आभारी होऊंगा।
शेष ६०-६५ करोड की जनसंख्या ८५ % घरेलु उत्पाद का निर्माण करती है।
और ऐसा १५ % का योगदान कब होता है? जब वर्षा सही समय पर सही मात्रामें होती है। भूमण्डलीय ऊष्मा (Global Warming) के कारण वर्षा अनियमित हो गयी है। पर ऐसी अनियमित वर्षा का पानी भी बाँध बनाकर रोका जा सकता है। और सिंचाई द्वारा भूमि की उपज बढाई जा सकती है। कच्छ में यही हुआ है।

भूमि अधिग्रहण के बिना, यह बाँध भी संभव नहीं। एक एकड भूमि जब अधिग्रहित होगी उसके सामने कई एकड भूमि उपजाऊ होकर ३ से ४ फसले देंगी।
इस दृष्टिकोण से आगे का आलेख पढने का अनुरोध है।

3.सूचना:
१ मई के, गुजरात टाइम्स के समाचार का शीर्षक था; “कच्छ का नर्मदा नीर का सपना हुआ साकार” -उसपर आधारित यह आलेख।

4.कच्छ की सदियों पुरानी जल समस्या
***कच्छ की सदियों पुरानी भीषण जल समस्या सुलझायी गई है।
*** ९०% कच्छ में, पेय जल समस्या का अंत पहले हो गया था।
***अब सिंचाई जल समस्या का भी अंत होगा।
***हजारों कच्छवासी कच्छ छोडकर अहमदाबाद, मुम्बई और परदेश, अफ़्रिका, इंग्लैण्ड, अमरीका, कनाडा इत्यादि देशों में जा बसते थे।
***अब जल समस्या के कारण, और रोटी रोजी के लिए. कच्छ छोडकर जाने की आवश्यकता नहीं । ***समृद्धि ऐसी आएगी, कि, फिर घूमने फिरने के लिए कच्छवासी निकलेगा।
***पेयजल ९०% कच्छ को नर्मदा बाँध के कारण मिलता था। शेष १० % कच्छ को भी मिलना प्रारंभ हो जाएगा।
***अब कच्छ को सिंचाई का पानी मिलने लगेगा। जिससे, उस की भूमि तीन से चार गुना उपजाऊ होगी।वर्ष भर में एक के बदले ३ से ४ गुना उपज होगी।
***कृषकों की आत्महत्त्याओं पर अंकुश लगेगा। वैसे यहाँ विशेष आत्महत्त्या समाचार नहीं पढे।
***क्या शेष भारत सीख लेगा?
***चावल में कंकड चुनकर फेंकने के बदले सारे चावलों को फेंकने से बचो।

5.क्या, इधर मत दिया, उधर बाँध बन जाएगा ?
चेताना चाहता हूँ, कि, ऐसा बाँध चुटकी में बनता नहीं है। कोई प्रकल्प चुटकी में नहीं बनता। इसमें दशकों का समय लगता है। जब, व्यवसाय को स्थिर करने में भी ५-१० वर्ष लगते हैं; तो ऐसे प्रकल्प दशकों तक चलते हैं, तब लाभ प्राप्त होता है। शायद हम नहीं, हमारी अगली पीढी लाभ प्राप्त करेगी।

6.कल बुद्धिमान पूछेंगे, कि, विकास कहाँ हुआ ?
किन्तु कल ही हमारे बुद्धिमान पूछने लगेंगे, कि, सबके विकास के वादे का क्या हुआ?विकास अबतक नहीं हुआ? उत्तर होगा, कि, महाराज आपका विरोध ही विकास को रोक रहा था।
जैसे मेधा पाटकर आणी मण्डली नें नर्मदा प्रकल्प रोका। यदि विरोध ना होता, तो, कम से कम ५ वर्ष पहले ही, पूरा होता। देरी के लिए, ये विरोधक ही उत्तरदायी हैं। भारत का विकास यदि चाहते हो, तो, ठीक है, चावल में कंकड चुनकर फेंको; सारे चावलों को फिकवाने से बचो।

7.“कच्छकी सदियों पुरानी जल समस्या का अंत” और विद्वानों का पागलपन?
हो सकता है, मैं कुछ सच्चाईयों से अनभिज्ञ होऊं; कुछ समझ न पा रहा होऊँ; या भारत की भौमिक सच्चाइयों से अनजान होऊँ?सारे विद्वान तो पागल नहीं हो सकते। मैं ही पागल कहाने का दोष स्वीकार कर आज लिख रहा हूँ।

8.“कच्छ की जनता का शतकों का सपना साकार”।
पहली मई के, “गुजरात टाइम्स” का समाचार शीर्षक है, “कच्छ की जनता का शतकों पुराना सपना हुआ साकार”। जब गुजरात टाइम्स में समाचार पढा। शीर्षक था, कच्छ की जनता का सपना हुआ साकार।
भगीरथ नें गंगा को उतारा था, तब से गंगा-यमुना का मैदान उर्वर हो कर हमें सम्पन्नता प्रदान कर रहा है। आज नर्मदा को, सूखा-पीडित कच्छ की धरती पर उतारा है।
जो कच्छ में हो रहा है, वही भारत में भी हो सकता है, यदि हम साथ दे।
कल समाचार छपेगा कि, भारत की कृषि उपज चार गुना हुयी तो क्या, आप दुःखी होंगे? पर भविष्य की सोच के लिए दूरदृष्टि के विचारक चाहिए, राष्ट्रीय दृष्टि और वृत्ति के चिन्तक चाहिए।

9.भूमि की उर्वरता तीन से चार गुना ।
अर्थ हुआ, कच्छ की भूमि का क्षेत्र उपज की दृष्टि से तीन से चार गुना हो गया। यह कच्छमें होगा। फिर कृषक क्यों आत्महत्त्याएँ करेंगे?
ऐसे ही भारत की भूमि की उर्वरता भी बढाई जा सकती है। जो भूमि हमारे पास है, उस तीन गुना लाभ हम ले सकते हैं।अमरीका में वर्ष में बहुतेरे राज्यों में औसत एक उपज होती है।वहां की अल्पकालीन उपजाऊ ऋतु के कारण। उनकी भूमि भारत से तीन गुना है। पर ऋतु के कारण उपज मर्यादित है।
हमारी भूमि औसत तीन उपज दे सकती हैं; पर हमारी समस्या मान्सून ऋतु की अनियमितता है।
जिसके कारण हमारी भूमि मर्यादित उपज देती है।
हमारा कृषक चातक की भाँति आकाश को तकते रहता है। जब पर्याप्त उपज नहीं होती, तो कर्ज की राशि से लज्जा अनुभव कर आत्महत्त्याएं करता है। मुझे, उसकी आत्महत्त्या में भी उसका आदर्श झलकता हुआ दिखाई देता है; अन्य देशो में जहाँ गोली मार कर दूसरों के प्राण लिए जाते हैं; वहाँ हमारा कृषक बेचारा आत्महत्त्या करता है। वह कर्ज न चुकाने की लज्जा का अनुभव करता है। यह उसकी नैतिकता का परिचायक है।

10.उर्वरता बढा कर उपज ४ गुना।
वर्षा पर निर्भर होने के कारण जब उपज नहीं होती, तो, कृषक आत्महत्त्या करता है।
जब हम नर्मदा जैसे छोटे बडे बाँधों को गढेंगे, तो क्या हमारी उपज नहीं बढेगी?
और ऐसी उर्वरता बढने पर उपज ३ से ४ गुना तक बढ सकती है। ऐसा होने पर हमारा कृषक आत्महत्त्या क्यों करेगा? अर्थात एक एकड की उपज यदि ३ से ४ एकड की उपज के बराबर हो जाएगी। तो फिर कृषक आत्महत्त्याएँ करने को उद्युक्त क्यों होगा?अर्थात हमारी भूमि की गुणवत्ता बढने से

11.सिंचाई के लिए नर्मदा का पानी:
रापर से १ मई का समाचार था। दशकों से कृषक जिसकी चातक की भाँति बाट देख रहे थे, जो सपना था, साकार हुआ है। कच्छ में सिंचाइ के लिए, फतेहगढ से जेसडा की ओर पानी छोडा गया, तो कच्छवासी प्रजा आनंद से झूम उठी। प्रति सेकंद ७८००० लिटर पानी उदवाहन (पम्पिंग) की क्षमता वाले, दो उदवाहकों (पम्प) का नीर कच्छ में पहुंचेगा। इस के कारण जनता का कच्छियों का स्थलान्तर रूकेगा।
कच्छ प्रदेश में कृषि उत्पादन बढकर चार गुना होगा।
पहले कागजी योजनाएँ बहुत बनी। पर मोदी द्वारा २००९ में बनी स्वर्णिम गुजरात योजना के कारण यह संभव हुआ। पर अडंगे लगाने के लिए मेधा पाटकर आणि मण्डली कूद पडी थीं।

12. कौन भारत विरोधी है?
डंगों के कारण बरसों देरी हुयी। नहीं तो, कच्छ हरियाला हो चुका होता।
१९६२ से तत्कालीन शासन बाते ही करता रहा था। योजनाका क्रियान्वयन मात्र नरेंद्र मोदी शासन में ही संभव हो पाया।
उल्लेखनीय है, कि, २०१० से ९०% कच्छको पीने के लिए नर्मदा का पानी दिया जाता है। किंतु सिंचाई के लिए अब नर्मदा की नहर द्वारा पानी दिया जाएगा।
कुल ३६१ किलोमिटर परिधि में फैला जाल है। संसार के इतिहास में ऐसा जाल पहली बार फैलाया गया है।
११६ बडे नगरों को पीने का पानी पहुंचेगा। अतिरिक्त ५५७८ गाँवों को भी पीनेका पानी पहुंचेगा।
पौने दो करोड नागरिकों को १६५ करोड लिटर पानी पहुंचेगा। प्रति नागरिक ९४+ लिटर पानी मिलना प्रारंभ होगा। जब कच्छ में रहकर इतनी समृद्धि होगी, तो कच्छी जन कच्छ छोडके क्यों जाएगा?
जब उसी भूमि में ४ गुना फसल उपजेगी, तो, कच्छवासी कृषक आत्महत्त्या क्यों करेगा?

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