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देश में बुजुर्गों की आबादी के लिए तंग होते रास्ते

 

मधुरेन्द्र सिन्हा

रिजर्व बैंक ने पिछले दिनों अपनी मॉनिटरी पॉलिसी में किसी भी तरह के बादलाव की घोषणा नहीं की। उसने रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट को यथावत रहने दिया। आम आदमी की भाषा में इसका मतलब यह हुआ कि ब्याज दरों में कोई परिवर्तन नहीं। इस बार रिजर्व बैंक की घोषणा का इसलिए बेसब्री से इंतजार हो रहा था कि देश में मुद्रास्फीति की दर बढ़ती जा रही है। महंगाई को नियंत्रित करने में सरकार के अलावा रिजर्व बैंक की बड़ी भूमिका रहती है। इसे नियंत्रित करने के लिए वह अमूमन ब्याज दरें बढ़ाता है ताकि इकॉनमी में पैसे का प्रवाह कम हो जाए। माना जाता है कि इससे कीमतों पर रोक लग जाती है।

अधिक ब्याज तो मिला
हालांकि इसके पूर्व गवर्नर सुब्बा राव ने अपने कार्यकाल में रेपो रेट में एक दर्जन बार बदलाव किए फिर भी ऐसा कुछ नहीं हुआ। कीमतें अपने हिसाब से बढ़ती-घटती रहीं। लेकिन इससे करोड़ों लोगों को यह लाभ हुआ कि देश में ब्याज दरें बढ़ीं जिससे उन्हें अपनी डिपॉजिट पर अधिक ब्याज मिलने लगा। उन दिनों यानी 2008 में बैंक 9.50 परसेंट तक ब्याज दे रहे थे। यह उनलोगों के लिए बेहद सुकून की बात थी जिनके पास अतिरिक्त कमाई का कोई बड़ा जरिया नहीं था।

भारत में लगभग 12 करोड़ लोग सीनियर सिटीजन हैं। उनमें से लगभग एक-सवा करोड़ ही ऐसे हैं जिन्हें किसी तरह का पेंशन मिलता है। बाकी या तो अपने बच्चों पर आश्रित रहते हैं या फिर अपने जीवन की कमाई को बैंकों या ऐसी अन्य संस्थाओं में डालकर उसके ब्याज से अपना गुजारा करते हैं। ब्याज दरों का लगातार घटते जाना उनके लिए किसी शॉक से कम नहीं है। इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है कि देश में पिछले दिनों महंगाई तेजी से बढ़ी है। कोरोना काल में न केवल दवाइयों बल्कि खाने-पीने की चीजों की भी कीमतें अनाप-शनाप ढंग से बढ़ी हैं। फूड इन्फ्लेशन की दर 6 परसेंट से ज्यादा है जबकि ब्याज दर इससे नीचे है। रिजर्व बैंक का अंदाजा है कि इस साल इन्फ्लेशन दर 5.7 परसेंट रहेगी। लेकिन मानसून की अच्छी रफ्तार और बढ़िया खरीफ फसल की उम्मीद है जिससे महंगाई पर अंकुश लगेगा। हालांकि इसमें अभी तीन महीने हैं। यानी फिलहाल महंगाई इसी रफ्तार से जारी रहेगी।
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इस समय इन्फ्लेशन की दर का 5 परसेंट से ज्यादा रहना बैंकों में डिपॉजिट करने वालों के लिए घाटे का सौदा है क्योंकि बैंक उसे इससे भी कम ही ब्याज दे रहे हैं। जमाकर्ता के पैसे की वैल्यू माइनस में जा रही है। ऐसे में उसके पास कोई चारा नहीं है। इसका नतीजा है कि सीनियर सिटिजन बड़े पैमाने पर म्युचुअल फंड, डेट फंड, सरकारी बांडों में पैसे लगा रहे हैं। उनके लिए फिक्स्ड डिपॉजिट अब आकर्षक नहीं है। म्युचुअल फंड जोखिम भरे होते हैं और बाजार के उतार-चढ़ाव से पूरी तरह प्रभावित होते हैं। उनमें इस समय बहुत बड़ी संख्या में विदेशी धन लगा हुआ है और विदेशी धन जितनी जल्दी आता है उतनी ही जल्दी उसका पलायन हो जाता है। अतिरिक्त आमदनी के अन्य तरीकों में शेयर बाजार भी है जो इस समय तो अच्छी चाल दिखा रहा है लेकिन भविष्य में क्या होगा, इस बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता। यानी अधिक कमाई तो हो सकती है लेकिन कमाई के ज्यादातर इंस्ट्रुमेंट में अनिश्चितता बहुत ज्यादा है। यहां पर फिक्स्ड डिपॉजिट ही सही है।
यूं तो सरकार ने सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम फंड पेश किया है और उसमें इस समय 7.4 परसेंट ब्याज मिलता है लेकिन इस स्कीम में सिर्फ 15 लाख रुपए ही जमा किए जा सकते हैं और वह भी महज पांच साल के लिए। इस पर तुर्रा यह है कि इससे मिली राशि पर टैक्स लगेगा। इसकी खासियत यह है कि इसे भारत सरकार की गारंटी है और ब्याज दरों में कमी या बढ़ोतरी सरकार पर ही निर्भर करेगी। इसकी कमी यह है कि इसमें लॉक इन पीरियड है और समय से पहले आप पैसे नहीं निकाल सकते।

एक और सरकारी योजना है प्रधान मंत्री व्यय वंदना योजना। यह 2017 में सीनियर सिटिजंस के लिए शुरू हुई थी। यह एक तरह की रिटायरमेंट सह पेंशन स्कीम है और इस स्कीम की शुरुआत में तो इस पर 8 से 8.3 परसेंट तक ब्याज देने की सुविधा थी लेकिन इसे 2021 में घटाकर 7.4 परसेंट कर दिया गया है। इसमें निवेश 1.5 लाख रुपए से लेकर 15 लाख रुपए तक हो सकता है। इसका समय 10 साल का है। इसमें समय पूर्व पैसे कुछ शर्तों पर निकाले जा सकते हैं। लेकिन इस स्कीम में यह परेशानी है कि इससे मिलने वाला ब्याज टैक्स फ्री नहीं है।
ये हैं टॉप 5 स्मॉल सेविंग्स स्कीम्स, 7.6% तक मिल रहा है ब्याज
सीनियर सिटिजन के लिए पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम भी है लेकिन इसमें ब्याज की दरें 6.6 परसेंट ही हैं जो कोई आकर्षक नहीं दिखतीं। इसका फायदा उन लोगों को है जिनके पास पैसे कम हैं या जो ज्यादा पैसा फंसाना नहीं चाहते क्योंकि इसमें एंट्री महज 1500 रुपए से हो सकती है। इसमें एक समस्या है कि इनकम टैक्स में किसी तरह की छूट नहीं है। यानी आपको ब्याज पर टैक्स देना पड़ सकता है। अन्य दो स्कीम की तरह इसमें 80 सी के तहत छूट भी नहीं है।
खर्च ज्यादा, कमाई कम
कुछ लोग यह तर्क देते हैं कि अमेरिका और यूरोपीय देशों में ब्याज दरें शून्य से थोड़ी ही ज्यादा हैं तो भारत में लोग इसके पीछे क्यों भाग रहे हैं? इसका जवाब है कि यहां सीनियर सिटीजन के लिए किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा नहीं है। वहां उन्हें तमाम तरह के खर्च के लिए सहारा मिल जाता है जबकि भारत में इलाज कराने के लिए भी पैसे लगते हैं क्योंकि सरकारी अस्पतालों की हालत दयनीय है तथा अन्य किस्म की बेसिक सुविधाएं भी नहीं हैं। उनका खर्च ज्यादा है कमाई बेहद सीमित।

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