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डॉ राकेश कुमार आर्य की लेखनी से

पद खरीदने का मौसम

उत्तर प्रदेश में मौसम चुनाव का चल गया है। चार चरणों में 9 अक्टूबर से 29 अक्टूबर के बीच सभी 74 जिलों में मतदान होगा। जनपद गौतमबुद्घ नगर को इस चुनावी प्रक्रिया से बाहर रखा गया है। क्योंकि जनपद गौतमबुद्घ नगर का चुनाव संबंधी प्रकरण उच्च न्यायालय इलाहाबाद के समक्ष लंबित है।

राज्य निर्वाचन आयुक्त एस.के. अग्रवाल ने सोमवार को  जनपद गौतमबुद्घ नगर को छोडक़र अन्य 74 जिलों के लिए जिला पंचायत व 817 क्षेत्र पंचायतों के लिए चुनाव की घोषणा की है। इस चुनाव में 77579 क्षेत्र पंचायत सदस्य तथा 3112 जिला पंचायत सदस्य चुने जाएंगे। चुनाव में लगभग 11.36 करोड़ मतदाता भाग लेंगे, जिनमें 53.33 प्रतिशत पुरूष तथा 46.67 प्रतिशत महिला मतदाता हैं। इस चुनाव के लिए एक रोचक तथ्य यह भी है कि इसमें 51.33 प्रतिशत मतदाता ऐसे होंगे जो 35 वर्ष या उससे कम आयु वर्ग के हैं।

भारत एक लोकतंत्रात्मक गणराज्य है। इसमें लोग अपनी इच्छा से अपना नेता और प्रतिनिधि चुनते हैं। नेता वह होता है जो जनसाधारण को हर क्षेत्र में नेतृत्व दे सके अर्थात भाषण शैली में, समाज सेवा में, विद्वत्ता में, विषय को समझने, उठाने और एक निर्णय तक पहुंचाने में न्यायशील प्रज्ञा में, इत्यादि में उसका कोई सानी न हो। प्रतिनिधि वह होता है जो सारे समाज की सामूहिक इच्छा का और सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता हो। कहने का अभिप्राय है कि वह किसी मौहल्ले विशेष, क्षेत्र विशेष या वर्ग, जाति अथवा संप्रदाय विशेष का चिंतन करने वाला ना हो, अपितु उसके चिंतन में समग्रता हो और वह सबके हित की बात सोचता हो और उसी के लिए प्रयासरत रहता हो- उसे कहते हैं प्रतिनिधि।

लोकतंत्र निस्संदेह सर्वोत्तम शासन प्रणाली है। यह शासन प्रणाली हमें ऐसे नेता और प्रतिनिधि चुनने का अवसर देती है, जैसे नेता या प्रतिनिधि की अपेक्षा ऊपर की गयी है। इस प्रकार की शासन प्रणाली में जनता का कार्य नेता से या प्रतिनिधि से भी बड़ा होता है, क्योंकि वह अपने लिए एक गुणी नेता या प्रतिनिधि का चुनाव करती है। अन्य शासन प्रणालियों में गुणी अपने आपको स्वयं गुणी कहता है और जनता का नेता या प्रतिनिधि बन जाता है। पर लोकतंत्र में ऐसा नही है इसमें तो जनता उसे यह बताती है कि हां तू गुणी है, योग्य है, नेता बनने की योग्यता रखता है और प्रतिनिधि बनने की सारी अपेक्षाओं पर तू खरा उतरता है। सचमुच चुनाव करना बड़ा कठिन होता है।

भारत में ये चुनाव पिछले 68 वर्ष से होते आ रहे हैं। भारत के लोगों को कई बार अपने प्रतिनिधि चुनने का अवसर मिला है। स्वतंत्रता के पश्चात जनसाधारण को अपना नेता चुनने का अधिकार दे देना सचमुच एक बड़ा काम था। लोग नेता बनने के लिए नही सेवक बनने के लिए राजनीति में उतरा करते थे। उनकी सोच होती थी कि जनापेक्षाओं पर खरा उतरा जाए और ऐसा कोई कार्य ना किया जाए जो जनता की सामूहिक चेतना के या इच्छा के विपरीत हो। इसलिए लोग बड़ी सावधानी से और सूझबूझ के साथ बोला करते थे और सूझबूझ के साथ ही निर्णय लिया करते थे। उन्हें उस समय के निरक्षर भारत से डर रहता था कि ये भारत के लोग बड़े पारखी हैं, तुझे परखकर ही वोट देंगे अन्यथा तेरा रास्ता नाप देंगे।

धीरे-धीरे पढ़ाई लिखाई बढ़ी तो भ्रष्टाचार भी बढ़ा। भ्रष्टाचार बढ़ा तो लोकतंत्र को नीलाम करने के तरीके भी खोजे जाने लगे। पढ़े लिखे लोगों ने लोकतंत्र का गला पकड़ लिया और उसी से बलात् ऐसी इबारत लिखवाने लगे जो उसकी आत्मा को मार दे, फलस्वरूप लोकतंत्र में वोट खरीदने या बलात् अपने पक्ष में डलवाने की प्रक्रिया प्रारंभ हो गयी। इस देश के लोकतंत्र की विशेषता बन गयी कि नितांत बदतमीज और नितांत कुसंस्कारी लोगों को दबंग की संज्ञा दी जाने लगी। जिससे दबंगों के दबंग पटेल की परिभाषा भी बदल गयी। इसी लोकतंत्र ने पढ़े लिखे लोगों को सबसे बड़ा अपराधी बना दिया। लोकतंत्र को नीलाम करना भी किसी गरीब ने नही सिखाया, यह भी इसी पढ़े लिखे वर्ग की देन है-लोकतंत्र को सडक़ों पर नीलाम कराने की शिक्षा देना। यही वर्ग अधिकारी के रूप में या कर्मचारी के रूप में लोगों को या प्रतिनिधियों को यह बताता है कि फर्जी योजनाएं कैसे बनती हैं और कैसे पैसे को योजनाओं में झूठा खर्च दिखाकर बचाया जा सकता है? इसी पढ़ी लिखी आपराधिक सोच ने देश के लोकतंत्र को नीलाम करा दिया। आज जब भी कहीं चुनाव होते हैं तो लोकतंत्र के ‘जनाजे’ पर अनेकों गिद्घ टूट पड़ते हैं। उनकी सोच केवल पद खरीदने की होती है। एक प्रधान से लेकर एम.पी. तक के चुनाव में लोग लाखों से आरंभ करके करोड़ों रूपया व्यय करते हैं। चुनाव आयोग चुनावी खर्चे की जिस सीमा रेखा को खींचता है वह तो नामांकन से भी पहले ही हर प्रतिनिधि व्यय कर डालता है। लोगों की सोच बन गयी है कि पैसा से पद खरीदो और फिर पांच वर्ष मौज करो। एक प्रधान 25 से तीस लाख तक में प्रधानी पद खरीदता है और फिर पांच वर्ष सरकारी कोष से मिलने वाली धनराशि को सार्वजनिक मद पर व्यय ना करके अपने लिए व्यय करता है। अपने चाटुकारों को खिलाता पिलाता है और सरकारी कर्मचारी मिल बांटकर पारी खानापूर्ति कर लेते हैं। यही स्थिति अन्य चुनावों की है, ऐसी स्थिति में ये चुनाव और चुनावी प्रक्रियाएं कितनी बोझिल हो गयी हैं। यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। 1952 के पहले चुनाव से अब तक चुनावों पर होने वाले व्यय और विकास योजनाओं के लिए दिये गये धन का योग करो और फिर उसे भारत के एक-एक गांव पर व्यय करने के लिए दे दो तो पता चलेगा कि भारत के सारे गांवों का विकास तो अब से बहुत पहले हो जाना चाहिए था, पर हुआ नही, तो सोचिए कि कितना बड़ा घोटाला ‘काले अंग्रेज’ अपने बनकर करा गये। इसलिए चुनावों में वोट समझकर व संभलकर डालें, क्योंकि हमारे भविष्य का प्रश्न है।

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